कौन थे हिरामन और कौन थी हीराबाई? ( रेणु के जन्मशती पर विशेष )

 कौन थे हिरामन और कौन थी हीराबाई? ( रेणु के जन्मशती पर विशेष )

पटना के अनंत सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं जो रेणु जी के जीवन पर सतत शोधकार्य में रत हैं।

हिरामन और हीराबाई जैसे अमूल्य पात्रों की खोज और रचना प्रक्रिया को समझने में मुझे भी काफी वक्त लगा। इसलिए मै यहां अपनी बात शुरू से रख रहा हूं। बचपन में कभी टीवी पर ‘तीसरी कसम’ फिल्म देखी थी। उस वक्त हर घर में टीवी नहीं होता था। जिस घर में टीवी होता था, वहां मोहल्ले के लोग एक साथ बैठकर टीवी देखते थे। मेरी उम्र कम थी और फिल्म का मर्म मेरी समझ से परे था। फिल्म के हीरो-हीरोइन का खेला देख सहसा गंभीर हो गया था। आसपास बैठे कई लोगों के आंखों से आंसू छलक रहेे थे। और कुछ देर बाद मेरे आंखों से भी आंसू टपक पड़े थे। संभवतः इस फिल्म की मार्मिक अभिव्यक्ति से उत्पन्न वातावरण के प्रभाव से मैं भी प्रभावित हुआ था। उस वक्त तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया था। टीवी स्क्रीन का खेला था, खेला समाप्त हुआ। फिर यह बात आयी-गयी हो गई। रेणु की कहानी को वर्ष 2006-2007 में सचेत पाठक की तरह पहली बार पढ़ा। उस वक्त मैने रेणु के जीवन और साहित्य को समग्र रूप से समझने का फैसला किया था।

कहानी के पात्र हिरामन और हीराबाई के चरित्र से काफी प्रभावित हुआ। रेणु के दोनों पात्र इतने असरकारी हैं कि उन्होंने मुझे कई तरह के सवालों में उलझा दिया। तभी मेरे जेहन में सवाल कौंधा ? कौन हैं – हिरामन और हीराबाई? सवाल तो मेरे जेहन में उपजा था, लेकिन मेरे पास इसका जवाब नहीं था। हिरामन और हीराबाई की तलाश यहीं से शुरू हुई। लेकिन कोई सिरा मिल नहीं रहा था।

कुछ ही दिनों बाद रेणु की तीसरी पत्नी लतिका राय चौधुरी का इंतकाल औराही हिंगना में हो गया। लतिका जब पटना में थीं, तब भी मैं उनसे अक्सर मिलने जाया करता था। औराही हिंगना में जा बसीं, फिर भी उनसे मिलना-जुलना जारी था। पारिवारिक-सामाजिक रिश्ते के अनुसार भी लतिका जी के श्राद्धकर्म में शामिल होना मेरे लिए बेहद जरूरी था। औराही हिंगना जाने की योजना बनीं। रेणुजी के दामाद अरूण कुमार सिन्हा एवं अन्य रिश्तेदारों के साथ औराही हिंगना जा रहा था। इस यात्रा में अरूण कुमार सिन्हा के समधी भी थे। समधी साहब ने कहा – ‘‘मैं तो सुना हूँ कि तीसरी कसम का पात्र – हिरामन, हजारीबाग का था।’’ यह मेरे लिए नई जानकारी थी। लेकिन उनके पास भी कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी। इस विषय पर आगे विशेष चर्चा तो नहीं हुई, लेकिन एक धुॅधली जानकारी अवश्य मिली, लेकिन इसके आगे का कोई सूत्र नहीं मिला।

वर्ष 2012 में मुझे झारखंड सरकार द्वारा आयोजित झारंखंड मीडिया फेलोशिप के तहत ‘‘हजारीबाग में लतिका का सामाजिक संघर्ष’’ विषय पर फेलोशिप मिला। इस विषय पर शोध कार्य करने के सिलसिले में मैं हजारीबाग के कुर्रा मुहल्ला स्थित रेणुजी की तीसरी ससुराल पहुंचा। मेरे साथ अरूण कुमार सिन्हा के समधी भी थे। दरअसल वे हजारीबाग में ही रहते थे। उनके सहयोग से लतिका जी के मायके में उनके परिजनों से मिला। बार-बार की मुलाकातों में वे लोग भी पुराना किस्सा-कहानी, संस्मरण सुनाने लगे। रेणु की सरहज (साले की पत्नी) साधाना राय चौधुरी ने एक दिन बातों ही बातों में बताया कि ‘‘मारे गए गुलफाम’’ कहानी का पात्र हिरामन का हमारे परिवार से गहरा रिश्ता रहा है। सिनेमा में हिरामन अर्थात राजकपूर को जिस कपड़े में फिल्माया गया है, ठीक वैसा ही कपड़ा पहनता था – हिरामन। उसी तरह सीधा-साधा, भोला-भाला सच्चा, ईमानदार इंसान था। हाफ बंडीनुमा कुर्ता-धोती पहनता था। कंधे पर गमछा रखता था। वह मेरे घर में ही नौकरी करता था। वह घर का सारा काम देखता था। हमारे परिवार में उसे मालिकाना हक भी प्राप्त था। हमारे घर में हिरामन का काफी सम्मान था। हिरामन का मुख्य काम गाय की सेवा करना था। घर के मालिक की अनुपस्थिति में घर संभालने की जिम्मेवारी भी उसकी ही थी। रेणुजी यहां आते थे तो हिरामन उनकी सेवा में लगा रहता था। रेणुजी से उसकी पहली मुलाकात तब हुई थी जब वह सुबह-सुबह दूध दुह रहा था। दूध दुह रहे हिरामन की नजर जैसे ही रेणुजी पर पड़ी, उसने उनका अभिवादन किया था। दूध दुहने के बाद काला वर्ण, हट्ठा-कटठा, गठीला बदन वाला नौजवान रेणु का पांव छूना नहीं भूला था। उसके सिर पर हाथ रखते हुए रेणुजी ने पूछा था – “आपका नाम क्या है।”

‘‘जी, हिरामन’’

हिरामन की सादगी, शालीनता और उसके सेवा के कायल रेणु भी थे। हिरामन ने रेणु के दिल में जगह बना ली थी। हिरामन लतिका को पीसी तो रेणु को पीउसा कहता था। पटना में रह रही लतिकाजी की भतीजी काॅरवी ने बताया कि – ‘‘पीउसा की मौत की खबर सुनने के बाद बहुत दुःखी हुआ था – हिरामन। वह पटना आकर लतिका पीसी से मिलना चाहता था। पीउसा के गांव औराही हिंगना भी जाना चाहता था। गांव का सीधा-सपाटा इंसान अकेले पटना आने में अक्षम था। घर का कोई सदस्य उसे पटना लेकर आया नहीं। अपनी अंतिम इच्छा को पूरा किये बगैर ही हिरामन चल बसे।” हिरामन सच्चे मायने में इतना भोला भाला था कि हजारीबाग से पटना अकेले नहीं आ सकता था। हजारीबाग से पटना आने के दो ही सुलभ रास्ते हैं। सड़क और रेल। हिरामन बस और रेल की सफर अकेले करने में सक्षम नहीं था। इसलिए उसकी अंतिम इच्छा अधूरी रह गयी।

रेणुजी ने हिरामन के संबंध में लिखा है – ‘‘हिरामन कभी रेलगाड़ी पर नहीं चढ़ा है। उसके मन में फिर पुरानी लालसा झांकी, रेलगाड़ी पर सवार होकर, गीत गाते हुए जगरनाथ-धाम जाने की लालसा।[1] रेणु के ‘मारे गए गुलफाम’ कहानी के ‘हिरामन’ के तरह ही लतिका के मायके का हिरामन भी बिलकुल मासूम इंसान था। रेणु के पात्र ‘हिरामन’ का रूप-रंग, लिबास, उसकी सादगी, भोलेपन एवं मासूमियत हजारीबाग के ‘हिरामन’ से प्रेरित है। ‘मारे गए गुलफाम कहानी के पात्र ‘हिरामन’ पेशे से गाड़ीवान है। गाड़ीवानी में उसे महारत हासिल है। उसकी अपनी भाषा है और बात कहने या गप्प मारने का अपना अंदाज है। हिरामन विशिष्ट भाषा व शैली में बात करता है। उसके पास अपने शब्द हैं। हिरामन के शब्दकोश में जो शब्द हैं, वे शब्द कहीं अन्यत्र सुनने को नहीं मिलेगा। हिरामन के बातचीत करने के लहजे के बारे में रेणु ने लिखा है – ‘‘हिराबाई से बात करने से पहले हिरामन के मन में सवाल उभरता है कि – ‘कचराही बोली में दो-चार सवाल-जवाब चल सकता है, दिल खोलकर गप तो गांव की बोली में ही की जा सकती है।’”’ [2]

बैलगाड़ी हांकना तो रेणु स्वयं भी जानते थे। बैलगाड़ी हांकने की कला के व्यावहारिक पक्ष से बखूबी परिचित भी थे। रेणु का अपना खास गाड़ीवान भी था। रेणु के उस गाड़ीवान का नाम था – ‘कुसुमलाल’। कुसुमलाल को रेणु गाड़ीवान से ज्यादा लंगोटिया यार मानते थे। कुसुमलाल उनके बचपन का मित्र था। बचपन में साथ-साथ खेल-कूद कर बड़े हुए थे। कुसुमलाल रेणु से उम्र में छोटे थे। वे रेणु को बड़े भाई मानते थे। कुसुमलाल रेणु को भइया कहकर ही बुलाते थे। रेणु भी कुसुमलाल लाल को छोटे भाई की तरह मानते थे। कुसुमलाल रेणु के मन और मूड को अच्छी तरह से जानते-समझते थे। रेणु जब भी पटना से चलकर सिमराहा स्टेशन पहुंचते, कुसुमलाल बैलगाड़ी जोतकर खड़ा रहता था। जैसे हीे रेणु की नजर कुसुमलाल लाल पर पड़ती, रेणु समझ जाते कि गांव-घर में सब ठीक है।

दरअसल होता यह था कि रेणु पटना से चलने के पहले खत लिख देते थे। कुसुमलाल सिमराहा स्टेशन के बाहर रेणु की आनेवाली ट्रेन का इंतजार करते थे। कुसुमलाल के स्टेशन पर मौजूद नहीं होने का मतलब था – गांव-घर में उत्पन्न व्याधियों में उनकी व्यस्तता। बैलगााड़ी पर रेणु जैसे ही सवार होते कुसुमलाल गांव-जेवार का किस्सा सुनाना शुरू करता, कुसुमलाल को मन खोलकर गप्प भी करने भी आता था। वह अपनी पोटली में गांव-घर-जेवार का एक-एक गप संजोकर रखता था। रेणु को सिमराहा से औराही हिंगना जाने के रास्ते में कुसुमलाल एक-एक किस्सा सुना दिया करता था। लगभग चार किलोमीटर का रास्ता भी गप सरक्का (बातचीत) में कैसे कट जाता था रेणु को पता भी नहीं चलता था। रेणु जब गांव जाते तब कुसुमलाल से कोई न कोई नया आंचलिक शब्द अवश्य सीखते। रेणु ने कुसुमलाल के संबंध में लिखा है – ‘‘और सबसे बड़ी बात यह कि वह मेरे आंचलिक शब्दों (कहावतों) का एक जीता-जागता शब्दकोष है – गन्ही महतमा, जमेहरलाल, इनकिलास जिन्दाबाघ, फेनूगिलास, भोंपा आदि शब्द मैने उसी से प्राप्त किए हैं। पिछली बार आया तो भूख हड़ताल के लिए एक नया शब्द दिया-खटपासी!’ [3]

मारे गए गुलफाम” उर्फ “तीसरी कसम” के हिरामन की भाषा, संवाद शैली और बैलगाड़ी हांकने की कला कुसुमलाल से प्रेरित है। कहानी के पात्र की तीसरी खासियत है कि वह कला प्रेमी भी है। लोकजीवन के गीत-संगीत में उसकी गहरी रूचि है। वह ग्राम्य गीतों का गायक है। हिरामन सुरजीवी कलाकार की तरह ग्राम्य लोक में व्याप्त गीतों को गाते हुये गाड़ीवानी करता है। हिरामन की तरह रेणु स्वयं ग्राम्य गीतों के गायक है। रेणु सिर्फ कलमकार नहीं बल्कि ग्राम्य जीवन के कलाकार भी हैं। रेणु फगुआ, होली, चैता, बारहमासा, प्रातकी जैसे कई तरह के लोकगीतों के जानकार थे। स्वयं गाते भी थे। रेणु साहित्य में भी ग्राम्य गीतों को चित्रित किया है। रेणु ने अपने बारे में लिखा है – ‘‘मैं लोकगीतों की गोद में पला हूं। इसलिए हर मौसम में मेरे मन के कोने में उस ऋतु के लोकगीतों गूंजते रहते हैं। मैं कहीं भी हूॅ – इन लोकगीतों की स्मृति ध्वनियां मुझे अपने में कुछ क्षण के लिए पहुंचा देती है।’’ [4]

इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि हिरामन के भीतर सुरजीवी कलाकार के रूप में रेणु स्वयं हैं और ‘हिरामन’ किसी खास व्यक्ति से प्रेरित नहीं है। हिरामन को गढ़ने में रेणु ने हजारीबाग से लेकर पुर्णिया अंंचल में बसे विशिष्ट लोगों के गुणों को लिया है। फिर उसमें स्वयं को भी शामिल किया है। कहानी के पात्र का नाम और उसका पहनावा-ओढ़ावा, सादगी, मासूमियत आदि गुणों को हजारीबाग स्थित लतिका के घर में कार्यरत ‘हिरामन’ से प्रेरित है। गाड़ीवान की बोली, भाषा, आंचलिक शब्दावली और गाड़ीवानी की कला को अपने गाड़ीवान लंगोटिया यार कुसमलाल से लिया है।

प्रसिद्ध कथाकार राॅबिन शाॅ पुष्प ने रेणु की याद में एक पुस्तक लिखा था, उसका नाम ही था – उड़ गया सोने का हिरामन- फणीश्वरनाथ रेणु। लतिकाजी से मैने एक बार बातों ही बातों में पूछा था कि – ‘‘आपके जीवन का हिरामन कौन है?” पटना के राजेन्द्र नगर गोलम्बर को खिड़कियों से निहारते हुए तब वह बोली थीं – “और दूसरा कौन हो सकता है? वह हिरामन उड़ गया? अर्थात हमारा हिरामन [रेणु] अब हमारे साथ नहीं है।’’

अब सवाल उठता है कि रेणु ने हीराबाई को कैसे रचा? हीराबाई के रूप-स्वरूप केे चित्रण से प्रतीत होता है कि इसकी रचना प्रक्रिया ‘हिरामन’ के अपेक्षा जटिल रही होगी। ‘हीराबाई’ के चित्रण में रेणु ने बिम्बों और प्रतीकों का सहारा लिया है। ‘हीराबाई’ के चरित्र का फलक भी विराट है। ‘हीराबाई’ न तो यथार्थ की उपज है और ना ही सिर्फ कल्पना की। रेणु ने कल्पना और यथार्थ का मिश्रण कर ‘हीराबाई’ को रचा हो, ऐसा भी प्रतीत नहीं होता। अव्वल तो ‘हीराबाई’ रेणु के अंचल की वासी नहीं है। वैसे, हीराबाई का रेणु के अंचल में आवाजाही रही है। हिरामन, हीराबाई से पूछता है – ‘‘आप किस जिल्ला से आई हैं।’’ ‘‘कानपुर’’[5]

कानपुर से आई ‘हीराबाई’ को चम्पानगर मेला से फारबिसगंज पहुंचाने की जिम्मेवारी गाड़ीवान हिरामन को मिली। चम्पानगर से फारबिसगंज की दूरी 30 कोस है। फारबिसगंज मेला से गढ़बनैली मेला ‘हीराबाई’ रेलगाड़ी पर सवार होकर लौटती है। इससे स्पष्ट है कि फारबिसगंज जाने के लिए रेलगाड़ी की सुविधा उपलब्ध थी। फिर भी हीराबाई को रातों-रात बैलगाड़ी से भेजा गया। इसे समझने की आवश्यकता है क्योंकि इसका गहरा संबंध ‘हीराबाई’ की रचना प्रक्रिया से है। यह कहानी उस दौर में रची गयी है, जब ग्रामीण इलाके में व्यवस्थित बाजार नहीं थे। व्यवस्थित बाजार थे भी तो उनकी संख्या नगण्य थी। बाजारों का स्वरूप भी बहुत संक्षिप्त था। व्यवस्थित बाजार नहीं होने के कारण फिल्मों का प्रवेश नहीं हो पाया था। ग्रामीण क्षेत्रों में मेला लगता था। मेला ही ग्रामीण हलके के लिए अल्पकालिक बाजार हुआ करता था।

रेणु ने अपने इलाके में लगने वाले मेले यथा – गढ़बनैली, मदनपुर, चम्पानगर, गुलाबबाग, फारबिसगंज आदि का जिक्र साहित्य में किया है। मेलों का जनजीवन से गहरा जुड़ाव था। दूर-दराज से आये लोग मेला में ही रात्रि विश्राम भी करते थे। इसलिए मनोरंजन के साधनों की जरूरत पैदा हुई। मेला के दर्शकों की इसी जरूरत ने मेले में मनोरंजन के साधनों के लिए स्थान सृजित किया। मेलों में नाटक, नौटंकी, नाच-गान करने वाले भी शिरकत करने लगे। जिससे मेला ग्रामीण जीवन के लिए उत्सव बन गया। मेला उत्सव में ‘नौटंकी’ आकर्षण का केन्द्र बना। नौटंकी की धूम से आर्थिक पक्ष का गहरा जुड़ाव था। इसलिए नौटंकी कंपनियों के बीच गर्दन काट प्रतिस्पर्धा ने भी जन्म लिया। दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली फनकारा की मांग बढ़ने लगी। नौटंकी की नायिका के नाम पर भीड़ उमरती थी। नौटंकी कंपनी वालों के बीच दूसरे कंपनी की अच्छी कलाकार को अपने स्टेज पर उतारने की होड़ मचने लगी। खरीद-फरोख्त का भी खेल शुरू हुआ। जैसा कि रौता संगीत नाटक कंपनी वाले मेले में ढ़िढोरा पीटकर कहते है – ‘‘गुलबदन देखिए, गुलबदन! आपको यह जानकर खुशी होगी कि मथुरा मोहन कंपनी की मशहूर एक्ट्रेस मिस हीरादेवी, जिसकी एक-एक अदा पर हजार जान फिदा है, इस बार हमारी कंपनी में आ गई हैं। याद रखिए। आज की रात। मिस हीरादेवी गुलबदन।’’[6]

हीराबाई मथुरा मोहन कंपनी की नायिका थी। उसकेे लिए स्टेज शो करती थी। चम्पानगर मेले में ही हीराबाई मथुरा मोहन कंपनी को छोड़ रौता संगीत नाटक कंपनी से जुड़ गयी थी। हीराबाई और रौता संगीत नाटक कंपनी के बीच हुए सौदेबाजी की जानकारी मथुरा मोहन कंपनी वालों को नहीं थी। रौता नाटक कंपनी ने चुपके-चोरी हीराबाई को फारबिसगंज पहुंचाने की योजना बनाई। इसकी भनक किसी को न लगे, इसका विशेष ख्याल रखा गया। चंपानगर से फारबिसगंज जाने के दो मार्ग थे। पहला था रेलमार्ग और दूसरा सड़क मार्ग। रेलमार्ग सबों के लिए जाना-पहचाना मार्ग था। इससे फारबिसगंज पहुंचना तो आसान था। लेकिन भेद खुलने का भय था। सड़क मार्ग का रास्ता कठिन था। बैलगाड़ी के सिवा कोई दूसरा साधन उपलब्ध नही था। रात के वक्त जनानी सवारी बैलगाड़ी की यात्रा कर सकती है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था। इसलिए रौता संगीत नाटक कंपनी वालों ने हीराबाई को रातो-रात पगडंडी मार्ग से फारबिसगंज मेला पहुंचाने की योजना बनाई। यह एक गुप्त समझौता था ‘हीराबाई’ और रौता संगीत नाटक कंपनी के बीच। इस समझौते के अपने खतरे थे। अव्वल तो हीराबाई की जान को खतरा था। हीराबाई के साथ कोई भी अनहोनी घटना घटित हो सकती थी। रौता संगीत नाटक कंपनी को आर्थिक घाटा सहना पड़ सकता था। थाना-पुलिस और मुकदमा तक की नौबत आ सकती थी।

रेणु ने कहानी में भी इस तथ्य का खुलासा किया है। नौटंकी के दृश्य का चित्रण करते हुए उन्होंने रौता संगीत नाटक कंपनी के मैनेजर के हवाले से लिखा है – ‘‘यह सारी बदमाशी मथुरा मोहन कम्पनी वालों की है। तमाशे में झगड़ा खड़ा करके कम्पनी को बदनाम … नहीं हुजूर, इन लोगों को छोड़ दीजिए, हीराबाई के आदमी हैं। बेचारी की जान खतरे में है। हुजूर से कहा था न!’’[7]

अब सवाल उठता है कि रेणु को हीराबाई पात्र गढ़ने की प्रेरणा कहां से मिली होगी? कहानी में चित्रित नौटंकी की बारीक व्याख्या से स्पष्ट होता है कि रेणु को नौटंकी के बारे में गहरी जानकारी थी। संभव है कहानी में चित्रित कुछ प्रसंग उनके भोगे हुए यथार्थ का हिस्सा हो। इसे समझने के लिए मैं उनके कई करीबियों से मिला, लेकिन कोई विशेष जानकारी नहीं मिली। अररिया आर एस के रहने वाले रेणु के मित्र रामानन्द सिंह विरान ने बातों ही बातों में बताया था कि – ‘‘मेले के मौसम हमलोग अक्सर नौटंकी देखने जाया करते थे। रेणु के साथ पूर्णिया, गढ़बनैली, फारबिसगंज के मेला में कई बार नौटंकी देखा था। मेलों में रेणु शिरकत किया करते थे। रेणु नाटक-नौटंकी के पोसींदा थे, नौटंकी देखना उनके शगल में शामिल था। रेणु सिर्फ नौटंकी के दर्शक नहीं थे। वे नौटंकी में काफी दिलचस्पी रखते थे। नौटंकी वालों से संपर्क कर उसके रिहर्सल स्थल तक पहुंच बनाये हुए थे। इस इलाके में नौटंकी कई मशहूर कंपनी आती थी। सबों के पास पास एक से बढ़कर एक अदाकारा रहती थीं। लेकिन जो रूतबा और शोहरत गुलाबबाई की थी, किसी और की नहीं। ‘तीसरी कसम’ की हीराबाई की शोहरत तो गुलाबबाई से प्रेरित लगती है। गुलाबबाई की अदाकारी के प्रशंसक स्वयं रेणु भी थे। उन्होंने यह भी बताया कि जब कोई खुबसूरत अदाकारा स्टेज पर आती थी तो लोग कहते थे ‘हीरा छौं हीरा’!’’ अर्थात हीरा की तरह बेशकीमती। कहानी में रेणु ने शायद जनमानस द्वारा अदाकारा को दी गयी उपमा से प्रेरित होकर कहानी की नायिका का नाम – ‘हीराबाई’ रखा है। ‘हीराबाई’ के नाम को कचराही भाषा में ‘हिरिया’ कर दिया है।

फारबिसगंज मेला में नौटंकी देखने पहुंचे एक दर्शक के हवाले से रेणु ने लिखा है – ‘‘हिरिया जब स्टेज पर उतरे, हमको जगा देना।’’[8] इससे प्रतीत होता है कि गुलाबबाई से कहानी की नायिका ‘हीराबाई’ की शोहरत को लिया गया है। कहानी में रेणु ने जिस हीराबाई को गढ़ा है, वह गुलाबबाई की तरह प्रतीत नहीं होती है। हीराबाई का रूप स्वरूप अत्यंत ही विषिष्ट है। मुझे लगता है कि हीराबाई के चित्रण में रेणु ने नौटंकी के इतिहास से बिम्ब और प्रतीक को लिया है। रेणु की ‘हीराबाई के रूप-स्वरूप और उसकी अदाकारी के संबंध में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि वर्ह अजगुत किस्म की नर्तकी है। जैसा कि रेणु ने लिखा है – ‘‘और, यह जनानी सवारी। औरत है या चम्पा का फूल। जब से गाड़ी मह-मह महक रही है।’’[9]

संदर्भ :

[1] रेणु रचनावली, भाग-1, संपादक – भारत यायावर, पृष्ठ 162,राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

[2] वही, पृष्ठ-141

[3] वही, पृष्ठ-192

[4] वही, पृष्ठ-476

[5] वही, पृष्ठ-142

[6] वही, पृष्ठ-155

[7] वही, पृष्ठ-159

[8] वही, पृष्ठ-158

[9] वही, पृष्ठ-139

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