कुर्सी की महिमा

 कुर्सी की महिमा

तेज प्रताप नारायण

कुर्सी लाल को कुर्सी की बहुत चाहत है । अब नाम ही कुर्सी लाल तो बिना कुर्सी के कैसे रहते ? ग़लती उनकी भी नहीं है, कुर्सी चुंबक की तरह आकर्षित करती है जो बैठता है वह उठना ही नहीं चाहता है। अब अपने ट्रम्प ताऊ को ही ले लीजिये बेचारे जब इलेक्शन हारने लगे तो धाँधली कहने लगे और फिर लगा जब बात नहीं बनेगी तो बोलने ;लगे आई एम् ए बैड लूज़र। कुर्सी की महिमा ही ऐसी है। चाहे कुर्सी लाल हो या मुंशी लाल या सिपाही लाल सब कुर्सी से चिपके तो चिपक ही गए ,मानों कोई फेविकोल लगा के चिपका दिया गया हो।

अब हरि अनंत है और हरि की महिमा अंनत है लेकिन कुर्सी एक है भले ही कुर्सी की महिमा अनंत है ,और कुर्सी के चाहने वाले तो पूछिए ही । मने कुर्सी एक ऐसी प्रेमिका की तरह है जिसके लाखों आशिक़ हैं। सब उसे पाना चाहें और उसका साथ निभाना चाहे ,अब यह अलग बात है कि वह बड़ी नकचढ़ी है किसी किसी के हाथ ही आती है ,पर जिसके हाथ आती है उसकी बल्ले- बल्ले और जिनके हाथ नहीं आई वह बन कर रह जाते हैं, ज़िन्दगी भर निठल्ले। लेकिन एवरीथिंग इज़ फेयर इन कुर्सी स्ट्रूगल। तभी तो आपने देखा होगा कि कुर्सी की खातिर लोग क्या क्या नहीं करते हैं ? ईमान ,धरम ,धन और दौलत सबको गिरवी रखते हैं । कारोना के समय भी राजनीति के मामा जी भी कुर्सी के लिए लड़ पड़े और कुर्सी लेकर माने ।

जितने भी इतिहास में संघर्ष हैं , अक्सर वह आपको कुर्सी के लिए ही मिलेंगे। इतिहास ही क्यों मिथक को ही ले लीजिए। एक भाई को कुर्सी देने के लिए दूसरे भाई को वनवास दे देना या ज़मींन -जायदाद के लिए महाभारत कर देना सब कुर्सी के लिए ही तो है। कुर्सी का संघर्ष ही अर्थव्यस्था चलाती है। तभी तो मार्क्स कहते हैं सबको कुर्सी मिलनी चाहिए जिसकी जितनी तोंद उसकी उतनी बड़ी कुर्सी। मतलब बड़े आदमी बनना हो तो तोंदूमल हो जाइये और बड़ी कुर्सी पा जाइये और सारे जहां में छा जाइये। इतिहास में ले लीजिये और ज़्यादा दूर न जाइये ,जहाँगीर ,शाहजहां ,औरंज़ेब जैसे बादशाह कुर्सी हथियाने के लिए अपने भाई -बहनों तक को मारने से बाज़ न आये। बादशाह ही क्यों ,प्रधान जी ,सरपंच जी ,विधायक और बड़े नेता लोग भी कुर्सी के लिए पता नहीं क्या क्या करते हैं ,ज़िन्दगी भर मारते और मरते हैं। यहाँ तो एक बित्ते ज़मीं तक के लिए अपने भाई लोग दीवानी -फौजदारी कर देते हैं।
एक बात और बता दूँ ,जब कुर्सी लाल को कुर्सी मिलती है तो कुर्सी लाल के भी लाखों दीवाने हो जाते हैं और जैसे कुर्सी गई तो सारे दीवाने बेगाने हो जाते हैं और बिलकुल अनजाने हो जाते हैं लेकिन यह बात कुर्सी लाल जी को समझ नहीं आती। वे तो सोचते हैं कि कुर्सी उनकी दीवानगी पर मर जायेगी लेकिन कुर्सी भी क्या करे उसे तो अपने अन्य आशिक़ों का दिल नहीं तोड़ सकती है ,उन्हें हमेशा के लिए अकेला नहीं छोड़ सकती है। आज कुर्सी लाल के पास है तो कल मिश्री लाल के पास और परसों कहीं और। वह चलायमान है न कि स्थित।

कुर्सी लाल कहते हैं आज कुर्सी है तो आज भौकाल टाइट कर देने दो ,कल की कल देखी जाएगी। इनकी फिलॉसफी लिव इन द द मोमेन्ट वाली है और वैसे भी कल किसने देखा और कल हो न हो तो आज ही मौज़ मना लो और हँस लो । मतलब अपने कुर्सी लाल जी पूरे फक़्कड़ी हैं ,न भूतो ,न भविष्यतो ,कल की बिलकुल फ़िक़्र ना। इसमें ग़लती कुर्सी लाल जी की भी नहीं है अब कुर्सी का नशा ही ऐसा होता है तो क्या करें कुर्सी लाल जी ? नशा शराब में नहीं बल्कि कुर्सी में होता है और जब यह नशा छाता है तो कुछ नहीं सुहाता है ।बस कुर्सी ही कुर्सी और कुछ नहीं ।

हमारे इर्दगिर्द न जाने कितने कुर्सी लाल मिलेंगे जिन्हें सिर्फ़ कुर्सी दिखती है बिल्कुल चिड़ियाँ के आँख की तरह।कहीं कुर्सी दिखी उस पर बैठ लिए और कोई कुर्सी वाला हो तो उसके साथ हो लिए ।कुर्सी ही उनके लिए सब कुछ।कुर्सी की परिक्रमा करते रहो और किसी बात से न डरो ।कुर्सी उनके जीवन का दर्शन है ,कुर्सी ही उनका भजन कीर्तन है । कुर्सी उनके लिए सबसे बड़ा उसूल और बाक़ी सब फ़िज़ूल ।

सो सब बोलो कुर्सी देवी की ।

तेज

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