प्रतिभा ‘प्रभा ‘की कविताएँ

 प्रतिभा ‘प्रभा ‘की कविताएँ

नाम – प्रतिभा प्रभा
शिक्षा – परास्नातक (हिन्दी साहित्य)
संप्रति – हिन्दी अध्यापिका
प्रकाशित पुस्तक – जो मैंने लिखा नहीं (कविता संग्रह)
प्रकाशित साझा संग्रह – कारवाँ
प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं एवं ई – पत्रिकाओं में कविता एवं लेख का प्रकाशन।
कार्यानुभव – आकाशवाणी ओबरा सोनभद्र एवं आकाशवाणी वाराणसी में उद्घोषिका। अखण्ड भारत त्रैमासिक पत्रिका में सह-सम्पादिका। लघु फिल्म ‘विजन’ में अभिनय। बचपन एक्सप्रेस में पत्रकारिता।
विशेष उपलब्धियाँ – शिक्षा रत्न सम्मान – 2018। हिन्दी सजल सर्जना समिति ‘मथुरा’ (उo प्रo) द्वारा अतिथि सम्मान। अखण्ड भारत एवं काव्य संगम के अंतर्गत साहित्य सेवी सम्मान – 2019।

【 एक उन्नीदा शहर 】

एक उन्नीदा शहर
न सोता है
न सोने देता है
नींद में उठकर
लङखङाते हुए चलता है
और
होश में आते ही
ढेर हो जाता है
सूरज के साथ ही शुरू होती है
चिल्ल – पो
शुरू होती है
हर पैर को गंतव्य तक पहुँचने की
अकुलाहट
सुबह की चाय
स्कूल का बैग
अॉफिस की फाइल तक
सभी को जल्दी है
और साथ ही
भयानक भय
चौराहे की लाल बत्ती का
ज़िब्रा लाइन पार न कर पाने का
अफसोस
हेल्मेट तो ले लिया
पर
लाइसेंस तो
टेबल पर ही
छूट गयी
संतोष, कि जेब में हैं
हजार रुपये
रसोईं, बैठक, आँगन, दालान
सब बुहारना
सब समेटना
बच्चों के गृहकार्य
अतिरिक्त कार्य से लदी
फाइलों के साथ
सूरज का घर वापस लौट आना
अगले उन्नीदा शहर के लिए ।

【प्रभामय 】

अरी ओ
प्रभामय प्रभात में
अठखेलियाँ करने वाली
कौन है तू
इन्द्र धनुष की ओट से
झाँकती हुई
बूँदों के घुंघरूओं को
झनकाती हुई
माथे पर चिपकाए
ये सिन्दूरी लाल चमक
रंग – बिरंगी किरणों में
लिपटी हुई
कौन है तू
ओ अनझुई ओस में
नहायी हुई
झूलती इन कीमती मोतियों से
सजी हुई
आँगन के पार
उस द्वार तक
बिन बोले बोलती हुई
खुशियों को घोलती हुई
कौन है तू
प्रेम है
आह्लाद है
या
मन के किसी कोने में छिपी
टीस है
माँ के होठों की गीत है
या कि
मेरे मन की मीत है
बता – बता
कौन है तू
मेरे नजरों का खेल है
या
मेरे मन का मेल है
बिन बोले बोलती है
बिन कहे सुनती है
बिन दिखाए देखती है
और
हर कहीं व्याप्त है
मेरे अंदर
मेरे बाहर
उस पहाड़ पर
उस नदी की धार पर
उस सूरज में
उन चाँद, सितारों में
इस पौधे
और इस पेड़ पर
इस लता और
इस जङ में
हर जगह तो तेरा वास है
फिर भी दिखती नहीं
पर
मेरे पास है
हां
तू ही तो है
जो मेरे साथ है
मेरे साथ है।

【अपलक मैं 】

उसके घुटनों पर
अपनी कुहनी टिकाए
अपनी ही हथेली से
अपनी ठुड्डी लगाए
अपलक मैं
उसे निहार रही थी
और वो बहुत
मसरूफ था
यादों में पीछे
बहुत दूर तलक खोया हुआ
शब्दों के जाल से
सुलझने की कोशिश में
लगातार
उलझता जा रहा था
मैं
रह – रह
विकल हो
खींच देती उसके कान
और कभी
उसका
चश्मा हटा लेती
पर
अपनी गाथाओं में डूबा वो
आकंठ
बाहर आने का रास्ता
भूलता जा रहा था
उसकी हथेलियाँ
छू जातीं
काँधे से
तो कभी
सिर से
टकरा जातीं
वो डरकर जैसे
चिहुँक उठता
आकाश को ताक
पलकें मूँद लेता
मैं
अपने राम को मनाते
आशीष से
उसकी बलाएँ
उतार लाती
झलमलाते चाँदनी में
एक लोटिया जल
पीपल पर
चढ़ा आती
कर आती चिरौरी
माथा टेक मना आती
नज़र उसकी उतार
पोटली में बाँध
गंगा में
बहा आती।

【सुन रहे हो न 】
सुनो
सुन रहे हो न
ढूंढ लेना एक
अंतहीन आकाश
मेरे लिए
मेरी धरती के लिए
उगा लेना उस पर कुछ
पेङ – पौधे, कुछ फूल
और हां
भूल न जाना
थोड़े से काँटे भी जरूरी हैं
बगीचे के फूल बने रहें
सो एक माली
मनुहार लेना
कुछ खाद – पानी के साथ
रोपाई का सामान
तैयार कर लेना
कुछ
बना लेना
तुलसी का चौरा
जहाँ गेहूँ के आटे से चौक
पूर लेना
ध्यान रखना
चींटियों को आने से मना मत करना
ये उन्हीं के लिए है
एक श्यामल गाय
बुला लाना
मुख्य द्वार के पास
सदा के लिए
उसके चारे का प्रबंध कर देना
उसके गोबर से लीप लेना आँगन
थोङा सा हवि
डाल देना कुण्ड में
मेरी अंतिम समिधा के साथ
अग्नि को बोल देना
देवताओं तक उन्हें पहुँचा दे
उसका हिस्सा भी उसे
देना न भूलना
जल अभिमंत्रित कर
उन्हें विदा कर देना
पर याद रखना
अगली बार आने का निमंत्रण भी
इसी समय देना होगा
और तुम न
रसोईं बनाने से पहले
जरा अच्छे से
स्नान कर लेना
सुन रहे हो न
माँ – बाबा का खयाल रखना
और
उसका(तुम अपना) भी
जिसे छोड़कर मुझे
जाना पङा
सुन रहे हो न… ।

【कान घुमा दूँ 】

कितने दिनों के
बेइंतहा इंतजार के बाद
आज चाँद
आ बैठा
मेरी खिड़की के जंगले पर
लेकिन शरमाता सा बादलों की ओट से
झाँक रहा है
वो शायद
मेरे धैर्य की परीक्षा ले रहा है
मैं भी
मुस्कराकर
शरमाना देख रही हूँ
उसे लगता है कि मैं
जानती नहीं उसका आना
शैतान है ज़रा-सा
नटखट भी
चाहता है वो कि
मैं गाऊँ गीत सिर्फ उसके लिए
उसके काँधे पर टिका अपनी बाँहें
साँझ से रात तक
और फिर
सूरज के निकल आने के बाद तक भी
गाती ही रहूँ
पर वो अपने शब्दों को
अपनी आवाज़ में घोलकर बोलता नहीं
वो चाहता है कि मैं
सब समझ लूँ
वो जो उसने धीरे से कहा
और वो भी
जो उसने कहा ही नहीं
अब मैं क्या करूं
उसके कान घुमा दूँ।

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1 Comment

  • प्रतिभा प्रभा की कविताओं को पढ़ कर लगता है कि अरे वाह यह तो हम भी कहना चाहते थे, लेकिन प्रतिभा जी मार के गई । यही एक अच्छी रचना का गुण होता। बहुत बढ़िया कविताएँ।बधाई।

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