उल्टा पुल्टा

 उल्टा पुल्टा

तेज प्रताप नारायण

सोचिये कि सर्दी का मौसम हो और आपको कोई कहे कि कपड़े निकाल कर ए सी में बैठकर आप पसीना निकालकर दिखाइये,तो क्या करेंगे आप ? कितना उल्टा लगेगा यह ।

अब मोबाइल का ही ले लीजिये ।सोशल मीडिया
पर भी कई बार ऐसा उल्टा पुल्टा हो जाता है कि मामला बिगड़ जाता है और फिर कंफ्यूज़न ही कंफ्यूज़न ।एक बार कोई टाइप कर रहा था’ आप कहेंगी तो’ लेकिन ‘कहेंगी ‘ सेल्फ फॉरमेट हो गया और
” आप कहेंगी तो ” “,आप महंगी तो ! ” हो गया और
मोहतरमा इसका बुरा मान गयीं ।
फिर भाई साहब स्पष्टीकरण देते हुए थक गये लेकिन समझा नहीं पाये और अंततः माफ़ी माँगकर पीछा छुड़ाया।हालाँकि इसमें न तो मोहतरमा की ग़लती थी और न ही मोहतरम की बल्कि यह भाषायी उपकरण की मेहरबानी समझिए । मतलब सिर्फ़ यह है कि सोशल मीडिया के संवाद भी कई बार उल्टी स्थितियाँ खड़ी कर देते है विशेषकर जब आप उस व्यक्ति से मिले न हों, ऐसे में मौन ही बेहतर उपचार होता है कि सोशल मीडिया पर अनजान लोगों से ज़्यादा बकबक न करके शांति बनायें रखें ।

अब भाषा की ही बात करें तो फलानी भाषा ,उसका व्याकरण और ध्वनि बहुत वैज्ञानिक है लेकिन अफ़सोस तो यह है कि उस भाषा को बोलने वाले कभी वैज्ञानिक नहीं बनते ।कोई वैज्ञानिक आविष्कार नहीं हुए उस भाषा में ।मतलब भाषा वैज्ञानिक और उसको बोलने वाले अवैज्ञानिक ।हुआ न उल्टा पुल्टा।

भारत में ओहदेदार लोगों के साथ भी अकसर ऐसा होता रहता है ।मसलन गाँव वाले प्रधान चुनते हैं कि वह गाँव का विकास करेगा लेकिन वह करने लगता है सत्यानाश । कहाँ से उसूली हो इसकी जुगत में वह पाँच साल बिता देता है ।प्रधान से लेकर सांसद हो या अधिकारी सब उल्टा पुल्टा करते हैं ।क्यों कि उन्हें लगता है जब तक सिस्टम को दही की तरह मथा नहीं जाएगा तब तक मक्खन नहीं निकलेगा और मक्खन नहीं निकलेगा तो फ़िर वे भोग कैसे लगाएंगे और भोग नहीं लगाएंगे तो विकास कैसे होगा और विकास नहीं होगा तो उनका रहना बेकार है ।यह अलग बात है कि यह विकास उनका व्यक्तिगत विकास रहता है । शायद उन्होने खुद बदलोगे जग बदलोगे ,जैसे स्लोगन्स से कुछ प्रेरणा ली होगी और ख़ुद का विकास करो तो जग का विकास हो जायेगा , समझते होंगे ।

लेकिन जब उल्टा को ही सीधा समझ लिया जाये और सीधा को उल्टा ,तब क्या किया जाये ।जब बेईमानी ही जीवन मूल्य हो जाये तब क्या करें जनाब ?तब उल्टा पुल्टा ही रहने दिया । मने जो रुका हुआ है उसे चलता हुआ माना जाये और जो चल रहा है उसे रुका हुआ मान लिया जाये।परिवर्तन का प्रयास न किया जाये ।सही ग़लत को ही सही माना जाये, दूध को ही दही माना जाये और जब सूखा हो तब छतरी ताना जाये ।
उल्टा पैदा होने वाले बच्चे भी विशेष होते हैं जो लात मारकर मुड़ी हुई कमर ठीक कर देते हैं वैसे ही उल्टा सोचने वाले भी क़माल करते रहते हैं ।इनकी सोच के इर्दगिर्द कोई भी नहीं पहुँच पाता है ,दे आर द मोस्ट अंप्रेडिक्टटेबल पर्सन ।आपको पता ही नहीं चलेगा कि वह सोच क्या रहे हैं और सारा प्लान शॉर्टसर्किट होकर रह जाता है ।

इसी तरह जब बचपन में किसी के दिमाग़ में कुछ उल्टा पुल्टा भर दिया जाये, रात को दिन कह दिया जाये तो सोचिये पूरी ज़िन्दगी, बचपन से लेकर बुढ़ापे तक एक इंसान क्या को क्या समझता रहेगा ? जीते जी ही मरता रहेगा ।इसीलिए कहा जाता है कि शिक्षा व्यवस्था बहुत चौचक होगी तो चौचक लोग पैदा होंगे जो ख़ुश रहेंगे और खुशियां बिखेरेंगे और नहीं तो बम,धमाके, दंगा, फ़साद, जिहाद करते रहेंगे ।

तो क्यों न दिमाग़ को थोड़ा झटका दें ,जो लर्न किया है,उसे अनलर्न कर दें और जीरो बेस से नया सीखना शुरू कर दें ।उल्टा सीधा जो दिमाग़ के अंदर फीड है उसे प्रोपेरली अलाइन करें और जो सही नहीं है उसे डिक्लाइन करें और बिल्कुल नये तरह का इंजन डिज़ाइन करें जो सबको आगे लेकर चले ,समृद्धि के लक्ष्य की तरफ़ ,एक आदर्श समाज की ओर जहाँ हो सबके जीवन में भोर ।

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