मूँछे हो तो किसके जैसी

 मूँछे हो तो किसके जैसी

तेज प्रताप नारायण

मूँछे हों तो …………….जैसी जैसी ? अब यह जो रिक्त स्थान की पूर्ति है, उसमें क्या क्या भर सकते हैं ,नत्थू लाल जैसी ,अभिनंदन जैसी ,हरिहरन जैसी, राम चरन जैसी ,चार्ली चैपलिन जैसी ,हिटलर जैसी या शिवा जी जैसी या ….. । यह डॉट डॉट बड़ा खतरनाक होता है लेकिन यह डॉट डॉट सबको अपनी बात रखने का मौक़ा देता है और यह डॉट डॉट लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाता है । अब इस डॉट में चाहे मैं अपना नाम ही भर दूं कि मूँछे हो तो तेज प्रताप जैसी और फिर छोटी सी ख़ुशी पा लूं ,आत्म सम्मोहित हो लूँ । मुझे लगता है बड़े- बड़े नेता ,हीरो और यहाँ तक ज़ीरो भी आत्मसम्मोहित होते हैं ।वैसे ज़ीरो का तो आत्म सम्मोहन बनता भी है जिस अंक के पीछे लगा उसको मालामाल कर दिया ।
इसीलिए रहीम जी कहते हैं,”जहाँ काम आए सुई ,कहाँ करे तलवार ।” ‘ मतलब हर किसी की अपनी वैल्यू है ,वह चाहे छोटा हो या बड़ा ,खड़ा हो या पड़ा । जब हर किसी की वैल्यू होने लगती है तभी हर किसी के ज्ञान या स्किल का प्रयोग हो पाता है और तभी कोई देश , समाज या परिवार मज़बूत हो पाता है ।

पीछे लगना तो वैसे बिल्कुल अच्छा नहीं होता लेकिन हर शब्द का अर्थ संदर्भ के अनुसार बदलता है । मतलब हम किसी के पीछे लगें और सामने से कहा जाए कि मेरे पीछे न लगो तो बस वहीं स्टॉप हो जाना चाहिए । वैलेंटाइन डे के दिन तो यह बात और प्रासंगिक हो जाती है ।दूसरों के जज़्बातों का सम्मान ही असली लोकतंत्र है ।
वैसे मूँछे न हो तो क्या मर्द ,मर्द नहीं रह पाता ।अगर मर्द नहीं पाता तो क्या हो जाता है औरत हो जाता है ।अभी हाल ही में एक काव्य गोष्ठी में एक आलोचक कह रहे थे कि जब कोई कविता लिखता है तो वह उस समय औरत हो जाता है । औरतें ही हैं पूरी आबादी और मर्द हैं पूरी बर्बादी । लेकिन बहुत सारे बिन मूँछो वाले मर्द औरत कहलाना पसंद नहीं करेंगे तो क्या किन्नर कहलाना पसंद करेंगे ।छि छि क्या बात बोल दी मैंने, हाऊ इट इज़ पासिबल? बेचारे जो “न नारी और न नर , वह होते हैं किन्नर ” पूरी तरह बहिष्कृत और तिरस्कृत। इस देश की ज़्यादातर आबादी की तरह देश निकाला की स्थिति में जीते हुए ,ज़िंदगी का ज़हर पीते हुए ।

यह सब लिखते समय मेरे अंदर का मर्द ,मेरे अंदर के लेखक को दबोच कर पटक देना चाहता है कि हाऊ डेयर यू ? मुझे मर्द रहने दो चाहे मूँछे हो या न हों । ठीक है मर्द जी आप मर्द रहिए लेकिन मेरी(लेखक)की भी हत्या न करिए। यह कहने से मेरे अंदर का मर्द थोड़ा शांत हो
गया है । क्या करें जनाब? हमारे समाज के मर्दों की मर्दांगनी कुलांचे मारती रहती है कोई बच्ची हो या जवान ,भूत या वर्तमान उस पर वो टूट पड़ना चाहते हैं ।

जैसे कुत्ते की दुम उसके साथ जुड़ी होती है वैसे ही मर्दों की मूँछे ।जहाँ मर्द, वहाँ मूँछ । मतलब मर्द और मूँछ पर्यायवाची शब्द हो सकते हैं ।अब किसी को कहो ये मर्द तो ये मूँछ निकलेगा। मर्दवाद को मूँछवाद भी कह सकते हैं । अब जिसकी मूँछो में जितने बाल वह उतना ही बड़ा मर्द या उसके अंदर उतने ही मर्द और उसकी उतनी ही ज़्यादा मर्दांगनी । इसे मर्दांगनी का नियम भी कह सकते हैं आइंस्टीन के नियम की तरह । क्या पता नोबेल प्राइज कमिटी के मेंबरान की मर्दांगनी मेरे इस लेख से ख़ुश हो जाए और मुझे इस लेख के लिए नोबल प्राइज के लिए नॉमिनेट कर दे ।
वैसे वैलेंटाइन के अवसर पर भी बहुत सारे मर्द प्रकट होते हैं और गुलाब लिए प्रेम का स्वांग रचते हुए प्रेमी जोड़ों पर अत्याचार की लाठी चलाने लगते हैं । अब कुछ मर्द ऐसे भी होते हैं जो किसी का चेहरा बिगाड़ने में बड़े आगे रहते हैं ।लेकिन यह मर्द होना नहीं है बल्कि नामर्द होना है ।
जो असली मर्द होते हैं वे किसी को दर्द नहीं देते हैं मल्लब जो असली मर्द होता है वह दर्द नहीं देता है और उसको दर्द होता है दूसरों की पीड़ा में। तो यह फिल्मी डायलॉग कि ‘ मर्द को दर्द नहीं’ भी हमने बदल दिया ।अब कहा जाए जो मर्द होगा उसे दूसरों का दुख देखकर दर्द होगा । अब थोड़ा आत्मसम्मोहन होने लगा है मुझे भी ,तो क्या आत्मसम्मोहित हो जाऊं मैं भी ?
सच बात तो यह है कि मूँछो से मर्द होने का कोई संबंध नहीं है । हर मर्द में औरत होनी चाहिए और औरत में थोड़ा मर्द । तो मूँछे सफाचट रखिए या बड़ी -बड़ी ,घनी- घनी ।चाहे नत्थूलाल जैसी या अभिनंदन जैसी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।यह फैशन है ।
अगर सच्ची में मर्द होंगे तो किसी को दर्द नहीं देंगे ।

तेज

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