खेतों की पगडंडियों से गुज़रती किसान कवि लक्ष्मी कान्त मुकुल की लंबी कविता

 खेतों की पगडंडियों से गुज़रती किसान कवि लक्ष्मी कान्त मुकुल की लंबी कविता

सतीश कुमार सिंह ,समीक्षक,छत्तीसगढ़

छायावाद और छायावादोत्तर काल से लेकर समकालीन हिंदी कविता तक लंबी कविताओं का एक दौर चलता रहा है और आज भी नये पुराने सभी रचनाकार समय समय पर इसमें हाथ आजमाते रहे हैं । इसमें कोई दो राय नहीं कि इन लंबी कविताओं में कथ्य की नवीनता , भाषा और भाव संवेग की तारतम्यता को बनाए रखने में कवि को बहुत मशक्कत करनी पड़ती है । किसी एक विषय या संदर्भ पर केन्द्रित इन रचनाओं में विचार और संवेदना के इतने तल उभरते हैं कि उसके सभी पक्षों पर एक सम्यक दृष्टि जाती है तथा बहुत कुछ नये परिप्रेक्ष्य भी सामने आते हैं । यहाँ कवि अपने सूक्ष्म अवलोकन से ऐसे विंब और रूपक रचता है कि सभी परिदृश्य परिचित जान पड़ते हैं लेकिन अगर वह इसमें चूक गया तो कविता का पूरा ढाँचा ही लुढ़क जाता है । कविता में इस तरह के ख़तरों को उठाना सचमुच हिम्मत का काम होता है । कवि पर इस बात का भी रहता है कि वह पाठक को इस बीच अपने से जोड़कर रखे और उसकी आगे की जिज्ञासा तथा रोचकता पाठ के दौरान बनी रहे । निराला से लेकर मुक्तिबोध तक लंबी कविताओं के सृजन की एक श्रृंखला है । प्रख्यात आलोचक नंदकिशोर नवल की आलोचना पुस्तक ” निराला और मुक्तिबोध- चार लंबी कविताएं ” में उन्होंने निराला की दो लंबी कविता ” सरोज स्मृति और ” राम की शक्तिपूजा ” तथा मुक्तिबोध की दो कविता ” अंधेरे मे ” तथा ब्रम्हराक्षस ” को केंद्र में रखकर विस्तार से चर्चा की है । इसी तरह से यदि हम धर्मवीर भारती के ” कनुप्रिया ” को लें तो वह प्रेम का ऐसा अनूठा और रसमय आख्यान है कि एक बार पढ़ना शुरू करेंगे तो अंत तक पहुँचे बिना मन नहीं मानता । इसको एक नहीं कई कई बार पढ़ने पर भी उसका आस्वाद कम नहीं होता साथ ही नये अर्थ संदर्भ भी विषयवस्तु के साथ उभरकर सामने आते हैं । यह भी एक लंबी कविता है जिसे नये दृश्यबंध के साथ भारती जी ने सर्गों में विभाजित किया है । शायद इसके पीछे उनकी यही मंशा रही है कि प्रेम नित नया है जिसकी अनुभूतियों में कुछ न कुछ निरंतरता के प्रवाह में जुड़ता ही चला जाता है । प्रत्येक सर्ग में पाठक इस नवीनता को ” कनुप्रिया ” में कुछ कुछ अंतराल में पढ़ते हुए महसूस कर सकते हैं । इस सबसे इतर लंबी कविता का सृजन जनपदीय रचनाओं में भी इन दिनों दिखाई पड़ रहा है । गाँव, जवार , मुहल्ले, टोले से होकर खेत , खलिहान तक इसकी पहुँच बनाने में कुछ रचनाकार लगे हुए हैं और वे सफल होते भी नज़र आ रहे हैं ।
किसान कवि लक्ष्मीकान्त मुकुल की हिंदी और भोजपुरी में रचित लंबी कविता ” घिस रहा है धान का कटोरा ” किसानी जीवन और लोक समाज की संवेदनापरक अंतर्धारा को अतीत और वर्तमान के साथ चित्रित करने में समर्थ है । कवि ने अपनी ग्राम्य जीवन की अनुभूतियों को 17 भागों में विभाजित कर छोटी छोटी रचनाओं में एक ही कथ्य को अलग-अलग रूपों में अपनी सघन वैचारिकता के साथ रखने का प्रयास किया है । वे प्रश्नाकुलता के साथ कृषि संस्कृति के भिन्न-भिन्न स्वरूपों की व्याख्या करते हुए खेती – किसानी की सामयिक चुनौतियों को भी रेखांकित करते हुए इन कविताओं में चलते हैं जहाँ बदलते मूल्यों के साथ गाँवों में हो रहे परिवर्तनों को भी इसी भावपक्ष में समोने का यत्न करते हुए संस्कृतिकरण के साथ वर्ग संरचना का भी एक खाका प्रस्तुत करते वे नजर आते हैं । उनकी इस लंबी कविता की पहली रचना धरती की उर्वरता और हरियाली का ऐसा दृश्य उपस्थित करता है कि पाठक को खेतों की मेढ़ पर खड़े होने का अहसास होने लगता है –

जिधर देखो उधर / फैले हैं धान के खेत /
सद्य प्रसूता की तरह/ गोभा की कोख से निकलकर/ चौराते कच्चे , अधपके बालियों के गुच्छे/ डुलते हुए नहरपार से आती / किनारों से बहती / पूर्वी पश्चिमी हवाओं के झोंकों से / जैसे लहरा रहा हो विशाल समुद्र

इस दृश्य से एक परिचय कराते हुए कवि अपनी लंबी कविता की बुनियाद रखता है । वह खेती के सांस्कृतिक इतिहासबोध को भी अपनी इस रचना यात्रा में लोकविश्रुत कथाओं में तलाशता है । उसके लिए कृषि के संबंध में जो इतिहास पुस्तकों में दर्ज है वह उतना मायने नहीं रखता जितना कि दादी – नानी की कहानियों में वह किवंतियों के साथ सुरक्षित है । इसके बहाने लक्ष्मीकान्त मुकुल पीछे की ओर मुड़ते हैं और अतीतजीविता से बंधे हुए अपने वर्तमान से भी दो – चार होते हैं । इसमें वे सगुन पाखी को भी शामिल करते हुए काव्य के समष्टि गत चेतना को भी बचाए रखना चाहते हैं जिसमें किसान के साथ पशु पक्षी और कीट पतंग भी उनके सहचर हैं –

देख देख हुलस रहा किसान का सगुना / इतिहास की लंबी परंपरा का वाहक / सनातन काल से करते हुए खेती / दादा लकड़दादा के जमाने से ही नहीं/ उसके पूर्व से जब पहली बार हुए थे धान परती में / सुनता आया है वह दादी – नानी से कहानियाँ/ जब धान के कंसो से उपजते थे चावल
बदला जमाना / बदलते गये लोग बाग / स्वभाव , चरित्र, चाल ढाल / वे खेतों के दाने में लटक रहे चावल के दाने को / कच्चा चबा जाते थे / या दूसरों के खेतों के चावल झाड़ देते लग्गी से / आखिरकार कुदरत ने खोज लिया / अन्न को बचाने का उपाय / चावल के ऊपर लगा दी खोल नोकदार

कवि यहाँ पर चावल के ऊपर चढ़े खोल को सामने रखकर अन्न की सुरक्षा के लिए प्रकृति की मेहरबानी मानता है और इसे लोक में व्याप्त कथानक से संयुक्त करता है । प्रत्येक अंचल का अपना लोक विश्वास होता है । किसान कवि इस पर प्रतिवाद नहीं करता और न ही इस बात की तह तक जाता है । वह सीधे सीधे इसे स्वीकार लेता है । वह इस लोकधारा में बहते हुए लोकगीत , पुराने कृषि उपकरणों बदलते मूल्य और रीति रिवाज की भी पड़ताल पीछे मुड़कर करता है ।

बदलता गया जमाना / बदलते गये समाज के रिवाज / खेती के औजार , बैलों की जोड़ी / हल , जुआठ , हेंगा , ढेंका , जांत , ओखल – मूसल / सिमटते गये शुभ मुहूर्त में अक्षत छींटे का रिवाज / विवाह के समय गीतों के बोल -” एने के धनवा ओने के धनवा एके में मिलाव रे ”

हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डाॅ. रमाकांत शर्मा अपनी पुस्तक ” आलोचना की लोकधर्मी दृष्टि ” में कहते हैं कि – ” क्रियाशील जीवन के ऐंद्रिक बिंब विचार – खनिज और जीवन द्रव ही कविता का प्राण है । एक मुकम्मिल कविता का साथ श्रव्य और दृश्य होती है । कविता का स्वभाव गहन शब्द साधना और कला संयम की मांग करता है । महत्वपूर्ण कवि वह होता है जो साँचे बनाता है , बार बार उन्हें तोड़ता है और नये साँचे की तलाश में निकल पड़ता है । अच्छी कविता साधारण होते हुए भी असाधारण होती है । ”
डाॅ. रमाकांत शर्मा जी के कथन के इस आलोक में अगर देखें तो कविता को लेकर वायवीय बातों का पहाड़ खड़ा करने वाले लोगों से हटकर साधारण विषयों पर कवि के जीवनानुभव से जो कविता पककर आती है उसका ज्यादा मूल्य है । उन्होंने कविता के संबंध में जिस दृश्य और श्रव्य की बात कही है मुकुल इन शर्तों को अपनी इस रचना में पूरी करते जान पड़ते हैं –

मानसून की पहली बूँदों में/ भीग रहा है गाँव/ भीग रहे हैं जुते – अधजुते खेत / भीग रही समीप बहती नदी / भीग रहा है नहर किनारे खड़ा पीपल वृक्ष / हवा के झोंके से हिलती भीग रही है बेहया , हंइस की पत्तियां/ भीग रही हैं चरती बकरियां/ भीग रहा है खंडहरों से घिरा मेरा घर

यहाँ बूंदों की ध्वनि के साथ जो दृश्य उपस्थित है वह हमें मानसून के बादलों के साथ गाँव की सैर करा लाता है । ध्वनि और दृश्य जैसे एकाकार हो गये हों इस तरह का भाव यह कविता जगा जाती है । यह कविता जब आगे बढ़ती है तो और भी ढेर सारे दृश्यों को अपने में समेट लेती है जिसमें प्रेम की कुछ अनगढ़ और लहरदार स्थितियां भी ध्यान खींचती हैं और कवि के भीतर की सरसता का अनुभव कराती हैं ।
इस लंबी कविता की टुकड़ियों में किसान से मजदूर बनते जा रहे छोटे किसानों के दुख- दर्द और पलायन पर भी कवि की दृष्टि जाती है और वे आज के समय की जायज चिंता को बड़ी साफगोई के साथ रखते हैं –

आरा – दिनारा के दुलरूए / छोड़ते जा रहे हैं धान के इस देश को / जैसे धनखर खेती की पहचान जताने वाले / गायब होते गये पुआलों की गांज / वे फैलते गये / गुजरात की कपड़ा मिलों/ मुम्बई की फैक्ट्रियों, आसाम के चाय बागानों/ गिरमिटिया बन माॅरीशस , फिजी , सूरीनाम और न जाने कहाँ कहाँ/सपनों की मृगतृष्णा की खोज में

लक्ष्मीकांत मुकुल ने धान की कुछ देसज किस्मों की उपज को लेकर उसके कहीं भी उग आने और गरीब गुरबा लोगों के लिए जीने का साधन बन जाने को जिस तरह अपनी इस लंबी कविता में पिरोया है वह ध्यान देने योग्य है । कुछ धान के पौधे यहाँ वहाँ बिखरे हुए होते हैं और उनकी पकी हुई बालियों को अपनी टोकनियों में कामगार महिलाएं चुन लेती हैं और उससे उनके परिवार का पेट पलता है । इन श्रमशील महिलाओं के इस परिश्रम से चुने गये दानों पर भी शोषक वर्ग की कुदृष्टि रहती है जिसे अच्छी तरह से इस रचना में सहेजने का यत्न किया है कवि ने –

कहीं भी हो सकता है धान का कटोरा / समतल मैदानों में , पहाड़ की घाटियों – तलहटियों में/ राहसबदल चुकी नदियों की छाड़न में/ देखा था न तुम्हें सुरहा ताल में/ छिटुआ बोए धनकटनी को / लहरों के ऊपर धान – पौधों के मथेला सूर्य की तेज किरणों में चमकते हुए / सुगापंखी , सिंगारा , करियवा , टुंडहिया , दुललाची जैसी किस्में पसरी थीं अथाह जलराशि में/ डोंगी पर चढ़कर मलूलाह स्त्रियाँ झटका देकर कैसे काटती थीं धान की बालें / जिसे देखकर जलती आँखों से घूरते थे वहाँ के ठेकेदार , दलाल , पटवारी / नोच लेने को उनके श्रम के सारे मोल

कवि का चूँकि खेती किसानी से सीधा वास्ता है इसलिए वह धान की रोपाई से लेकर निराई – गुड़ाई और उसके पकने , खलिहान तक आने मिंजाने और बाज़ार तक आने की पूरी यात्रा अपने चिर-परिचित लोक शैली के गीतों के साथ कराते हैं । यहाँ अलग अलग धान की पुरानी , नई किस्मों तथा देसज औजारों की चर्चा के अलावा आधुनिक कृषि यंत्रों की तकनीक , धरती की उर्वरता , अतिवृष्टि , किसान की दुरूहता , शोषण के महाजनी तंत्र का इतनी सहजता से क्रमबद्धता है कि लगता है कवि अपनी मिट्टी से गहरा लगाव रखते हुए उस पीड़ा को जी रहा है जो सदियों से किसान की नियति बनी हुई है । हिंदी ही नहीं वे अपनी भोजपुरी भाषा में भी अपनों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए इसी तर्ज पर ” भरकी में चहुपल भईसा ” लंबी कविता रचते हैं । अपनी बोली – बानी में वे वही दृश्य उपस्थित करते हैं जिससे दो चार उनके अंचल का कृषक समुदाय होता रहा है –

आवेले ऊ भरकी से / कीच पांक में गोड़ लसराइल / आर- डंडार प धावत चउहदी / हाथ म पोरसा भ के गोजी थमले / इहे पहचान रहल बा उनकर सदियन से / तलफत घाम में चियार लेखा फाट जाला / उनका खेतन के छाती / पनचहल होते हर में नधाइल बैलहाटा के / बर्घन के भंसे लागेला ठेहुन / ट्रेक्टर के पहिया फँस के / लेवाड़ मारेले हीक भ / करईल के चिमर माटी चमोरे देले / उखमंजल के हाँक – दाब

मैंने इस भोजपुरी में लिखी गई रचना की एक बानगी भर पेश की है । आगे इसमें ढेर सारे किसानी जीवन के संदर्भ आपस में गुँथे हुए चले आते हैं । कवि लक्ष्मीकान्त मुकुल अपने काव्य सरोकारों के साथ अपने परिवेश को बुनने में इन कविताओं में सफल हुए हैं ऐसा मेरा मानना है ।
बिहार के जिला रोहतास के एक गाँव मैरा में रहकर वे सृजनरत हैं और कविता के अलावा , ग्रामीण इतिहास , आदिवासी जीवन , स्त्री संघर्ष, युवा लेखन , दलित साहित्य विषयक लेख लिखकर वे हस्तक्षेप भी करते रहते हैं । हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेजी में समान अधिकार रखने वाले विधि स्नातक इस युवा कवि ने अपने गाँव में रहकर कृषक जीवन को चुना और प्रगतिशील मूल्यों से भी उनका नाता है । संप्रति वे बक्सर जिला के प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव हैं और निरंतर कुछ नया करते रहते हैं । उनसे लोकधर्मी जनपदीय कविता संसार की बहुत उम्मीदें हैं । मैं यह समझता हूँ कि लंबी कविता की बड़ी भूमिका नहीं होनी चाहिए इसलिए कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं का ही मैंने जिक्र किया है । आगे कविता के पाठक तय करेंगे । यह उनका अपना अधिकार है । कवि मुकुल की काव्या दक्षता को धूयान में रखते हुए मैं यही कहूंगा कि उनकी लिखी हुई इस लंबी कविता का हिंदी और भोजपुरी में यथोचित आदर होगा ऐसा मेरा विश्वास है । युवा कवि को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं

पुराना काॅलेज के पीछे , जांजगीर
जिला – जांजगीर-चांपा ( छत्तीसगढ़ ) 495668
मोबाइल नंबर- 94252 31110

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