प्रेमचंद के आलोचक और आलोचकों के प्रेमचंद

 प्रेमचंद के आलोचक और आलोचकों के प्रेमचंद

प्रेमचंद पर विचार करते हुए इस बात पर भी बहस जरुरी है कि आलोचकों ने प्रेमचंद को किस रूप में पढ़ा है | उनके प्रेमचंदीय –पाठ ने हिन्दी आलोचना में कितनी श्रीवृद्धि की है | हमें उनके मूल्यों पर भी विचार करना होगा | यह आवश्यक नहीं है कि प्रेमचंद पर लिखी गयी प्रत्येक आलोचनात्मक कृति नई मान्यताओं को स्थापित करेगी | प्रायः यह देखा गया है कि अधिकांश आलोचनात्मक कृतियाँ अपने पूर्व पाठ की पुनरावृत्ति भर होती हैं | उनमें नई मान्यताओं का सर्वथा अभाव होता है | ऐसे में, क्या हम उस कृति को प्रेमचंदीय –पाठ की शृंखला में रख सकते हैं? यदि ऐसा नहीं, तो हमें ऐसी कृतियों और उनके कृतिकारों के मोह जाल से बचना होगा | हमें यह भी समझना होगा कि उनकी शाब्दिक प्रदीप्ति व उनके आभा-मंडल से उत्पन्न ऊष्मा नई पौध को साहित्य-परिसर में किस रीति से पल्लवित करेगी | हम कब तक पश्चिम के आँचल में मुँह छिपाए स्तन्य होंगे | क्या हमारी मनीषा इतनी पैरासाइट हो गयी है कि हमें कृतियों के पाठ के लिए पश्चिम के व्योम की ओर ताकना पड़ रहा है | हमें साहित्य के नये निकष विकसित करने होंगे | किन्तु उसकी जमीन पूर्णतया भारतीय होनी चाहिए | भारतीय होने का अर्थ भारत की विभिन्न भाषाओँ, उसके साहित्य और विमर्शों के परस्पर संवाद व ज्ञान के आवागमन से है | जितनी जल्दी संभव हो सके, हमें यह समझना होगा कि हम एक-दूसरे के बिना कितने एकांगी हैं | हमें उन आलोचकों के मिथ्या अभिमान से बचना होगा जो स्वयं को सर्वेसर्वा समझते हैं | हम भारत के वट वृक्ष हैं, साहित्य और संस्कृति इसकी शाखाएँ हैं | एक शाखा के अपल्लवित, अपुष्पित होने से वृक्ष की जो छवि आपके मानस में अंकित होगी, उसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं | उसे विस्तार देने की आवश्यकता नहीं है |
प्रेमचंद के आलोचकों को, जिनमें पाठकीय प्रतिक्रिया और अकादमिक पाठ दोनों शामिल हैं, श्रेणीबद्ध करने की आवश्यकता है | साथ ही पाठकीय प्रतिक्रिया को, जिसमें तात्कालिकता और भावनात्मक आवेग की प्रबलता का संकट अधिक होता है, उसे संग्रहीत करने की आवश्यकता है | और तो और अकादमिक पाठ की पेउंदा-तुरपाई-प्रवृत्ति की छटनी भी होनी चाहिए | प्रेमचंद का अर्थ दुनिया के उन क्रांतिकारियों के सन्दर्भ में समझना चाहिए, जिन्हें पुरानी घिसी पिटी लकीरों में चलना पसंद न था | वे नवीन मार्गों के अन्वेषक थे जिसके बदले में उन्हें जीवन भर अपने समाज का दंश झेलना पड़ा | किन्तु वे विचलित नहीं हुए और आजीवन नवीन मूल्यों का सृजन करते रहे | वे सही मायनों में स्रष्टा थे |
आरम्भ में प्रेमचंद के आलोचक केवल रेडिकल ब्राह्मणवादी नहीं थे, उनमें वे भी शामिल थे, जिन्हें उनके लेखन से खतरा था, वे न तो हिन्दू थे और न ही भारतीय, वे ब्रिटिश थे | उन्हें प्रेमचंद से इसलिए खतरा था कि उनके लेखन से युवा प्रभावित होंगे और यदि राष्ट्र के हित में वे खड़े हो जायेंगे तो ब्रिटिश यहाँ शासन नहीं कर पाएंगे | इसलिए 1907 ई. में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह सोजे वतन को अँग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया | हालाँकि बाद के प्रेमचंद में वैसा स्वर न था जैसा स्वर सोजे वतन के नवाब राय में है | नवाब राय के प्रेमचंद में परिवर्तित होने की घटना भी कोई सामान्य घटना नहीं है | उनका गमन हिन्दी प्रदेश में आदर्श से यथार्थ के कंकरीले मार्गों पर हुआ है | जहाँ वे किरमिच के जूते पहनकर नहीं बल्कि नंगे पाँव चले हैं | इसलिए आरम्भ में उनकी आदर्शात्मक रीति के कारण ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गार्हस्थ्य जीवन का साहित्यकार माना है | अपने इतिहास ग्रन्थ में उन्होंने प्रेमचंद की भूरि-भूरि प्रशंसा की है | निम्न और मध्यम श्रेणी के जीवन का यथार्थ चित्रण के कारण उच्च वर्गीय आलोचक उनसे नाराज भी रहे | इनमें श्री नारायण सिंह का नाम लिया जा सकता है | वे प्रेमचन्द के निम्न वर्ग की पक्षधरता व ब्राह्मण समाज के पाखंड का पर्दाफाश करने के कारण नाखुश हुए | उन्होंने प्रेमचंद को घृणा का प्रचारक तक कह दिया | प्रेमचंद सम्बन्धी छिटपुट लेख उनके समकालीन रचनाकारों के भी हैं, किन्तु उनमें सर्वथा एकांगी दृष्टिकोण है | इससे नंददुलारे वाजपेयी भी अछूते नहीं रहे | उन्होंने प्रेमचंद की प्रगतिशीलता सम्बन्धी अवधारणा में साहित्य मत के शाश्वत लक्षण को अंगीकार किया, किन्तु उनकी साहित्य सम्बन्धी उद्देश्यता को प्रोपेगेंडा कहा |
प्रेमचंद का समुचित मूल्यांकन डॉ. रामविलास शर्मा ने किया है | उन्होंने प्रेमचंद को कबीर, तुलसी व भारतेंदु की परम्परा से जोड़ा ही नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय सन्दर्भों में लेनिन–गोर्की, तोलेस्ताय व गाँधी के चिंतन को उनके सर्जना के बरअक्स रखा | डॉ. इन्द्रनाथ मदान सरीखे आलोचकों ने उनकी सीमाओं को रेखांकित किया | प्रकाशचंद गुप्त ने प्रेमचंद को रवीन्द्रनाथ और शरतचन्द्र की संवेदना के तुल्य माना | इसके बाद आगे के तीन आलोचकों -नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी और मैनेज़र पाण्डेय प्रेमचंद का मूल्यांकन गाँधी, अम्बेडकर व दलित प्रश्न, बोल्सेविक क्रांति व मार्क्सवाद के नये परिप्रेक्ष्य में किया |
विमर्शों के उभार ने प्रेमचंद का नये सिरे से मूल्यांकन किया | दलित विमर्शकारों की उग्र वैचारिकी ने प्रेमचंद की दलित सम्बन्धी अनुभूतियों को ख़ारिज किया | मनुस्मृति-दहन के तर्ज पर रंगभूमि-दहन किया गया | इसमें बहुत से दलित विमर्शकार सामने आये, किन्तु उनमें तल्ख़ टिप्पणी के अतिरिक्त प्रेमचंद के मूल्यांकन का कोई वृहद प्रयास न था | बावजूद इसके कुछ दलित विमर्शकारों ने प्रेमचंद का नया मूल्यांकन किया l इनमें डॉ. धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि, कँवल भारती और नैमिशराय का नाम लिया जा सकता है | इसके समानांतर डॉ. पी. एन. सिंह, डॉ. शम्भुनाथ, वीरभारत तलवार, वीरेन्द्र यादव, बजरंग बिहारी तिवारी और अपूर्वानंद ने प्रेमचंद को नये सन्दर्भों में जांचा-परखा | इस सन्दर्भ में अब्दुल बिल्मिल्लाह, काशीनाथ सिंह, चौथीराम यादव, गोपेश्वर सिंह, जितेन्द्र श्रीवास्तव आदि का नाम भी लिया जा सकता है | मूल्यांकन का तीसरा पक्ष स्त्री वैचारिकी का है l इनमें निर्मला जैन, सुमन राजे, रंजना अरगड़े, रोहिणी अग्रवाल, रमणिका गुप्ता का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है | इन सभी आलोचकों ने प्रेमचंद की रचनाधर्मिता का विवेचन नये ढंग से किया है | इनके मूल्यांकन में अपने समय की खोज के साथ-साथ उनके नायकों की उपस्थिति भी है | किसी ने प्रेमचंद के हवाले से गाँधी, टैगोर, तोलेस्ताय की तलाश की तो किसी ने मार्क्स, लेनिन, गोर्की, तो किसी ने अम्बेडकर, सावित्रीबाई फुले की | आलोचकों के प्रेमचंद ने अपने समय को नायकों के गवाक्ष से समझा जबकि प्रेमचंद के आलोचकों ने समय के गवाक्ष से नायकों को | यह एक ही क्रिया की दो विपरीत अभिक्रियाएँ हैं | हमें इनके घटकों को समझने की आवश्यकता है | इनमें से एक घटक अपने अपने प्रेमचंद (पी.एन. सिंह) है | यह पुस्तक 2019 में प्रकशित हुई है | सामान्य अर्थ में यह पुस्तक प्रेमचंदीय-पाठ की शृंखला का उत्तर मार्क्सवादी पाठ भर है | किन्तु पाठ की गहराई में उतरते ही आपको नाना प्रकार के तंतुजाल मिलेंगे, जिनमें कहीं-कहीं आलोचना के अमेरिकी-पाठ की झाँकी दिखेगी तो कहीं लेनिनवाद की | किन्तु ध्येय वह नहीं है, वह केवल साधन है | साध्य समाजवाद के बहाने प्रेमचंद की तलाश करना है |
पी. एन. सिंह विमर्शकाल की पीढ़ी के आलोचक हैं | यद्यपि हिंदी में उनका आगमन बहुत बाद में हुआ | पहले वे विचारक के रूप में धाक जमा चुके थे l उस समय उन्होंने नायपाल का भारत, गाँधी, अम्बेडकर, लोहिया, भारतीय वाल्तेयर एवं मार्क्स : बी.आर अम्बेडकर, गाँधी और उनका वर्धा जैसी पुस्तकें लिख चुके थे | इनके चिंतन में कॉडवेल, मार्क्स, लेनिन, गाँधी, लोहिया, अम्बेडकर, इलियट, तोलोस्तॉय, गोर्की की सुदीर्घ वैचारकी स्पष्ट परिलक्षित होती है | वे कला कला के लिए के आग्रही नहीं हैं, बल्कि कला की सोद्देश्यता के विचारवान पक्षधर हैं | इसीलिए इस किताब की भूमिका में प्रो. सदानंद साही ने लिखा है–-शेक्सपियर, मिल्टन, बर्नार्ड शॉ से लेकर तोलोस्तॉय, गोर्की, दोस्त्योवस्की, लूशुन की नक्षत्र माला के बीच रमने वाले पी. एन. सिंह की पहली भेंट ही प्रेमचंद से तब होती है जब 1980-82 के दौर में प्रेमचंद की जन्म शती मनाई जा रही थी | इस घटना से पूर्व पी. एन. सिंह किस रूप में प्रेमचंद को देखते थे, यह विचारणीय बात है | हालाँकि जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया है कि प्रेमचंदीय-पाठ के इस समय विभिन्न और परम्परागत पाठ ही चलन में थे | पी. एन. सिंह ने आलोचना को इस परिपाटी से मुक्त किया | उन्होंने प्रेमचंद के सन्दर्भ में लिखा है – यह एक विचित्र साहित्यिक यात्रा है | वैचारिक स्तर पर यह यात्रा आर्यसमाज के समाज सुधार से शुरू होती हुई गाँधीवादी सत्याग्रह तक जाती है और अंततः मार्क्सवाद को लिए दिए रेडिकल हो जाती है | रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक प्रेमचंद और उनका युग में प्रेमचंद के रचना के सन्दर्भ में लिखा है – प्रेमचंद हिंदुस्तान की नई राष्ट्रीय जनवादी चेतना के प्रतिनिधि साहित्यकार थे | जब उन्होंने लिखना शुरू किया था, तब संसार पर पहले महायुद्ध के बादल मंडरा रहे थे | जब मौत ने उनके हाथ से कलम छीन ली, तब दूसरे विश्व युद्ध की तैयारियां हो रही थी | इन दोनों अभिमतों से प्रेमचंद के रचना-समय और रचना की वैचारिकी का स्पष्ट मुआयना हो जाता है | दोनों आलोचकों के लिए प्रेमचंद का महत्व अपने समय की वैचारिकी की तलाश करना है | रामविलास शर्मा ने जहाँ आधुनिकता के गर्भ में से मार्क्सवादी पाठ को महत्व दिया वहीँ पी. एन. सिंह के चिंतन में प्रेमचंद का उत्तर आधुनिक पाठ है | उन्होंने संरचनात्मक पाठ से आगे जाकर नया और मानवतावादी पाठ तैयार किया है | उन्होंने लिखा है – बहुत सारे लोग यहाँ हो सकते हैं जो साहित्य को मात्र शब्द संरचना मानते हों | उनके लिए प्रेमचंद की कोई भी कृति मात्र अभिव्यक्ति है, सम्प्रेषण नहीं | इसी के आगे वे बाद पर बल देते हैं कि प्रेमचंद के लेखन का आयाम मूलतः संप्रेषण है | हालाँकि यह बात संरचनावादी याकोब्सन के काव्यशास्त्री भाषिकी से तुलनीय है | उन्होंने डी. सस्यूर के आधार पर भाषा के तंत्र को नया अर्थ दिया है | उनका मत है कि सृजनात्मक भाषा चयन और विन्यास दोनों का उपयोग करती है | विन्यास रचना की प्रतीकात्मकता, सांकेतिकता और अर्थ की बहुस्तरीयता के ताने-बाने से निर्मित होती है | याकोब्सन ने रचना की सम्प्रेषणीयता को उद्घाटित किया है | उनकी तरह ही डॉ. पी. एन. सिंह ने पाठ की सम्प्रेषण-प्रक्रिया पर बल दिया है | पाठ की संप्रेषणीयता उसके विन्यास में नहीं, अपितु उसके अर्थ में निहित है | इसलिए अर्थ को ध्यान में रखते हुए उन्होंने प्रेमचंदीय-पाठ का आरम्भ याकोब्सन-प्रणाली से किया | सही मायने में प्रेमचंद का पाठ इसी अर्थ में किया जाना चाहिए |
1928 ई. में व्लादिमीर प्रॉप ने अपनी पुस्तक मोर्फ़ोलोजी ऑफ़ फ़ॉकटेल्स में लोक कथाओं के पात्रों और उनके क्रियाकलाप को इसी संरचना के रूप में देखा था | ठीक वैसे ही, जैसे प्रेमचंद पंच परमेश्वर, ईदगाह, बड़े भाई साहब जैसी कहानियों या उपन्यासों के जरिये पाठकों पर छाप छोड़ते हैं और पात्रों के व्यक्तित्व का रेखांकन बड़े सलीके से करते हैं | पी. एन. सिंह प्रेमचंद के इसी व्यक्तित्व के कायल हैं | वे प्रेमचंद को भारतेंदु, गोर्की और बर्नार्ड शॉ की श्रेणी में रखते हैं—प्रेमचंद ने भी देशी भारतेंदु और विदेशी गोर्की और बर्नार्ड शॉ की तरह ही लिखा है और इसके लिए खतरे उठाये | वे तुलसी और टैगोर वाले अभिमत को नहीं मानते | टैगोर को जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था ठीक उसी समय सोज़े वतन को जब्त कर लिया गया था | उनके लिए टैगोर से अधिक प्रेमचंद महत्वपूर्ण हैं | उन्होंने लिखा है कि रवीन्द्रनाथ मूलतः कवि हैं जो कथाकारों की जटिल दुनिया में अक्सर भटक जाया करते थे | संकल्पजीवी कथाकार प्रेमचंद ने काव्यलोक में भटकने का कभी जोखिम नहीं उठाया | इसी आलेख में उन्होंने प्रेमचंद और टैगोर, शरतचंद्र वाले अभिमत का नकार किया है | यह नकार दरअसल प्रकाशचंद्र गुप्त के प्रेमचंदीय-पाठ का नकार है जिसके बहाने पी. एन. सिंह ने प्रेमचंद के त्रासद व्यक्तित्व की तलाश की है | उन्होंने रचनाकार के बरअक्स कथाकार और नाटककार के बरअक्स कथाकार के रूपक का प्रयोग किया है | वे केवल बर्नार्ड शॉ के कोरे बौद्धिक उलझाव से प्रेमचंद की तुलना नहीं करते बल्कि बर्नार्ड शॉ के अति बौद्धिक उलझाव से प्रेमचंद को आगे ले जाते हैं –बर्नार्ड शॉ का सामाजिक उलझाव निरा बौद्धिक है, प्रेमचंद का उलझाव जितना बौद्धिक है, उतना भावनात्मक भी | अतः बर्नार्ड शॉ के प्रतिनिधि नारी अथवा पुरुष पात्रों में बौद्धिक निस्संगता है जो उनके व्यंग्य एवं उपहास का स्रोत है | प्रेमचंद का यथार्थ से भावनात्मक उलझाव उपहास का सहारा नहीं ले सकता था | अतः वह उन्हें विडंबना ट्रेजिक विजन की ओर ले जाता है |
प्रेमचंद के चिंतन में नैतिक मान्यताओं, धार्मिक आग्रहों का रैखिक विकास है | रामलीला के नायकों के प्रति सम्मोहन से लेकर धार्मिक फासीवाद के क्रिटीक तक का फलक प्रेमचंद में है | हालाँकि वे बाद में प्रगतिशीलता के हैजटैग (अंधानुकरण) में शामिल हुए | उन्होंने संस्कृति, साम्प्रदायिकता और धार्मिक पाखण्डवाद का जमकर विरोध भी किया | अपने निबंध साम्प्रदायिकता और संस्कृति में उन्होंने संस्कृति को गैर जरुरी बताया | इस मामले में अपने अंतर्विरोधात्मक चिंतन के कारण प्रेमचंद आलोचकों की वाम-दृष्टि के शिकार भी हुए | डॉ. पी.एन. सिंह ने आलोचकों की इस वाम-दृष्टि पर दृष्टिपात किया है – अपनी मूलगामी सामाजिक आलोचना के लिए प्रेमचंद की पारंपरिक कोनों से सख्त आलोचना हुई | अमृतराय ने अपनी सुपरिचित पुस्तक कलम का सिपाही में इसकी सविस्तार चर्चा की है | जुलाई-दिसम्बर 1926 की सरस्वती के अंक में श्री राम अवध उपाध्याय नामक व्यक्ति ने प्रेमचंद को नकलची सिद्ध करते हुए कहा था कि रंगभूमि थैकरे के वैनिटी फेयर की नक़ल है | इसी प्रकार एक कहानी पंडित मोटेराम शास्त्री के विरोध में प्रेमचंद के ब्राह्मण विरोधी होने का इल्जाम लगाते हुए मुकदमा दायर किया | इसी प्रकार प्रेमचंद की व्यंग्य कला पर उनकी कहानी रसिक सम्पादक के हवाले से शिवदान सिंह चौहान ने लिखा कि जब सम्पादक की काल्पनिक प्रेयसी कामाक्षा देवी काली-कलूटी निकली तो सम्पादक का गुस्सा अश्लील व्यंग्य प्रहारों में फूट पड़ा | लेकिन प्रेमचंद जब सामाजिक राजनीतिक अनीति और शोषण का जिक्र करते हैं तब उनके व्यंग्य बड़े तीखे और मार्मिक हो जाते हैं | स्त्री संबंधी विवरणों में डॉ. पी. एन. सिंह ने प्रेमचंद की प्रशंसा की है | प्रेमचंद के स्त्रीपात्र पुरुष पात्रों की अपेक्षा अधिक सशक्त हैं | उनमें ढुलमुल प्रवृत्ति नहीं है और न ही वे दोस्तोएवस्की के ब्रदर्स- कारमाज़ोव की स्त्री पात्रों की तरह झगड़ालू | उन्होंने प्रेमचंद के स्त्री पात्रों के बहाने स्त्री विमर्श की सशक्त लेखिकाओं की तलाश की है |
पी. एन. सिंह विमर्शों की वैचारिकी से सीधे-सीधे टकराते हैं | कई बार वे दलित आन्दोलन कर्मियों के क्रियाकलाप से क्षुब्ध होते हैं तो कई बार प्रसन्न भी | प्रसन्नता उनके यहाँ इकहरी नहीं है और न केवल भावनात्मक आवेग, बल्कि प्रसन्नता आत्मचिंतन व गहरा आत्मबोध लिए हुए है | वे उनसे संवाद करते हुए चलते हैं | प्रो. सदानन्द साही ने लिखा है कि डॉ. सिंह मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उन विरल लोगों में हैं जिनके पास मार्क्सवाद की गहरी समझ है | इसलिए उनके मस्तिष्क के खिड़की दरवाज़े खुले हुए हैं, जिनसे गाँधीवाद, अम्बेडकरवाद और लोहियावाद की वैचारिकी का आवागमन होता रहता है | डॉ. साहब सही मायने में संवादधर्मी लेखक हैं | इसलिए वे अम्बेडकरवाद से वैसे ही संवाद करते हैं जैसे लोहियावाद या गाँधीवाद से | वे पूरब पश्चिम के गवाक्ष को खोलकर रिज का काम करते हैं | प्रायः बहुत कम आलोचकों में देखने-सुनने को मिलता है | ऐसा कोई विरला ही होता है | पी.एन.सिंह उन बिरले आलोचकों में से हैं | संवाद उनके यहाँ बड़ी साफगोई से आता है, उलझाव लिए हुए नहीं | वह चाहे कोई सामान्य बात हो या विशिष्ट | पुस्तक के नामकरण से लेकर कई ऐसे सन्दर्भ हैं जहाँ वे किसी बात की परवाह किये बिना सीधे सीधे अपनी बात कह देते हैं | उनमें कबीर जैसा साहस है | वे आलोचना के कबीर हैं | उनमें स्वीकृति का भाव भी जबरदस्त है | एक नमूना देखिए- डॉ. भगवान सिंह ने अपने-अपने राम पुस्तक लिखी है | इसलिए मैंने भी अपनी पुस्तक का नाम अपने-अपने प्रेमचंद रख लिया | यह बहुत सामान्य दिखती है, किन्तु है नहीं |
वर्ष 2004 में 31 जुलाई, दिन शनिवार को ‘भारतीय दलित साहित्य अकादमी’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर व ‘गुरू रविदास जन्मोत्सव कमेटी’ के अध्यक्ष मनोज कुमार ने सामूहिक रूप से दिल्ली के जंतर-मंतर में रंगभूमि का दहन किया | रंगभूमि का दहन कोई सामान्य घटना नहीं थी | इसने अकादमिक आलोचना को गहरे तक प्रभावित किया | पूरे वर्ष पक्ष-विपक्ष की तात्कालिक टिप्पणियों से गहमा-गहमी मची रही | इसी दौरान सदानंद साही द्वारा सम्पादित पुस्तक दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद का प्रकाशन हुआ | यह पुस्तक प्रेमचंदीय आलोचना का पुनर्पाठ है | इसमें प्रेमचंद की सामाजिक अनुभूति, दलित अस्मिता के प्रश्न को गाँधी, अम्बेडकर और लोहिया के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में पढ़ा गया | दरअसल इस समय प्रेमचंद के हवाले से इन चिंतकों की तलाश की गयी | किसी के लिए गाँधी महत्वपूर्ण हुए तो किसी के लिए अम्बेडकर | नामवर सिंह ने रंगभूमि के सूरदास को गाँधी के परिप्रेक्ष्य में देखा, वहीँ अम्बेडकरवादी आलोचकों जैसे सूरजपाल, कँवल भारती, नैमिशराय, डॉ. धर्मवीर ने अम्बेडकर के हवाले से जातीयता के प्रश्न, अनुभूति की सांद्रता पर सवाल किये | इस गहमा-गहमी के बीच पी. एन. सिंह ने बड़ी गंभीरता के साथ विचार किया | उन्होंने सुमनाक्षर जैसे लोगों के क्रियाकलाप की भर्त्सना की तो कँवल भारती द्वारा उठाये गये सवाल पर विचार करने के लिए कहा- कँवल भारती अपनी टिप्पणी में सर्वाधिक माडरेट हैं, वैसे वे अपने बड़बोलेपन के लिए सर्वाधिक चर्चित हैं | वे सावधान हैं और रंगभूमि को जलाये जाने का उल्लेख किये बगैर कुछ एक सकारात्मक एवं संवादी परिप्रेक्ष्यों पर बल देते हैं | वे प्रेमचंद को गाँधीवादी, साम्यवादी या ब्राह्मण-विरोधी मानने वालों को सतही बताते हुए उन्हें प्रगतिशील और आम आदमी के पक्षकार घोषित करते हैं |
डॉ. पी. एन. सिंह अपने समकालीनों में सर्वाधिक संवादधर्मी आलोचक हैं | उन्होंने प्रेमचंद का पाठ गहमा-गहमी के आवेग में बहकर नहीं, बल्कि ठहरकर किया है | वे रचनाकार और चिन्तक, चिन्तक और पाठक, पाठक और पाठ के बीच संवाद के आग्रही हैं | यही उनकी विशेषता है और उनका व्यक्तित्व भी | इसीलिए अपने विराट आलोचक व्यक्तित्व से वे सहज ही आकर्षण के केंद्र बन जाते हैं |

सुशील द्विवेदी
ईमेल susheeld.vats21@gmail.com

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1 Comment

  • बहुत अच्छा आलेख।

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