मकर संक्रांति: एक अखिल भारतीय त्यौहार

 मकर संक्रांति: एक अखिल भारतीय त्यौहार

मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है जो संपूर्ण भारत में अलग अलग रूपों में मनाया जाता है । हिंदी प्रदेशों में मकर संक्रांति के रूप में जहां इसे हम लोग खिचड़ी भी कहते हैं ।तमिलनाडु में इसे पोंगल कहा जाता है ।पंजाब और दिल्ली में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता हैं,जबकि उत्तर पूर्व के असम में इसे बिहू के रूप में मनाते हैं ।

मेरे गांव में एक कहावत है कोस कोस में पानी बदले और दस कोस में वानी (वाणी) ।अवध क्षेत्र में कोस दूरी मापने की इकाई होती है और एक कोस में तीन किलोमीटर के लगभग होता है ।कई तीर्थस्थानों जैसे अयोध्या या प्रयाग राज में कोस पर आधारित परिक्रमाएं होती हैं जैसे पंचकोसी परिक्रमा एक नाम हो सकता है। इस परिक्रमा में यात्रियों को पांच कोस की पैदल परिक्रमा करनी पड़ती है । यह सोच कर भी खुश हुआ जा सकता है कि हमारे देश में ही मैराथन इन परिक्रमाओं के रूप में शुरू हुआ होगा । मैराथन कोई विदेश से आई हुई अवधारणा नहीं है बल्कि अपने देश की ही प्राचीन परम्परा है ।
शशि थरूर अपनी किताब why iam a Hindu में लिखते हैं कि प्राचीन भारतीय परंपरा में काम उत्सव या मदनोत्सव मनाने की परंपरा रही है और वो कहते हैं जिन्हें वेलेंटाइन डे से समस्या है वो चाहे तो इस पूरे हफ़्ते को प्राचीन संस्कृति से जोड़ सकते हैं। इसमें दो मत नहीं है कि भारतीय परम्परा में प्रेम के देवता के रूप में कामदेव हैं और रति की देवी के रूप में रति हैं । शशि थरूर ने अपनी किताब में हिंदू होने या न होने के बारे में कई मत मतांतर के बारे में चर्चा की है और सिर्फ़ वेलेंटाइन की ही बात नहीं करते हैं ।

विषय पर आते हैं मकर संक्रांति,लोहड़ी और पोंगल को मनाते हुए देखा है । प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसका भाग रहा हूं ।खिचड़ी या मकर संक्रांति तो बचपन से मन में बसा हुआ है ।
हर जगह की अपनी परम्परा या मनाने का तरीक़ा है । सुबह सुबह नहा धोकर उड़द दाल वाली देशी घी में लथपथ खिचड़ी खाने का मज़ा ही अलग हुआ करता था ।बच्चा पार्टी के लिए सुबह से शाम तक का कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित हुआ करता था ।घर की महिलाएं भी सुबह खिचड़ी बनाने से लेकर शाम तक कुछ न कुछ पकवान बनाने में व्यस्त रहती थी । खिचड़ी में घर में कुछ ख़ास मेहमानों का आना भी होता था जो अक्सर बहन ,बेटी या बुआ के ससुराल पक्ष के होते थे ।हर घर में कोई मेहमान हुआ करता था लेकिन जिसे पूरा गांव जानता था,दुआ सलाम करता था ।

गांव की सामूहिकता की बात ही निराली थी ।तमाम तरह के जातीय,धार्मिक और सामाजिक विविधताओं और भेदभाव के बावजूद,किसी के घर का मेहमान या पहुना या पाहुन पूरे गांव के लिए मान्य की तरह होते थे जिनका हर कोई सम्मान करता था ।

बच्चा पार्टी निकल जाती थी गुनगुनी धूप में पतंग उड़ाने,टायर चलाने या कंचे खेलने ।अगर धूप न हुई तो आग जलाकर उसके इर्द गिर्द बैठकर देश दुनिया की तमाम बातें कर लेते थे ।घर के बाहर द्वारे पर आग के इर्द गिर्द मर्दों की पंचायत और आंगन में आग के पास बैठकर औरतों की महा पंचायत ।

एक और ख़ास बात यह होती थी कि कड़ाके की ठंड में हर किसी को नहाना ही पड़ता था ।पहले कोई बार्थरूम तो होते नहीं थे ।कुओं पर बाल्टी से पानी भरकर नहाते वक्त मुंह से ज़ोर ज़ोर आवाजें निकलती थीं कि पूरा मोहल्ला जाग जाए।शुक्र यह होता था कि नहाकर वापस आने पर आग की गर्मी के लिए हहाकर जलता हुआ चूल्हा या ज़ोर से जलती हुई पत्तियां या सुलगते हुए कंडे कुछ न कुछ उपलब्ध होता था और जाड़ा छू मंतर ।जाड़ा बैठे रहने से ज़्यादा लगता है एक बार सक्रिय हो जाने पर जाड़ा तुरंत पीछा छोड़ देता है ।

हिमाचल प्रदेश में लोग माघ साजी को मकर संक्रांति के रूप में मनाते हैं। यहां संक्रांति को साजी कहा जाता है, जबकि माघ महीने का नाम है। मकर संक्रति या खिचड़ी के दिन नदियों में स्नान करने का भी रिवाज रहा है ।

जहां तक पोंगल की बात है यह मुख्य रूप से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पुडुचेरी में मनाया जाता है। पोंगल शब्‍द तमिल साहित्य से आया है, जिसका अर्थ है उबालना या अधिक बह जाना। यह सूर्य , धरती और अन्य खेत मवेशियों को धन्यवाद देने का उत्सव है । सुख-समृद्धि की कामना से चावल और गुड़ को उबालकर प्रसाद बनाया जाता है और फिर इसे सूर्य को अर्पित करते हैं. इसे ही पोंगल कहा जाता है ।
इस दिन से तमिल नववर्ष भी शुरू होता है ।पोंगल चार दिवसीय त्यौहार है ।

वहीं लोहड़ी पंजाब, हरियाणा, दिल्ली जैसे राज्‍यों के बड़े त्‍योहारों में से एक है. सिख और पंजाबी समुदाय के लोग इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं । 13 जनवरी को लोहड़ी का त्‍योहार मनाया जाता है और इस दिन आग के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते हैं और आग में गुड़, मूंगफली, रेवड़ी, गजक, पॉपकॉर्न आदि डाला जाता है फिर लोग करीबी दोस्‍त, रिश्‍तेदार वगैरह के साथ मिलजुलकर ढोल-नगाढ़ों पर भांगड़ा और गिद्दा वगैरह करते हैं और एक दूसरे को बधाइयां देते हैं ।

बिहू पर्व असम में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। माघ बिहू के अलावा राज्य में दो और बिहू के त्यौहार को पूरे रीति रिवाज और परंपरा के साथ मनाया जाता है। माघ बिहू मकर संक्रांति के साथ मनाया जाता है।

देखने लायक बात है कि खिचड़ी,पोंगल,लोहड़ी या बिहू ,ये सभी त्यौहार किसानी त्यौहार हैं ।तमिलनाडु में धान की फसल अपने शबाब पर होती हैं ,वहीं पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में गेहूं ,चना ,सरसों और दलहन की फसलें खेतों में लहलहा रही होती हैं। ये त्यौहार प्रकृति के प्रति धन्यवाद हैं ।

तेज

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