मर्ज़ान -अफगानी युद्ध का चश्मदीद गवाह बब्बर शेर

 मर्ज़ान -अफगानी युद्ध का चश्मदीद गवाह बब्बर शेर

डॉ आरके सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ एवम साहित्यकार

वह युद्धों, आक्रमणों, घेराबंदी और यहाँ तक कि एक ग्रेनेड हमले तक से बच गया, लेकिन काबुल के बहादुर बब्बर शेर मर्ज़ान ने आखिरकार एक ऐसे दुश्मन के आगे घुटने टेक दिए, जिसे आज तक कोई हरा नहीं सका: बुढ़ापा।
अपने 23 वर्ष के अफगानी जीवन में वह गवाह बना अफ़ग़ानिस्तान के उस अन्तहीन सत्ता संघर्ष का जिसमें उसने साम्यवादी सरकार को गिरते, सोवियत सेना से लड़ते मुजाहिदीन देखे। वह चश्मदीद गवाह बना तालिबानी शासन का और जीवन के अंत काल में उसने काबुल के आसमान में ऊंचाइयां भरते अमेरिकी बमवर्षक भी देखे।
मर्ज़ान प्रतिनिधित्व करता है युद्ध की विभीषिका में जलते उन बेजुबानों के दर्द का जिसे शायद बहुत ही कम लोग समझ पाते हैं। क्योंकि वे अखबारों की सुर्खियां नहीं बनते। उनके आंसू पोंछने वाले कोई नहीं होते। लेकिन युद्ध का ग्रास वे भी बनते हैं।
ऐसे ही एक बब्बर शेर की कहानी है यह जिसकी चर्चा आज भी काबुल के बाशिंदे करते हैं।
वर्ष -1976; स्थान -कोलोन ज़ू, तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी
एक बब्बर शेर शावक ने इस संसार में आंखें खोलीं। वह भी अपने अन्य साथी वन्यजीवों की तरह अपने बाड़े में घूमता-फिरता और शाम को ताजा गोश्त खा कर सो जाता था। उसे भी एहसास होता था कि बाड़े के बाहर का संसार कैसा होता होगा। पश्चिमी जर्मनी का शांत वातावरण और नन्हे शावक को चाहने वाले उसे भी मनभावन लगते थे। लेकिन उसे नहीं पता था कि नियती ने उसकी जिंदगी में इसके विपरीत इतनी उथल-पुथल लिख रखी है कि जिसे सुनकर ही इंसानी रूह कांप उठे।


वर्ष -1978; स्थान -काबुल ज़ू, अफ़ग़ानिस्तान
काबुल ज़ू ही नहीं पूरे काबुल शहर में एक उत्साह सा था कि आज उन्हें कोलोन ज़ू से उपहार स्वरूप एक बब्बर शेर मिल रहा था। वह शावक अब दो वर्ष का हो गया था। नया वातावरण, नया ज़ू, नया ज़ू कीपर यहां तक कि नया नाम मर्ज़ान -सब कुछ बदल गया था उस शावक के लिए। लेकिन उसे वहां वही प्रेम मिला जो उसे कोलोन ज़ू में मिलता था। वह धीरे धीरे अपने आपको नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालने लगा था। वह युवावस्था की दहलीज पर खड़ा था। उसके गले के चारों ओर उगते बाल मर्ज़ान को जंगल के राजा का खिताब देने को आतुर थे।
लेकिन तभी काबुल की साम्यवादी सरकार में उथल-पुथल मच गई। गृह युद्ध के बादल मंडराने लगे, सोवियत सेना और मुजाहिदीन का गुरिल्ला युद्ध प्रारंभ हो गया। यदा-कदा काबुल ज़ू में भी गोलियों की तड़तड़ाहट की आवाज़ें गूंजने लगीं। लेकिन मर्ज़ान को देखने वालों में उत्साह की कमी नहीं आई।
नब्बे के हिंसक दशक में काबुल ज़ू पर भी कई विस्फोटक गिरे जिसमें कई वन्यजीव यहां तक कि एक हाथी की भी मौत हो गई। ज़ू का वेटरिनरी हॉस्पिटल भी क्षतिग्रस्त हो गया।
27 मार्च 1995, मर्ज़ान के लिए वह श्राप लेकर आया जो उसकी आने वाली ज़िंदगी भर के लिए दंश दे गया। एक तथाकथित सैनिक या यूं कहें कि एक अतिउत्साही व्यक्ति अपनी बहादुरी दिखाने को मर्ज़ान के बाड़े में कूद गया। लेकिन मर्ज़ान ने पलक झपकते ही उसका काम तमाम कर दिया। अगले दिन उस व्यक्ति के भाई ने बदले की भावना से मर्ज़ान के बाड़े में हैंड ग्रेनेड फेंक दिया। इस हमले में मर्ज़ान का चेहरा, एक आंख और दांत बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए। वह चलने में भी असमर्थ हो गया। चूंकि वेटेरिनरी सुविधायें भी युद्ध की आहुति चढ़ चुकी थीं। इसलिए बड़ी जद्दोजहद के बाद मर्ज़ान को बचाया जा सका। लेकिन लँगड़े मर्ज़ान के दुखों का अंत यहीं नहीं था। वह अपनी गुफा में चढ़ते समय गिर पड़ता था। अतः उसके लिए एक रैंप का निर्माण भी करना पड़ा। दांतों के क्षतिग्रस्त होने से वह खाने में भी असमर्थ हो गया था। इस कारण उसे सिर्फ गोश्त के टुकड़े ही दिए जाने लगे।
संयोगवश मर्ज़ान इस ग्रेनेड आक्रमण के बाद भी सात वर्ष जीवित रहा परन्तु उसपर आक्रमण करने वाले व्यक्ति की सात दिन बाद ही मृत्यु हो गई।
जहाँ इस उथल-पुथल में वन्यजीवों पर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है, वहीं कई वन्यजीव प्रेमियों ने किसी तरह इस कठिन समय में भी मर्ज़ान की ज़रूरतों का ध्यान रखा। अपने जीवन के अंतिम चार दिनों में मर्ज़ान ने खाना भी छोड़ दिया था। उसे रक्त की धमनियों के माध्यम से ऊर्जा, विटामिन आदि भी देने की कोशिश की गईं। लेकिन अफ़ग़ान युद्ध की विभीषिका झेल चुके इस बहादुर ने 25 जनवरी 2002 को नियति के आगे घुटने टेक दिए।
आज भी काबुल ज़ू में मर्ज़ान के कांसे की प्रतिमा युद्ध की बलि चढ़ते इन बेजुबानों की अनकही कहानी कहती है। आज मर्ज़ान अपने दशकों की कठिनाइयों के बाद भी युद्धग्रस्त अफगानिस्तान के अस्तित्व का प्रतीक बन गया है। उसके स्मारक पर शिलालेख में लिखा है, “यहां मर्ज़ान है, जो लगभग 23 वर्ष का था। वह दुनिया में सबसे प्रसिद्ध शेर था।”

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