पूनम हिम्मत अद्वितीय की कविताएँ

 पूनम हिम्मत अद्वितीय की कविताएँ


शिक्षा – संस्कृत परास्नातक एवं विधि स्नातक

सामाजिक कार्य– (वरिष्ठ नागरिकों को समर्पित) आशीर्वाद संस्था का संचालन।
कहानी एवं कविता लेखन सामाजिक विषयों पर लेखन, मंच संचालन।
पुस्तकें -साझा संकलन साहित्य समिधा एवं सप्त समिधा ।
अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविता प्रकाशन, समाचार पत्रों में कविता एवं लेख प्रकाशित, दूरदर्शन में कविता पाठ का प्रसारण।
सम्मान- भारतीय अटल लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड (राज्य मंत्री स्वाति सिंह द्वारा) प्राप्त, रैखिकता सम्मान ( मेयर संयुक्ता भाटिया द्वारा) प्राप्त। शब्द शौर्य सम्मान , (पद्मश्री डॉ योगेश प्रवीण जी द्वारा)
युवा साहित्य चेतना सम्मान, सरस्वती सम्मान,
रूबरू फाउंडेशन द्वारा साहित्य श्री सम्मान,
अखिल भारतीय साहित्य परिषद मालवा प्रांत द्वारा प्राप्त काव्य भूषण सम्मान आदि।

डॉ अनुराधा ओस की टिप्पणी【टांकते हुए कुछ आखर–

लखनऊ की रचनाकार ‘पूनम हिम्मत अद्वितीय ‘की कविताएँ प्रकृति से बतियाती हैं, उनको अपने भीतर कहीं गहरे तक आत्मसात करतीं हैं. इनके गीत तो सुने हैं. आज यहाँ पर इनकी छंदमुक्त कविताएँ पढ़ने को मिलीं,एक समुंदर क्या कहता है. पानी की तरह पारदर्शी और लचीला बनने का संदेश.एक स्त्री किस तरह बचा ले जाती है अपने मुस्कान जीवन के रंग चुन-चुन कर सहेजती है अपने बक्से में.अपने आँचल में.वह भावनाओं की खान होती है.यादें कविता का कहना देखिए हमारे अवचेतन मन में चलचित्र की तरह घूमती रहती हैं यादें जब होतें हैं नितांत एकांत में.मन के कच्चे पत्तों पर टँक जातें हैं कुछ शब्द वैसे ही जैसे कुम्हार गढ़ता हैं बरतन. उसी तरह जैसे शब्द गढ़ता है स्वयं को.कवि के लिखने का क्या उद्देश्य होता है. कवि किसके लिए लिखता है इन प्रश्नों से टकराना चाहिए.नई कविता किस उद्देश्य को स्थापित कर रही है ये भी प्रश्न विचारणीय है. शब्दों की जिस सरल धारा को लेकर वह चली है उसे बरकरार रखना कवि की जिम्मेदारी होती है..।】

【मेरे मन का सीप】

मैं एक समंदर हूं ,
मत डूबो मुझमें,
विलीन हो जाओगे
और नहीं पाओगे ,
मन का सीप,
डूबते उतराते रहोगे,
कभी मेरे ऊपर,
कभी मेरी गहराइयों में।
यदि छूना चाहते हो
मेरा तल, पाना चाहते हो
मन का सीप,
तो मेरी ही तरह बन जाओ ,
मेरा पानी बनकर।

【अमृत दान】

आज विश्वास और हिम्मत के,
सिर्फ दो शब्द चाहिए,
तुम्हारे अंदर ही खोजती हूँ,
इन इच्छाओं की पूर्ति,
तुम्हीं से मांगती हूं ,
इन अमृतो का दान।
इन्हें पाने के पश्चात
चल सकूंगी ,
उस राह पर जो,
सर्वदा सत्य है ,
और पा सकूंगी
तुम्हारा चिर स्नेह,
जो निश्छल पवित्र है।

【एक स्त्री】

एक स्त्री झाड़ती है ,
बहोरती है,लीपती है,
दिवारो पर बनाती है
गेरू से कुछ फूल ,
अइपन से लगाती है,
दरवाजे पर
अपने हाथों के छाप
तो फूली नहीं समाती,
क्योंकि यह छाप ,
अनायास ही दे देते हैं उसे ,
मुट्ठी भर अधिकार ।

एक स्त्री सिलती है,
जोड़ती है ,
पिरोती है ,
लगाती है पैबंद ,
बांधती है
आंचल के छोर में
कुछ मनौती की गाँठे,
फटी एड़ियों में ,
भर लेती है रंग ,
सजा लेती देह,
लगा लेती है माथे पर ,
सौभाग्य का टीका,
देखती है दर्पण में
और बिखर जाती है ,
एक झीनी मुस्कान।

【स्त्री 】

त्याग के तमके से विभूषित एक स्त्री
बन जाती है अभागन ,
पति रूपी पुरुष को ना पाकर।

एक स्त्री बन जाती है बांझ,
पति की कमियों को कर शिरोधार्य,
एक स्त्री बन जाती है विधवा,
कहलाती है अपशगुन ,
जीती है ना होने के अस्तित्व को।

एक स्त्री बन जाती है चरित्रहीन,
बिकती है सरे बाजार,
बन पुरुष की मानसिक विकृतियों का शिकार,
एक स्त्री नहीं जी पाती है कभी खुद को।

【यादें 】

जरा सी देर में आंखें भिगो गई यादें,
मैं जागती रही अंधेरों में भी ,
न जाने किस बीच सो गई यादें
दिलो-दिमाग में थी जिस जिस से नफरत ,
नफरत को धो गई यादें ।

कहीं शोर है तो कहीं असीम सूनापन ,
न जाने कब उमड़ कर आ गई यादें,
मिला ना ,जिसे चाहा ,एक चाह मानकर ,
भले ना हुआ वह मेरा मगर ,
उसकी मेरी हो गई यादें ।

वह जिसे भुलाना चाहती थी ,
हमेशा के लिए,
उसी की याद में पलकें भिगो गई यादें।

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