भारती प्रवीण की कविताएँ

 भारती प्रवीण की कविताएँ

भारती प्रवीण नवोदित कवयित्री और होममेकर हैं ।

अधूरा मिलन 】

तेरा साथ रहा वो साथ ,
साथ नही था..
तू संग तो था पर आस पास नहीं था..
मिलते रहे हम यूं तो पल पल मिलने को,
पर संग होगा नही हमेशा ये आभास वहीं था…
तेरी परछाई चला करती रही हर दिन यूं तो साथ मेरे
पर दिखने का कोई तेरा लम्हात नही था..
छोड़ कर आना चाहते थे ये दूरियां जब हम दोनों
ज़िम्मेदारी से घर पकड़ता हाथ वहीं था…
तू न होगा मेरा ,
जानती हमेशा से ही थी,
जब पहली मुलाक़ात थी,
न जाने पर इस सच का भी उपहास वहीं था..
मिलने को तो मिलगये जब रूह भी प्राण से,
रुकना भी नामुमकिन था उस जहां से,
कोई रोके कैसे इस ज़मी को मिलने पर आसमान से,
फलसफों का समा भी रखा तूने और मैंने भी,
वरना , क्या नहीं हम दो ज़िस्म एक जान थे
खोकर भी अबतलक मैंने तुम्हें पाया है
तू ही बता हमदम मेरे
क्या नही जिंदा तुझमे ,
आज भी मेरा साया है?
देखना भी चाहु,सहेजना भी तेरे दीदार को,
ये मन बावरा यक़ीनन छिपा करना चाहे तेरे प्यार को,
रूह तो ज़कड़े ख़ल्क़ (ज़माने) में लाख ,
तेरा न मिलना नही मेरे प्रेम की ख़ाक,
क्या मन को भी कोई मिलने से किसी के रोक पाया है।
क्या मन के कोई किसी के रोक पाया है..
मैंने बिछड़ कर भी तेरा प्यार दिल में छुपाया है ।

【बसंत】

जब आंखें खुलते ही दिखता हैं
ममता को बालक का प्यारा स्पंदन,
तो होता हैं बसंत।।
🍁
तुम ही मेरे आदि
तुम्हारे बाद हर अंत

रूठे तो पतझड़
और हँसे तो सावन

प्यारी खिलखिलाहट से ही
ममता का नित बसन्त
जैसे प्रेम भरे भोजन से
भूखे को आता हैं आनंद,
तो होता हैं बसंत।।
🍁
जब मनुहारों मांगी जिद
पूरी करने की होती मीठी अनबन,
तो होता हैं बसंत

सफलता की चाह में
लड़खडाते हाथों से मिलता
जब आशीष पावन,
तो होता हैं बसंत

यौवन की धारा में
मनमीत मिले और गाये ये मन
तो होता हैं बसंत

लेखन के गागर में
मिल जाय गर
साहित्यिक मंच,
तब होता बसंत
🍁
जीवन मे लिप्सा मिट
हो बस तोषी केवल मन,
तो होता हैं बसंत।।

मनमानी】
हो नदी तट से बंधी,लहरों की मनमानी न हो
नाँव को उस पार जाने में परेशानी न हो
देख मांझी याद रखना,कोई नादानी न हो
नाँव तो पानी में हो, पर नाव में पानी न हो

माँ तू बड़ी नादान …

माँ तू बड़ी नादान है
बड़ी अनजान है
आता ही नही ढंग तुझे यहाँ का..!!
ये भी कोई आन है
माँ तू बड़ी नादान है।।

जाने क्यों कुछ नही समझती हो,
हर पल लगी रही मुझमे कहीं हो
क्या भला है तेरे ख़ातिर
कुछ नही तुझे वो भान है
माँ तू कितनी नादान है।।

स्वाद न जाने ,भेद न जाने,
नाम भर सुखीक्षणों से तेरे
रहती हर पल अनजान है,
उंगली भर रस से करती
तेरा बस पूरा रसपान है,
माँ तू कितनी नादान है।।

बिखरे घर में, बिखरे रहते
तेरे खुद के तो श्रृंगार है,
मुझे सजाना ओर संवारने में
रहते पल पल तेरे प्राण है,
माँ तू किन्नी नादान है।।
जाने क्यों इतनी नादान हैं ।।

भोर न जाने , नींद न जाने,
झूला गद्दा और बिछाने
करती सारे काम अविराम है,
तनिक पसीनें की बूंदों से मेरी
कर देती प्रभु हाय राम है।
माँ तू कितनी नादान है।।

कब तलक लुटाती रहेगी अपना पल पल

तेरा ये जीवन…
जो निश्छल ओर निष्काम है,
स्वार्थ न जाने आराम न जाने…
हम बच्चों पर ही पल पल कुर्बान है,
माँ तू मेरी भोली सी
माँ तू सयानी सी मेरी
मेरी माँ कितनी तू नादान है

मेरे लिये हंसी से
तेरा मुस्काना
सरल करती जीवन के व्यवधान है ,

देव न हो सकता हर पल
सो होता अस्तित्व तेरा यह महान है,
तू ही हो सकती है इतनी प्यारी माँ,
तेरे तर्पण को कोटि-कोटि
बारम्बार मेरा प्रणाम है।

तेरे ममतामयी फटकार को,
तरसता वो भी है ऊपरवाला
गोदी में सहलाने को,
पलना झूला झुलाने को
बरबस ले ही लेता अवतार है,
फिर भी मोल न जाने अपना…
मेरी माँ ,ओ मम्मा
तू कितनी …कितनी नादान है।।
ग़लती करना मेरा काम
भूला देन तेरा माँ नाम है।
माँ तू है प्यारी कितनी लेकिन नादान है…..
हाथ बढ़ा जो आती थी,
चलना हमें सिखाती थी,
किस्से चाँद सितारों के,
धरती और पहाड़ों के,
कहती थी जो कई- कई,
बातें हमसे नई नई
सबसे पहला है ये काम,
उस माता को करो प्रणाम ।

वापसी. 】

मैं मज़दूर था,
बरबस मज़बूर था,

कुछ थी जो मेरी लाचारी
बड़ी बनी वही बीमारी,

पगडंडियों के रास्तों से
कब लदी सीमाएं सारी,

विश्वभर की कमी पूरी करता मैं
कैसे होने लगी मेरी बेकारी,
क्यूं बुलाए “वो” हवाओं के रस्ते
Safe वो ,हम ग़रीब क्यों इतने सस्ते
दे दी काहे ये महामारी
भुगतें कितना ,अटल मुसीबत भारी

क्या हुआ जो पेट से बहका हूं
भूख से ही तो दर दर भटका हूं,

‘दिखाते’ आये हो जो सब “platforms”पर मेरा साथ,
क्या हुआ अब , घबरा गए?
पकड़ना लाज़मी हुआ जब मेरा हाथ।

लेकिन

मैं मज़दूरी का ही नहीं लाचारी हूं
विपदाओं से हारा, तनिक भारी हूं,

बनाकर घर फ़टी चादर खिंचता रहा
सहारे इसके ही “सहारो” को सींचता रहा
बोलना था तुम्हारा अनदेखा बर्ताव भी
लेकिन अच्छे दिन की आस मुँह भींचता रहा,

झूठें भरम भरे सपनें मेरे
कहने के भारत,हैं तो सब तेरे

नोटो की तपिश में जल रहा था
मैं घर से ,घर मुझसे ….
अकेले ही चल रहा था,
छीना न कुछ भी तुझसे….

ये अचानक क्या मुसीबत थी जो हवाओ के रास्ते मुझ पर आई है,
मेरी हर दिन की साँस, हर बूंद
खून पसीने की ही तो कमायी है,

शहर था बनता रहा हमेशा
खुरदुरी चमड़ी वाली हथेली से
घिस गया पांव का फोड़ा चलते चलते
रोटी भी छुटी सुखी कांदे वाली ,
वादों के उस्तादों ओर ऊंची हवेली से

भूखा हु, कैसे जाऊं वहाँ
छोड़ आया था जो गांव घराना
किराया नहीं है देने को,
ट्रेन में चाहे न बिठाना
थक गया हूं ज़रा चलते हुये
भटक गया राह बनते हुये
रह जाऊ ग़र न पहुँचा घर चलते हुये
एहसान होगा बस इतना कर जाना
मेरी BODY भले न उठाना
मेरे मरने के नाम पर ही सही
बच्चो को थोड़े दाने पहुँचाना।

भूख में पैकेट खाने के
हे सेल्फियों वाले दाता,
स्वारथ भरे इस शहर में
अब कभी न वापस आऊंगा
जो घर गांव इसबार जाऊंगा,
ग़र
ज़रा भी मेरे दर्द का ख़याल है,
मांगते किराया मेरी बेहाली में हो तुम,
जाओ रहने दो ,
तुम्हारे ज़मीर का तो
मेरी भूख से भी बुरा हाल है।
इसलिये जाता हूं हमेशा के लिये
इस रेन बसेरे से,
अब कभी भी शायद कभी
न वापस आऊंगा,
भुख ओर लाचारी से
तिल तिल मरना यहाँ नही मुझे,
जन्मी मिट्टी में ही चाहूं जाना
खाख वहीं हो जाऊंगा,
लेकिन,फिर

कभी न वापस आऊंगा।।