जो बिकेगा वही दिखेगा

 जो बिकेगा वही दिखेगा

तेज प्रताप नारायण

जब बिकना ही एक मात्र पैमाना हो जाये और दुनिया सिर्फ़ एक बाज़ार हो जाये, .तो बस बिकने की होड़ होने लगती है । तरह -तरह के बाज़ार और तरह- तरह के खरीदार। ज़मीर बेच दो, शरीर बेच दो ,दूल्हा बेच दो ,दुल्हन बेच दो ,घर बेच दो ,खेत बेच दो , ज़मीन बेच दो ,जो भी बेच सको बेच दो । क्या फ़र्क़ पड़ता है ? बस बिको और बिकते रहो

अब अख़बारों को ही ले लीजिए। वे खबरें इसलिये नहीं छापते हैं कि उन्हें ख़बरें छापना है या पत्रकारिता उनका धर्म है या लोकतंत्र के वे प्रहरी हैं। उन्हें ख़बरें इसलिए छापना है क्यों कि उन्हें ख़बरें बेचना है। इसका सीधा मतलब है जो ख़बरें बिकेंगी वही छपेंगी या दिखेंगी और जो नहीं बिकेंगी वे नहीं दिखेंगी चाहे वह कितनी ही ज़रूरी ख़बर क्यों न हो ? अपने अख़बारों या चैनलों का काम सिर्फ़ टी आर पी बढ़ाना है। अख़बार ही क्यों जब जनता को भी यही पसंद हैं ? अब करीना कपूर के छोटे बच्चे ने किस कलर की नैपी पहन रखी है यह ख़बर ज़्यादा हिट और वायरल होगी न कि यह ख़बर कि धरती लगातार गर्म हो रही है। धरती गर्म हो रही है तो होने दो अब अख़बार वालों या टी वी वालों को करीना के बच्चे में इंट्रेस्ट है तो क्या करें ? आख़िर ! बेबो के बेबी का स्वागत होना चाहिए कि नहीं ? धरती का क्या, वह तो गर्म और ठंडी होती रहती है । वैसे भी धरती का सुख -दुःख देखने का काम पर्यावरणविदों और वैज्ञानिको का है न कि मीडिया वालों का। जिसका काम उसी को साजे और करें तो डंडा बाजे। अब जब किसी को इस ख़बर में इंट्रेस्ट नहीं है तो
मीडिया वाले क्यों इस पर ध्यान दें? साफ़ हवा सबको चाहिए न कि केवल मीडिया वालों को।

आतंकवाद की ख़बर ही ले लीजिये। पूरी दुनिया में आतंकवाद से मरने वालों की संख्या औसतन 25000 हज़ार वार्षिक है जब कि पूरी दुनिया में सड़क दुर्घटना से क़रीब 13 लाख लोग हर साल मर जाते हैं ,वहीँ वायुप्रदूषण से क़रीब 7.5 मिलियन लोग सालाना मरते हैं लेकिन इसके बावजूद जितनी चर्चा आतंकवाद की होती है उतनी शायद सड़क दुर्घटना या वायु प्रदूषण के लिए नहीं होती है। कारण साफ़ है जो ख़बर बिकेगी वही दिखेगी। गोलियों का शोर बिकता है लेकिन वायु पदूषण के साइलेंट किलर के लिए मीडिया के मुँह पर ताला है।

अब बिकना भी रियल और वर्चुअल हो सकता है लेकिन बिकना ज़रूरी है। बस ऐसा माहौल बना दीजिये कि जनता को लगने लगे कि यह माल बिकाऊ है। वो क्या कहते हैं हवा बनाना अब हवा चाहे जैसी हो। हवा तो हवा है और फिर हवा को क्या हुआ है या हवा कैसी हवा है, उससे क्या मतलब ? तो हवा बनाइये और बिकते रहिये और साथ में दिखते रहिये। किताब के अंदर क्या लिखा है उस पर मत जाइये ,बस कवर पेज देख कर किताब खरीद लीजिये। जैसे आजकल सोशल साइट्स पर पोस्ट को बूस्ट करने का विकल्प है। आप पेज या प्रोफाइल बनाइये और उस पर बूस्ट लगा दीजिये। आपके फॉलोवर्स हज़ारों ,हज़ार बढ़ जाएंगे और आप देखते-देखते ही सेलिब्रिटी बन जाएंगे जिनके हज़ारों फॉलोवर्स होंगे। या यूँ कीजिए एक किताब लिखिए और एक साथ उसकी एक हज़ार कॉपी खरीद लीजिये और ऐमज़ॉन के बेस्ट सेलर लेखक बन जाइये । वैसे अब सब कुछ वर्चुअल बिकने लगा है। रुपया भी वर्चुअल हो गया है। अब तो पढाई तक वर्चुअल होने लगी है अब कहीं रिश्ते न वर्चुअल हो जाएँ और लोग वर्चुअल को ही असल मान लें।

तो आपने अब तक अपनी ज़िन्दगी में क्या क्या बेचा ? अगर नहीं बेचा है तो बेचना शुरु कीजिये। कुछ डिसइन्वेस्ट कीजिये ,आई पीओ निकालिये। अगर आप बहुत संवदेना वाले हैं और घर ,द्वार ,शरीर ,ज़मीर ,देश या खेत नहीं बेच सकते हैं तो दुःख ,फ़्रस्टेशन ,जलन या चेहरे की शिकन ही डिसइन्वेस्ट या डिमोनेटाइज़ कर दीजिये ? बाज़ार का ज़माना है तो व्यापारी तो बनना ही पड़ेगा ,कुछ न कुछ बिकना पड़ेगा और खरीदना पड़ेगा।
वैसे देखते हैं कि यह व्यंग्यात्मक लेख कितना बिकता है ?

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