सरोज कुमारी की कविताएँ

 सरोज कुमारी की कविताएँ

(1)मंजर
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जहां होता था प्रेमलाप
सुबह की पहली किरण के साथ
खिल उठता था मौसम

तितलियों के झुंड सी भागती, दौड़तीं ,खिलखिलाती बालाएं बरामदे में बिखेर देती थी सतरंगी हवाएं ।

अपने दुपट्टे को करीने से ओढ़ती मोबाइल फोन से सेल्फी लेती कक्षा की ओर तेज कदमों से जाती हुईं
अ़फसराओ सी मेरी स्मृतियों घूम जाती हैं।

हर रोज जाने अनजाने ही मेरे कदम लौट जाते हैं वहीं
जहां मिलता है मुझे एक अदद आदमी

जो सलाम साहब कहकर
अपने भीतर के डर को समेटे खोलता है गेट
और मैं तेज कदमों से बढ़ जाती हूं भीतर
जहां लिखी जाती थी प्रेम की कविता
वह मंजर अब विरह के गीत गा रहा है
बरामदा ,सीढ़ियां और कैंटीन की सांय – सांय मेरा पीछा करती है
मैं दौड़ती हूं और दौड़ती हूं फिर थक कर गुम हो जाती हूं
उस चहारदीवारी के बीच जो अब शब्द विहीन है
गीत संगीत का मंच
अब टूटा हुआ तानपुरा लेकर बुझी हुई गजलों के साथ छटपटा रहा है
फिर से वही प्रेम गीत दोहराने के लिए।
(2) मैं कोरोना पॉजिटिव नहीं हूँ
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अब नहीं आता तुम्हारा फोन
पूछते नहीं मेरा दुःख- सुख
बचकर निकल जाते हो अक्सर
गली के दूसरे छोर से
कहीं मेरा प्रेम तुम्हें
खींच न ले घर के भीतर
और फिर एक कप
कॉफ़ी की जिद में
घुली हुई मेरी आत्मीयता
मजबूर न कर दे तुम्हें
मेरे स्पर्श से सने हुए
प्याले को अपने होठों
तक ले जाने को
अब तुम दूर बहुत दूर
हो गए हो मुझसे
उन्होंने तो एक मीटर की
दूरी कही थी
कि मै और तुम सुरक्षित रहें
पर यह जो भीतर ही भीतर
पनपती गहरी खाई
बहुत डराती है मुझे
पाट दो इस खाई को
और तोड़ दो सामाजिक दूरी का यह बन्धन
बैठो और पियो मेरे साथ
एक ही चम्मच से घुली
हुई प्यार वाली कॉफ़ी
क्योंकि मै कोरोना पॉजिटिव नहीं।

(3)भूख का वायरस
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धूल धूसरित तन,
चिंता ग्रस्त मन
टूटे हुए सपनों को गठरी में बांध
भूख प्यास और तमाम समस्याओं के बीच झूलती
निर्मम जीवन लीला के तांडव से त्रस्त
बिना किसी साधन के
आज पैदल ही चल पड़ा अपनी जड़ों की ओर
जहां उसे अब भी पनपने की आस है
वह कभी रोप ही नहीं पाया खुद को
इस बनावटी और खोखली जमीन में,
अपने प्रवासी जीवन को विराम देते हुए
उसके कदम बढ़ चले
अपनी उसी देहरी की ओर
जिसे छोड़ आया था कभी रोटी की तलाश में
मैंने कहा “रुक जाओ ,सब इंतजाम हो गया है “
मेरी ओर लगभग घूरते हुए
अपने माथे की नसों को तानकर बोला “कोरोना आया है चला जाएगा
फिर इलेक्शन आएगा चला जाएगा
फिर नेता जी आयेगे और चले जाएंगे
न जाने क्या-क्या आएगा और चला जाएगा
पर यह जो भूख का वायरस
सदियों से निगल रहा है हम गरीबों को
कौन जाने उसका अंत कब होगा?
और कैसे होगा?

(4)उस जीवन की डोर हो तुम
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एक गीत
एक दीप
एक चाह
एक राह
या फिर एक रीत
बताओ क्या नाम दूं तुम्हें
तुम्हारे आने से मिल गया जीवन को प्राण
जैसे शुष्क मरुस्थल में बरस गया मधुमास
अब तुमसे ही है मेरा होना
तुमने भर दिया,वो रिक्त कोना
जो अहसास था खालीपन का ।
तुम आयीं, तुम हसीं, तुम रोई, तुम खेली
फिर बढ़ने लगीं
चन्द्र की कलाओं की तरह
धीरे -धीरे तुम चांद बन गईं।
तुम्हारी खिलखिलाहट,तुम्हारा रुदन,तुम्हारा रोष और तुम्हारा प्रेम
जीती रही मैं।
अब तो आदत हो गयी है तुम्हारी
जब भी देखा मुझे उदास
तो कुछ इस तरह किया सवाल
जैसे करती थीं मां
और लगाया गले बिल्कुल उन्हीं की तरह
एक तुम ही हो जो झांक लेती हो
मेरे भीतर और सुन लेती हो वो सब
जो अकसर बाहर नहीं आता
और पढ़ लेती हो मेरी पीड़ा
अपनी अल्प विकसित आंखों से
तुमसे है मेरा जीवन
और उस जीवन की डोर हो तुम,
तुम हो तो मैं हूं
और तुम नहीं तो कुछ नहीं।

(5) सन्नाटा
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मेरे घर के सामने
दूर तक पसरी हुई खामोशी
बहुत बेचैन कर जाती है
सड़क पर पड़े हुए पत्तों की खड़खड़ाहट
हृदय को झकझोर देती है

बौर से लदे हुए मुरझाये आम के पेड़ पर
कोयल अब भी आती है
गाती है कोई शोक गीत

गली में लगी हुई लंबी गाड़ियों की कतारें
मिट्टी और रेत की चादर से ढक गई हैं
अब बालकनी में कोई नहीं फैलाता कपड़े
पार्क के झूलों में लग गई हैं जंग
कोई बच्चा अब झूलने नहीं आता
कूड़े और पत्तों से फटी पड़ी है गलियां
अंधेरा होते ही गली के कुत्ते पार्क में इकट्ठे होकर
किसी विशेष बात पर मशवरा करते हैं
वे भी सीख रहे हैं
सामाजिक दूरी का पाठ
अब कोई आवाज मुझे
मेरी गली के नुक्कड़ पर
नहीं रोकती
लॉक डाउन की पीड़ा से
कराह रहे हैं बंद दरवाजे
और खिड़कियों की सांसे भी थमने लगी है
कभी-कभी मुझे
अपने बगल वाली बिल्डिंग की बालकनी में
दिखाई देती है एक परछाई
जो अचानक गायब हो जाती है
अब नहीं जमती है महफिल
घर के सामने वाले पार्क में।
कूड़े वाले ,प्रेस वाले ,सब्जी वाले की आवाजें
खींच लाती हैं मुझे बालकनी में
और फिर दिखाई देता है मुझे
केवल और केवल
दूर तक पसरा हुआ सन्नाटा….

©सरोज कुमारी