आपसी प्रेम

 आपसी प्रेम

सीमा पटेल ,दिल्ली

तुम पुरुष से नाहक ही
झगड़ती हो
उसके संरक्षण को
पितृ सत्तात्मकता समझ
लड़ती हो
उसके स्वाभिमान को अहंकार समझ भेदती हो
उसके गौरव को दंभ मानकर
रौंदती हो
उससे अनुगृहीत सौगातों को
परम्परा समझ
तोड़ती हो ।

तुम्हें नहीं पता
वो तो निरा मूर्ख है
तुम्हारे प्रेम में पागल है
तुमको ही अपने अस्तित्व में
समाये हुए है
तुमको ही अपने प्रेम में
डुबोये हुए है।

लेकिन ये सब
ज़ाहिर नहीं कर पाता
वो तुमसे अलग नहीं रह पाता ।

और तुम न समझ निरी मूढ़
उसकी विद्रोही बन
अपना जीवन
निर्रथक गवाती रहती हो ।

अगर भेद समझ सको तो
छोड़ो इन सब झगड़ों को
सोचो इन सब से परे
कि,तुम उसकी पूरक हो
और वो तुम्हारा पूरक
अधूरे हो एक दूसरे के बिना
उसकी स्वछंद प्रकृति की
वाहक भी तुम ही हो ।

इसलिये सिर्फ़ ,,,,
आपस में प्रेम करो
प्रेम से जीतो
प्रेम में हारो
अपना
प्रेम !!

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