डायरी का पीला वरक़: प्रेम का एक वृहद आख्यान

 डायरी का पीला वरक़: प्रेम का एक वृहद आख्यान

कविता संग्रह: डायरी का पीला वरक

लेखक: सुशील द्विवेदी

मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम कहा था ।लोग धर्म के अफ़ीम के नशे में इतना गुम हो गए हैं कि उन्होंने ख़ुद को विस्मृत कर दिया है कि वे अफीम नहीं ,वे धर्म भी नहीं हैं बल्कि एक इंसान हैं और इंसान होने के नाते उनके भी कुछ कर्तव्य हैं ।लोगों को सिर्फ़ धर्म याद रहा और इंसानियत को कहीं चौराहे पर छोड़ दिया है बेसहारा सा ।
कवि सुशील भी धर्म को दुनिया का सबसे डरावना शब्द कहते हैं और इस डरावने शब्द से विश्व भयाक्रांत है ।

” दुनिया का सबसे भयावह शब्द था
‘ धर्म ‘
जिसके शिकार हुए थे हम ।”

आज भारतीय समाज और राजनीति के केंद्र में धर्म आ गया है और वैज्ञानिकता ,धर्म निरपेक्षता ,मानववाद जैसे शब्द हाशिए पर जाते हुए से दिखाई दे रहे हैं । धर्म एक ऐसा ब्लैक होल बन गया है जो सब कुछ लीले ले रहा है ,लगता है समस्त विकास,सारे प्रयास ,आम ओ ख़ास सब धर्म के होल में समा जायेगा ।सब कुछ नष्ट होता प्रतीत हो रहा है ।

दिल्ली जैसे महानगर में पार्क में प्रेमी युगल को बैठने से मना करने के लिए कुत्तों का स्क्वायड बनाया जा रहा है । कोई नहीं चाहता कि प्रेम उगे क्योंकि प्रेम उगेगा तो समाज की कृत्रिम मानसिकता ,पिछड़ापन कम होगा ,ऊंच नीच की दीवारें टूटेंगी और मठ ख़त्म होंगे । जो जहाँ है वहीं बैठे रहना चाहता है लेकिन जो प्रेम में होता है वह हर तरह की कृत्रिमता की जलती सिगरेट को पाँव के नीचे मसल देना चाहता है जैसे सुशील ने अपनी कविता
कनॉट प्लेस में कहा है :-

” कनॉट प्लेस एक जलती हुई सिगरेट की तरह है
जिसे दो चार कस खींचने के बाद
जूतों से मसल देना चाहता हूं ।”

कोई भी वास्तविक सर्जक कृत्रिमता के साथ बहुत देर तक नहीं रह सकता है और जो रहता है वह बस दिखावटी लेखक या कलाकार हो सकता है । यह अलग बात है कि आजकल दिखावटी लोगों की भरमार है।सर्जना और कृत्रिमता दो विरोधी प्रवृतियां हैं जो एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकती हैं ।ऐसे में किसी व्यक्ति के लिए एक वाक्य
” मैं तुमसे प्यार करता हूं । “
दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य बन जाता है। प्यार करना दुनिया का सबसे मुश्किल कार्य है जिसने यह कार्य कर लिया उसने जग जीत लिया ।

” ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय ।”

प्रेम की आँखों से देखने पर पूरी दुनिया हरी नज़र आती है ।सारे कृत्रिम भेद मिट जाते हैं ।हर इंसान के पास प्रेम का तीसरा नेत्र होता है जिसका नेत्र खुल गया ,उसको निर्वाण की प्राप्ति हो गई और वह मुक्त हो गया । बुद्ध बन गया । प्रेम ही दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान और विज्ञान है।प्रेम ही किसी को कबीर,नानक, अंबेडकर ,शाहू ,बुद्ध या फुले बनाता है ।प्रेम निर्माण करता है ।

कवि सुशील की कविताओं का केंद्रीय भाव प्रेम ही है ।जो कभी व्यक्तिगत रूप में किसी व्यक्तिविशेष के प्रति प्रकट होता है और कभी समस्त प्रकृति के प्रति प्रेम दिखाई पड़ने लगता है जब कवि पूरी धरती को साइकिल बनाकर उसकी हैंडल को मोड़ देना चाहता है जिसे धरती विकास की ओर मुड़ जाए ,अंधकार से प्रकाश की ओर प्रवृत्त हो जाए । मूलतः प्रेम तो प्रेम होता है कभी व्यष्टि के लिए और कभी समष्टि के लिए । सुशील की कविताओं में प्रेम अलग-अलग पात्रों के रूप में प्रकट होता है, कभी हेरा के रूप में,कभी नारवा के रूप में और कभी शैलजा के रूप में ।

किसी भी लिटरेरी आर्टिस्ट को प्रयोग करने से नहीं चूकना चाहिए ।सुशील ने अपनी कविताओं में शिल्प के स्तर पर कई सारे प्रयोग किए हैं ।इसी में एक है कविता लिखने की स्वप्न प्रविधि जिसमें कविता ड्रीम सीक्वेंस के रूप में सामने आती है लेकिन पता नहीं चलता है । कविता की अंतिम पंक्तियों में यह बात पता चलती है । इसी प्रकार एक अन्य कविता में कई पात्र हैं ।प्रथम दृष्ट्या तो कविता समझ में नहीं आती लेकिन पात्र परिचय पढ़ने के बाद कविता मानस पटल पर अंकित हो जाती है ।
डायरी का पीला वरक में भूल से गए कई शब्दों को भी प्रयोग में लाया गया है । जैसे दिया बारना या दिया जलाना ।मुझे याद है बचपन में हम लोग दिया बारना है जैसे शब्दों को बोला करते थे ,सुशील ने भी कुछ ऐसा ही लिखा है , ” बारूंगा दिया “

कुल मिलाकर ‘ डायरी का पीला वरक ‘ शिल्प के स्तर पर प्रयोग के लिए और संवेदना के विविध और नितांत नूतन विषयों पर लिखे जाने के लिए एक सुंदर काव्य संग्रह बनकर उभरता है ।सुशील द्विवेदी जी इसके लिए बधाई के पात्र हैं ।

हँस प्रकाशन का प्रस्तुतिकरण भी बहुत सुंदर है । कविता संग्रह की कविताएँ रफ़्ता-रफ़्ता बड़े सुकून से पढ़ने लायक हैं ।

समीक्षा :तेज प्रताप नारायण

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1 Comment

  • बेहतरीन आलेख।
    बधाई कवि और समीक्षक दोनो को।

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