त्वरित न्याय

 त्वरित न्याय

तेज प्रताप नारायण

राधेश्याम सुबह ही अपनी पत्नी और माँ को लेकर ऑफिस की ओर निकल पड़ा था ।रोज़ का उसका यह रूटीन है ,माँ को स्कूल छोड़ते हुए फिर पत्नी को उसके ऑफिस छोड़कर वह अपने ग्रीन पार्क एक्सटेंशन ऑफिस पहुँच जाता है और यह सब करने में उसे दो घंटे के आसपास लग जाते हैं ।इस कारण सुबह साढ़े सात बजे ही ऑफिस से निकलना पड़ता है।वापस आने में हर किसी का ऑफिस टाइमिंग अलग अलग होने के कारण हर कोई मेट्रो ,बस या ऑटो से अपनी सुविधानुसार घर आ जाता था। सुबह की आपाधापी के कारण कई बार राधेश्याम को एक्सीलेरेटर को ज़ोर से दबाना भी पड़ता था।

आज भी राधेश्याम को निकलने में थोड़ा लेट हो गया था ।
वह भुनभुनाता रहा ,
“कितना सजती हैं ,औरतें ? पता नहीं ,ऑफिस काम करने जाती है या ख़ुद को दिखाने ।”

राधेश्याम को भुनभुनाता देख ,पत्नी सुनीता बोली, “क्यों भुनभुना रहे हो ? हम लोगों को समय लगता है तैयार होने में ।मर्दों की तरह केवल पेंट ,शर्ट ही नहीं पहनना होता ।”

राधेश्याम ज़्यादा चक चक नहीं करना चाहता था ।मन ही मन बोला, “कौन मना करता है,मर्दों की नकल करने से ।तुम सब लोग वही तो कर रही हो ,जो मर्द करते हैं ।पता नहीं, हर औरत मर्द क्यों बनना चाहती है ?” फिर, ख़ुद को डाँटते हुए सारे ख़्याल झटके से बाहर निकाल दिये उसने।सुबह सुबह वह नहीं चाहता था कि घर का माहौल ख़राब हो और सबका मूड ख़राब हो ।पिछले 10 साल से सुनीता को वह समझ गया था और उसने लगभग हार मान ली थी कि सुनीता को अब नहीं बदला जा सकता है ।वैसे भी एक उम्र के बाद इंसान अपनी सोच नहीं बदल पाता ।दोनों ने एक दूसरे को आपसी कमज़ोरियों के साथ स्वीकार करना सीख लिया था ।यह बेहतर भी होता है ।

“चलो माँ, सुनीता तुम भी आ जाओ।आठ बज चुके हैं ।”
“हाँ चलो ,लेट हो जाएगा ,हम सबको ।”, दोनों बोलीं
वैगन आर की एक्सीलेरेटर पैडल को पूरी ताक़त से राधेश्याम ने दबा दिया था ।वैगन आर भी पूरे दम से धुआँ छोड़ती हुई सड़क पर दौड़ पड़ी ।ऐसा लग रहा था कि अगर पॉल्युशन कंट्रोल की जाँच करा ली जाए तो यह गाड़ी पक़्क़ा फेल हो जाएगी।वैसे दिल्ली और पूरे देश मे हज़ारों गाड़ियां ऐसे ही चलती हैं ।

कुछ ही देर बाद किशन गंज के गंदे नाले के बगल से गाड़ी गुज़र रही थी। थोड़ा आगे जाने पर किशन गंज स्टेशन जाने का प्रवेश द्वार था । स्टेशन के सामने ही एक टी जंक्शन था । राधेश्याम क्लच की पैडल को दबा कर स्पीड को कंट्रोल करने का प्रयास कर रहा था ।तभी ऊल्टी दिशा से तेज़ गति से एक बाइक सामने प्रकट हुई ।
राधेश्याम इसके लिये तैयार नहीं था ।ज़ोर से खटाक की आवाज़ आई और सड़क पर ख़ून की धारा बह निकली ।
बाइक टी जंक्शन के दूसरे तरफ़ सड़क पर पहुँच गयी थी ।
राधेश्याम की माँ चिल्ला उठी ।शायद बेटे की चिन्ता में उनके मुँह से चीख निकली थी लेकिन जब बेटे को उन्होंने ड्राइविंग सीट पर सुरक्षित देखा तो उनकी जान में जान आयी । तीनो को कुछ नहीं समझ मे आ रहा था,तीनों संज्ञा शून्य थे ।सामने ही पुलिस चौकी थी तो गाड़ी भगाने का कोई मतलब नहीं था ।वैसे भी राधेश्याम कानून को मानने वाला व्यक्ति था ।यू पी में होता तो अलग बात होती ,वहाँ तो कानून मानने वाला ज़्यादा परेशान रहता है ।तीनो नीचे उतरे तो देखा ,बाइक सवार के सिर से ख़ून बह रहा था । तीनों के चेहरे फ़क़्क़ पड़ गये ।कहीं कुछ हो हवा गया तो क्या होगा ? राधेश्याम ने नब्ज़ देखी जो चल रही थी ,उसने थोड़ी राहत की साँस ली ।तब तक कुछ राहगीर भी पहुंच गये थे ,उन लोगों ने बाइक को एक किनारे खड़ा कर दिया।
राधेश्याम ने बाइकर को उठाकर गाड़ी में डाल दिया और पास ही एक अस्पताल ले गया।डॉक्टर ठीक-ठाक था,बिना ज़्यादा ना-नुकर किये हुए उसने ज़रूरी इलाज़ शुरू कर दिया ।कुल मिलाकर सिर में बारह टाँके लगे थे ।ज़्यादा ख़ून नहीं बहा था ।बाइकर होश में आ चुका था ।सबने राहत की साँस ली ।
पुलिस भी आ चुकी थी । राधेश्याम ने सोचा कि अब वह जा सकता है लेकिन पुलिस ने रोक लिया ,”ऐसे नहीं जा सकते है ।बयान देकर जाइये ,क्योंकि यह कोर्ट केस है ।”
सुनीता बोली,”क्यों साहब? कोर्ट केस क्यों होगा ।बाइक वाले भैया रॉंग साइड से थे और उन्होंने हेलमेट भी नहीं लगा रखा था ।”
“देखिए,मैडम!! कानून मत समझाइए हमें ।ग़लती हमेशा बड़ी गाड़ी वालों की मानी जाती है ।”
“लेकिन यह कहाँ लिखा है, सर!!”, पत्नी का राधेश्याम ने समर्थन किया
“यह पता नहीं कि कहाँ लिखा है लेकिन केस हमीं बनाते हैं और फिर क़ानून वही करेगा जो हम लिख देंगे प्राथमिकी में ।”,पुलिस वाले ने हेकड़ी दिखाई

राधेश्याम के पसीने आने लगे ,सोचा कहाँ फंस गए ।माँ और पत्नी पर भी गुस्सा आने लगा था कि ये लोग समय पर क्यों नहीं तैयार होते हैं । वह आगे बढ़ कर बोला कि
“सर !हम बाइक रिपेयर भी करवा देंगे।”
“वह तो करवाना ही पड़ेगा ,बाइकर बोला
“क्यों करवाना पडेगा ? कार का जो नुकसान हुआ है उसका क्या ? और ग़लती भी आपकी थी ।”,सुनीता गुस्से में बोल रही थी
“मैंने तो हेलमेट पहन रखा था ।वह तो टक्कर के कारण हेलमेट निकल कर नाले में जा गिरा होगा ।” ,बाइकर बोला

“भैया,शर्म करो ।हम आपको लेकर अस्पताल आ गए हैं और आपका इलाज़ भी कराया गया है और आप झूठ पर झूठ बोले जा रहे हो ।”,राधेश्याम की माँ तैश में आकर बोली
“देखिए आप लोगों इस तरह लड़िये नहीं ,क़ानून है ,वह सब हल निकालेगा । या तो आप लोग सलटा लीजिए आपस में ।नहीं तो मुक़दमे के लिए तैयार रहिए।”,पुलिस वाले ने झिड़की दी
राधेश्याम सुगर का मरीज़ था, वह किसी तरह के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था ।

उसके चेहरे पर पसीना छलछला आया ।उसने 10 हज़ार रुपये निकाल कर बाइकर को दे दिए ।
“बाइक में कम से कम 20 हज़ार लगेगा ,भाई साहब !!”
“अभी 10 हज़ार रखो ,इतना ही हमारे पास है ।”,राधेश्याम बिनती करते हुए बोला। बाइकर कुछ नहीं बोला और रुपये ज़ेब में डाल लिए ।
सब जाने लगे । तभी पुलिस वाले कि आवाज़ आयी , “अरे आप लोग कहाँ जा रहे हैं ।एक्सीडेंट एक पुलिस केस होता है और बिना पुलिस से निपटे हुए आप जा रहे हैं ?”
“आपने ही तो कहा था कि दोनों लोग मिलकर सलटा लें ।”, राधेश्याम आश्चर्य से बोला
“लेकिन पुलिस से भी सलटाइये। “, थोड़ा धूर्तता से पुलिसवाला बोला
“साला यह ठुल्ला भी ठुल्लेबाज़ी से बाज़ नहीं आया ।अभी तक कितना शरीफ़ लग रहा था ।”, राधेश्याम मन ही मन गाली देते हुए बोला
पुलिस वाला बोला कि यह पुलिस केस है ।अगर पुलिस से निपटा लेंगे तो ठीक है।नहीं तो न्यायालय जाना पड़ेगा ,जहाँ सबकुछ मिलता है लेकिन न्याय नहीं। जूते घिस जाते हैं लेकिन न्याय नहीं मिलता।पुलिस का न्याय त्वरित है और सस्ता भी ।
“पुलिस से कैसे न्याय मिलेगा?’,राधेश्याम बोला
“ज़्यादा नहीं पाँच देने है और फिर एक्सीडेंट हुआ है इसका कोई रिकॉर्ड नहीं रहेगा । इतना सस्ता और त्वरित न्याय न तो सरकार देगी और न ही कोर्ट ।सोच लीजिए।”

राधेश्याम निशब्द था।आख़िर क्या कहता ।

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  • हक़ीक़त
    Shandar

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