Social Constipation का no solution

 Social Constipation का no solution

तेज प्रताप नारायण

कांस्टीपेशन बहुत ही ख़राब बीमारी होती है । बीमारी चाहे कोई भी हो अच्छी नहीं है सिर्फ़ एक बीमारी के सिवा और वो है प्यार की बीमारी ।काश ये बीमारी सभी को होती और पूरा देश इस बीमारी से ग्रसित हो जाता ? लेकिन कुछ काश बस काश बनकर रह जाते हैं ।

सोशल कांस्टीपेशन एक ऐसी बीमारी है जो समाज के कोने-कोने में व्याप्त है ।

गली गली में शोर है
कांस्टीपेशन का ज़ोर है

हर तरफ़ अंधेरा है
कहीं भी नहीं भोर है ।

वैसे कांस्टीपेशन के बाद क्या-क्या होता है यह हम सभी जानते और समझते हैं और कई बार देखते और सुनते भी हैं । सोशल कांस्टीपेशन को भी आप देख ,सुन और समझ सकते हैं । बहुत लोग इस कांस्टिपेशन को जानकर भी अनजान हैं क्योंकि यह कांस्टीपेशन उनके लिए फ़ायदेमंद है ।जिनके लिए यह सोशल कांस्टिपेशन नुकसानदायक भी है वो भी धीरे-धीरे इसमें आनंद की अनुभूति करने लगते हैं । उन्हें यह कांस्टीपेशन सेटिस्फेक्शन देने लगता है । कांस्टीपेशन के अगेंस्ट कोर्ट में पेटिशन भी फाइल करने की किसी को फुर्सत नहीं मिलती है । इसमें समाज की गलती भी नहीं है भला कोई ख़ुद के खिलाफ़ कोर्ट में कैसे केस कर सकता है ?

सोशल कांस्टीपेशन के उदाहरण हमारे इर्द-गिर्द बिखरे पड़े हैं ।कोर्ट- कचहरी ,थाना- तहसील ,सड़क ,घर और बाहर जिधर भी निगाह घूमती है हर ओर सोशल कांस्टीपेशन दिख जाएगा ।घर के बाहर निकलो तो जीने पर पड़ोसी के घर का कूड़ा मिल जाएगा ।अगर लिफ्ट में जाओ तो लिफ्ट पर पान या सुरती की पीक मिल जाएगी ।लिफ्ट बहुत साफ़ हुई तो भी उसमें राजू लव्स पिंकी लिखा हुआ मिलेगा । साथ ही दिल का निशान मिल जाएगा और दिल में एक तीर घुसा हुआ मिल भी। अगर सीढ़ियों वाला रास्ता भी अख़्तियार करेंगे तो हर दरवाज़े के बाहर कूड़ा-करकट मिल जाएगा ।किसी-किसी दरवाजे पर तो केले के छिलके भी पड़े मिल जाएंगे जिस पर पैर रखकर आप सीधे ग्राउंड फ्लोर तक पहुंच सकते हैं ।

सोशल कांस्टीपेशन अपने देश के लिए नया नहीं है ।यह बीमारी कोई ढाई हज़ार पहले से चली आ रही है और जो बीमारी या आदत लंबे समय से चली आ रही हो ,उसको हम स्वीकार कर लेते हैं और कई बार तो उसी में मज़े लेने लगते हैं । जब कोई विकल्प न हो तो आदमी करे तो क्या करे? When a pig doesn’t get a chance to bath in clean water then what Pig should do ..it starts enjoying in mud itself .वही समाज की स्थिति है।समाज को एक चारपाई मान लिया गया है जिसमें चार पायों के ऊपर चार हज़ार खटमल टहल रहे हैं ।हर खटमल को कुछ न कुछ विशेषाधिकार है कि वह दूसरे खटमल का खून चूस सके ।जो मज़ा खून चूसने और चुसवाने में आता है,वह अवर्णीय है ।एक साथ शोषक और शोषित बनने में जो मज़ा आता है उसका कोई ज़वाब नहीं है ।शोषण एक भी खटमल को नहीं पचता है उसे कांस्टीपेशन हो जाता है लेकिन खटमल करे तो क्या करे ? सारे खटमल असहाय से पूरी चारपाई पर एक दूसरे का खून चूसते हुए टहलते रहते हैं । धीरे- धीरे पूरी चारपाई भी खोखली हो जाती है लेकिन इसका दोष वे विदेशी मच्छरों पर रख देते हैं । खटमलों को लगता है कि खून चूसना उनका धर्म है लेकिन चारपाई खोखली मच्छरों की वज़ह से हुई ।

एक और तरह का सोशल कांस्टीपेशन शुरू हो गया है वह है ट्रोल का कांस्टीपेशन जिसको देखिए बस ट्रोलिंग के ट्रैक पर जज का शूट पहने दौड़ा जा रहा है और जजमेंट के खंभे गाड़ता जा रहा है ।जिसकी ट्रोलिंग हो रही है वह बस भागता जा रहा है ।

इस कांस्टीपेशन का इलाज न आयुर्वेद है और न होमोपैथ में है और न ही एलोपैथ में ।इसका इलाज सोशल साइंटिस्ट कर सकते हैं लेकिन वे भी इस कांस्टीपेशन से ग्रसित हैं ।वे भी एक विशेषाधिकार प्राप्त खटमल ही हैं जो एक तरफ़ खून भी चूस रहे हैं और साथ ही साथ सामाजिक वैद्य बनकर इसकी दवा भी करना चाहते हैं ।
वैद्यकी एक धंधा सी बन गई है ।जो एक कांस्टीपेशन दूर करने चले थे वे दूसरा कांस्टीपेशन पैदा कर दिए ।कांस्टीपेशन से कांस्टीपेशन निकलता होता जाता है और कांस्टीपेशन की एक अनंत श्रृंखला शुरू हो जाती है ।कांस्टिपेशन में ही कंपटीशन शुरू हो जाता है और बड़े- बड़े आकार के बदबूदार कांस्टिपेशन के वृक्ष समाज के कोने कोने में उग आते हैं और सोशल कांस्टीपेशन कभी खत्म नहीं होता है और कहना ही पड़ता है
सोशल कांस्टीपेशन का नो सॉल्यूशन ।

तेज

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