मृत्युबोध से उपजे जीवन बोध की कविता: डायरी का पीला वरक

 मृत्युबोध से उपजे जीवन बोध की कविता: डायरी का पीला वरक

समीक्षक: डॉ कादम्बिनी मिश्रा

कविता संग्रह: डायरी का पीला वरक

समीक्षक :कादम्बिनी मिश्रा

कवि: सुशील द्विवेदी

कहा जाता है कि आज के त्रासद समय की विडंबना पूर्णस्थिति को कविता अपने कलेवर में नहीं समा सकती, लेकिन पिछले बरस प्रकाशित कविता-संग्रह ने इस चुनौती को बहुत कुछ संभव कर दिखाया है। संग्रह का शीर्षक है – ‘डायरी का पीला वरक़’ और कवि हैं ‘सुशील द्विवेदी’ l युवा कवि के इस संग्रह को पाठकों का इतना स्नेह मिला है कि अब जब मैं संग्रह पर दो शब्द लिखने बैठी हूँ तब तक दूसरा संस्करण आ चुका है।
मुखपृष्ठ पर संग्रह के शीर्षक का सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘पीला’ पीले रंग में अंकित है। इस पीले रंग में जीवन के कई शीर्ष वासंती आभा में छिटकी कुछ अप्रतिम प्रेम कविताएं हैं। ‘नारवा’, ‘मछली’, ‘सांझ का दिया’, ‘कल्कि’, ‘प्रतीक्षा’ जैसी कविताओं की नई नवेली काव्य-नायिकाएं बरबस पाठकों का हाथ पकड़ कर अपने पास उठा लेती हैं । ‘हेरा’, ‘नारवा’, ‘माहिका’ की रेशमी उपस्थिति को अनदेखा करना मुश्किल है।
एक पीला रंग अनुभव के धूप में पके ग्रामीण जीवनबोध का है। इस रंग की रचनाएं धान की पकी बालियों की तरह पर परिपक्व हैं जिनकी भाषा के बिंब मिट्टी की गंध से युक्त सोंधी है । कौशांबी को संबोधित कविताएं- ‘गोझी’, ‘चंदना’, ‘नेग’, ‘जोग जतन’ इत्यादि में जनपद की संस्कृति झंकृत होती है । साथ ही ग्राम्य-जीवन के अंधविश्वास और विडंबनाओं का रेखांकन हुआ है।
किन्तु, इस पीले रंग में एक और पीलापन है जिसमें मृत्युबोध से उपजी गहन पीड़ा की छाया है l मृत्यु की छाया चेहरे की रक्तिम आभा को पीला कर देती है। फिर इस महामारी के वर्षों का कहना ही क्या..
यह नर पिशाच वर्ष
अब तक की धरती का सबसे बड़ा मायावी है
नदियां तड़पती रहीं दो बूंद पानी के लिए
हवाएँ भूल गईं अपना रास्ता
दीवारें खंजर की तरह
लोगों के गले में पड़ी रहीं l (पृष्ठ संख्या 94)

‘जिस उम्र में प्रसाद से काम चला लेना चाहिए, उस उम्र में कृष्णमूर्ति को ले जाने की जिद किये’ इस कवि के मृत्युबोध के बिम्ब अत्यंत मार्मिक हैं
जब आंखों में अंधेरा शोर करने लगे
पुतलियाँ टूटी प्याली-सी गढ़ने लगे
भौहें भूल जाएं अपना नर्तन
तब मृत्यु बाज – सी
सीने में क्यों नहीं उतरती? (पृष्ठ संख्या 91)

‘कोरोना देवी’ की क्रूरता से विचलित जनमानस की भयभीत-भ्रमित मनोदशा एवं समय की भयावहता का यथार्थ प्रतिबिंब का दूसरा उदाहरण दृष्टव्य है –
अगरबत्ती सुलगाई गयी
लोबान सुलगाया गया
कुछ पीड़ितों को भस्म दिया गया,
एक पीड़ित युवती के बाल उखाड़ गए l (पृष्ठ संख्या 50)

लेकिन पीले से धूसर होते इस नाउम्मीद समय में भी कवि की सबसे बड़ी सफलता यह है कि वह उम्मीद की ‘आखिरी बूंद’ बचा लेना चाहता है-
तुम्हारे पायतान में बैठा
तुम्ह्रें बचा लेने और खो देने के बीच
बोतल में बची अंतिम रक्त बूंद की तरह
अटक गया हूँ… (पृष्ठ संख्या 82)

युवा कवि के इस प्रथम कविता-संग्रह की परिपक्वता पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता है। कारण, कि ‘डायरी का पीला वरक़’ संग्रह न केवल ग्रामीण जीवन-बोध और महानगरीय -बोध के मध्य इन बीते 2 वर्षों के बीच उपजे मृत्युबोध के सघन अवसाद से उपजी रचनात्मक ऊर्जा का मूर्त रूप है; बल्कि इसमें सांस्कृतिक इतिहास बोध की भी झलक विद्यमान है। महानगरीय बोध को प्रतिदिन जीता हुआ कवि ‘कनॉट प्लेस’ को अधजली सिगरेट के मानिंद मसल कर आगे बढ़ता है क्योंकि कवि के भीतर कौशांबी जनपद का इतिहास बोध बोलता है
कनाट प्लेस मेरे लिए
एक सुलगती हुई सिगरेट है
जिसे दो चार कश खींचने के बाद
जूतों से मसल देता हूँ… (पृष्ठ संख्या 38)

महानगर से उठकर कविता कौशांबी आ गई है। एक दृश्य देखिए –
कौशांबी के अंतिम छोर तक
फैले फूले कास, कुश, सरपत गारण,
तुलसी, धानमंजरी
भंवरों और तितलियों का केलि रव
किलान्हाई से शशि डाह करने के लिए पर्याप्त है। (पृष्ठ संख्या-30)

गम-ए-रोजगार जैसी रोज चुभने वाली समस्या के लिए महानगर के कमरे में बैठा कभी ‘इंटरव्यू’ लिखता है किंतु कौशांबी की कौंधती स्मृतियों के लिए एक बार पुनः ‘चंदना’ की पंक्तियां देखिए –
जीवन आसमान-सा बड़ा कैनवास है
उसमें स्मृतियाँ मेघों की तरह आती हैं।
रंग बदलती हैं, मिट जाती हैं।
इस बार महावीर कौशांबी आए
चंदना से मिले किंतु बुद्ध की तरह लौटे नहीं… (पृष्ठ संख्या 32)

यहाँ यथार्थ और स्मृति की आवाजाही के बीच जिन कविताओं का उल्लेख किया जाना आवश्यक है, वह ‘मसान’l मसान के रूप में कवि यातना के गर्भ में सना “जीवन और मृत्यु के गीत रचता है क्योंकि रचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है’’। ‘मसान’ ऐसी मार्मिक कविता है जहाँ रेत होती स्मृतियां हैं, राख होते सपने..
मसान में बिलखते हुए कवि मित्र
तुम कवि हो, हत्यारे नहीं।
तुम्हारे लोगों ने तुम्हें कवि बनाया है।
इ सलिए याद रखो अपने बेजुबान लोगों को,
जिन्होंने तुम्हें आवाजें दी हैं । (पृष्ठ संख्या 26)

तमाम स्मृति बिम्बों के साथ इन टूटे बिखरे सालों को समेटते हुए ‘डायरी का पीला वरक़’ पीला हो जाता है। संवेदना और पीड़ा के पीली स्याही से लिखे ‘वरक़’ से पाठक सहज ही तादात्म स्थापित कर लेता है। इन कविताओं की जो प्रमुख भावभूमि है, उसमें मुख्य प्रश्न हैं – सर्वांगीण मानवीय विघटन से मुकाबला करने का, व्यक्ति और समाज के अंतर्विरोध के तीखे प्रश्न के बीच मूल्यों की पुनर्स्थापना की गहरी चिंता सर्वत्र मुखरित है। अब जबकि इस तकनीकी युग में हम यथार्थ सामाजिक दायित्व से पलायन कर एक प्रति-समाज (सोशल मीडिया) में लीन रहते हैं। तब कवि मनुष्य की वास्तविक आंतरिकता को रेखांकित कर तमाम विरोध में सामंजस्य बिठाते हुए मान्यता को बचाए रखना चाहता है।
‘डायरी के पीले वरक़’ की विविध रंगी एक रचनाएं एक गहरे दायित्व बोध से ओतप्रोत है जिसमें नई शिल्प व नये कथ्य का आग्रह है तो जीवनाग्रह भी l नए शिल्प व नये कथ्य के आग्रह के बावजूद कविता का सामाजिक पक्ष दुर्बल नहीं, सबल है l कवि काव्य की सामाजिकता के सिद्धांत में जहां विश्वास करता है, वहाँ इसका व्यावहारिक प्रयोग भी l यदि हम कवि के इस संग्रह को किसी प्रतिमान में करना चाहें तो लक्ष्मीकांत वर्मा के शब्द अत्यंत समीचीन जान पड़ते हैं- “नई कविता में मानव व्यक्तित्व और उसमें आत्मविश्वास और आस्था के साथ सामाजिक दायित्व की भावना भरने के अंकुर विद्यमान हैं। इन्हें कोई प्रचार कुंठित नहीं कर सकता। कोई भी विवाद इन उगते अंकुरों का साहस नहीं रोक सकता।’’ (लक्ष्मी कान्त वर्मा, कविता के नए प्रतिमान, पृष्ठ संख्या 292)

डॉ. कादंबिनी मिश्रा
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गोंडा पारा, बिलासपुर
छत्तीसगढ़ ।

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