तोंद इज़ टेम्पररी ,पेट इज़ परमानेंट

 तोंद इज़ टेम्पररी ,पेट इज़ परमानेंट

तेज प्रताप नारायण

इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है तो पेट भी कैसे स्थायी हो सकता है और इस तथ्य से यह टॉपिक ही ख़ारिज़ हो जाता है।
आर्डर आर्डर ! !
लेकिन आज कल किसे पड़ी है कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं ? अब ज़माना ऐसा है कि अस्वीकार्य को भी स्वीकार्य करना पड़ता है। जैसे जो तथाकथित पत्न्नी पीड़ित लोग हैं वे तो पक़्क़ा यही कहेंगे कि पत्नी जी आप जो कहें वह स्वीकार्य है और सब कुछ शिरोधार्य है। वैसे पत्नी पीड़ित लोग भी कितनी पत्नी पीड़ा समझते होंगे यह भी बहस का विषय हो सकता है।

ज़िन्दगी में कितनी ही बार लोग कहते हुए मिल जायेंगे एडजेस्ट करो। घर में एडजेस्ट करो , बाहर एडजेस्ट करो। कुछ भी न करो बस एडजेस्ट करो। लेकिन कहीं कहीं एडजेस्ट नहीं हो पाता। मसलन अगर आपकी तोंद को कहा जाये कि ज़रा पेट के साथ एडजेस्ट करो। अच्छा हो कि रहो नहीं लेकिन अगर रहो भी तो दिखो नहीं ।तो क्या तोंद एडजेस्ट कर पायेगी ? तोंद को कितना भी पिचका लीजिए उसका मिलन पेट से नहीं हो पाता है । यह घर- घर की कहानी है तभी तो आजकल जितने लोग भूख से नहीं मरते हैं उससे कहीं ज़्यादा तोंद से मर जाते हैं। तोंद को जहाँ टेम्पररी होना चाहिए था वह परमानेंट होती जा रही है बिलकुल सरकारी की तरह । तोंद के सरकारीपन के कारण ही शायद सरकार सब कुछ प्राइवेट करने पर आमादा है क्योंकि सरकार का परम उद्देश्य तो हमारा कल्याण है और वह तोंद कम करके ही होगा ?

वैसे तोंद जैसी कई और चीज़ें हो सकती हैं जैसे ऑनेस्टी इज टेंपरेरी, बेईमानी इज परमानेंट ।परमानेंट इज टेंपरेरी और टेंपरेरी इज परमानेंट । ऐसे कई सारे टेंपरेरी और परमानेंट के उदाहरण मिल जायेंगे।
कोरोना के समय तो यह भी कह सकते हैं कि रोजगार इज टेंपरेरी बेरोजगारी इज परमानेंट ।ऐसा लगता है कि ज़िंदगी टेंपरेरी और परमानेंट के बीच झूल रही हो।

टेंपरेरी और परमानेंट ऐसी चीज़ें है जिन्होंने इस देश को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया है ।इस देश में घूमते घूमते आर्य आए थे टेंपरेरी, लेकिन यहीं बस गए ।बसे ही नहीं यहां की संस्कृति ,समाज और भाषा सब पर आधिपत्य जमा लिया । आर्य ही क्यों ?मुगल और उसके पहले के सुल्तान वाले लोग भी आए और यहीं पर डेरा जमा लिया। आजकल भारतीय भी अमेरिका आदि में नौकरी करने जाते हैं और वहीं पर टेंपररी हो जाते हैं ।इसी तरह अंग्रेजो ने भी हद कर दी थी । एक बार तो लगता है कि आदमी की जात ही कमीनी होती है जिसे जो मिला उससे वह संतुष्ट नहीं होता है और उसके लिए पेट नहीं,तोंद ही परमानेंट है , बस मौक़ा मिल जाए ।

कहना गलत नहीं होगा पेट इज टेंपरेरी ,तोंद इज परमानेंट।आदमी इज टेंपरेरी लालच इज परमानेंट ।या यूं कहें कि लालच ही सत ,चित और आनंद।

यदि तोंद को परमानेंट नहीं रखना है तो उसके कई तरीक़े हैं जिन्हें बताने की कोई ज़रूरत नहीं है ,हम सबको पता है । बस करना मुश्किल है और तोंद ने एक बार कब्ज़ा कर लिया तो समझ लीजिए फेविकोल के मज़बूत जो़ड की तरह शरीर से जुड़ जाती है ।उसे फिर अलग होना मंजूर नहीं है । तो इसे पहले की तोंद टेंपररी से परमानेंट हो जाए । सुबह जल्दी से जाग और भाग मिल्खा भाग ।

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