राहुल सांकृत्यायन के जन्मदिन पर उनकी किताब के कुछ अंश

 राहुल सांकृत्यायन के जन्मदिन पर उनकी किताब के कुछ अंश

साभार :सीमा पटेल ,कवयित्री, दिल्ली

दिमागीगुलामी हैप्रगति में_बाधक


जिस जाति की सभ्यता जितनी पुरानी होती है, उसकी मानसिक दासता के बंधन भी उतने ही अधिक होते हैं. भारत की सभ्यता पुरानी है, इसमें तो शक ही नहीं और इसलिए इसके आगे बढ़ने के रास्ते में रुकावटें भी अधिक हैं. मानसिक दासता प्रगति में सबसे अधिक बाधक होती है.

हमारे कष्ट, हमारी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक समस्याएं इतनी अधिक और इतनी जटिल हैं कि हम तब तक उनका कोई हल सोच नहीं सकते जब तक कि हम साफ–साफ और स्वतंत्रतापूर्वक इन पर सोचने का प्रयत्न न करें. वर्तमान शताब्दी के आरम्भ में भारत में राष्ट्रीयता की बाढ़–सी आ गई, कम से कम तरुण शिक्षितों में. यह राष्ट्रीयता बहुत अंशों में श्लाघ्य रहने पर भी कितने ही अंशों में अंधी राष्ट्रीयता थी.

झूठ–सच जिस तरीके से भी हो, अपने देश के इतिहास को सबसे अधिक निर्दोष और गौरवशाली सिद्ध करने अर्थात अपने ऋषि–मुनियों, लेखकों और विचारकों, राजाओं और राज–संस्थाओं में बीसवीं शताब्दी की बड़ी से बड़ी राजनीतिक महत्व की चीजों को देखना हमारी इस राष्ट्रीयता का एक अंग था. अपने भारत को प्राचीन भारत और उसके निवासियों को हमेशा से दुनिया के सभी राष्ट्रों से ऊपर साबित करने की दुर्भावना से प्रेरित हो हम जो कुछ भी अनाप–शनाप ऐतिहासिक खोज के नाम पर लिखें, उसको यदि पाश्चात्य विद्वान न मानें तो झट से फतवा पास कर देना कि सभी पश्चिमी ऐतिहासिक अंग्रेजी और फ्रांसीसी, जर्मन और इटालियन, अमेरिकी और रूसी, डच और चेकोस्लाव सभी बेईमान हैं, सभी षड्यंत्र करके हमारे देश के इतिहास के बारे में झूठी–झूठी बातें लिखते हैं. वे हमारे पूजनीय वेद को साढ़े तीन और चार हजार वर्षों से अधिक पुराना नहीं होने देते (हालांकि वे ठीक एक अरब बानवे वर्ष पहले बने थे). इन भलेमानसों के ख्याल में आता है कि अगर किसी तरह से हम अपनी सभ्यता, अपनी पुस्तकों और अपने ऋषि–मुनियों को दुनिया में सबसे पुराना साबित कर दें, तो हमारा काम बन गया.

शायद दुनिया हमारे अधिकारों की प्राचीनता को देखकर बिना झगड़ा–झंझट के ही हमें आजाद हो जाने दे, अन्यथा हमारे तरुण अपनी नसों में उस प्राचीन सभ्यता के निर्माताओं का रक्त होने के अभिमान में मतवाले हो जाएं और फिर अपने राष्ट्र की उन्नति के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी भी उनके बायें हाथ का खेल बन जाए, और तब हमारे देश को आजाद हो जाने में कितने दिन लगेंगे? आज हमारे हाथ में चाहे आग्नेय अस्त्र न हों, नई-नई तोपें और मशीनगन न हों, समुन्दर के नीचे और हवा के ऊपर से प्रलय का तूफान मचाने वाली पनडुब्बियां और जहाज न हों, लेकिन यदि हम राजा भोज के काठ के उड़ने वाले घोड़े और शुक्रनीति में बारूद साबित कर दें तो हमारी पांचों अंगुलियां घी में. इस बेवकूफी का भी कहीं ठिकाना है कि बाप–दादों के झूठ–मूठ के ऐश्वर्य से हम फूले न समायें और हमारा आधा जोश उसी की प्रशंसा में खर्च हो जाए.

अपने प्राचीन काल के गर्व के कारण हम अपने भूत के स्नेह में कड़ाई के साथ बंध जाते हैं और इससे हमें उत्तेजना मिलती है कि अपने पूर्वजों की धार्मिक बातों को आंख मूंदकर मानने के लिए तैयार हो जाएं. बारूद और उड़नखटोला में तो झूठ–सांच पकड़ने की गुंजाइश है, लेकिन धार्मिक क्षेत्र में तो अंधेरे में काली बिल्ली देखने के लिए हरेक आदमी स्वतंत्र है. न यहां सोलहों आना बत्तीसों रत्ती ठीक–ठीक तौलने के लिए कोई तुला है और न झूठ–सांच की कोई पक्की कसौटी. एक चलता–पुर्जा बदमाश है. उसने अपने कौशल, रुपये–पैसे और धोखे–धड़ी और तरह–तरह के प्रलोभन से कुछ स्वार्थियों या आंख के अंधे गांठ के पूरो को मिलाकर एक नकटा पंथ कायम कर दिया और फिर लगी हजारों छोटी–मोटी, शिक्षित और मूर्ख, काली और सफेद भेड़ें हा–हा कर नाक कटाने. जिन्दगी भर वह बदमाश मौज करता रहा. मरने के बाद उसके अनुयायियों ने उसे और ऊंचा बढ़ाना शुरू किया. अगर उस जमात को कुछ शताब्दियों तक अपने इस प्रचार में कामयाबी मिली तो फिर वह धूर्त दुनिया का महान पुरुष और पवित्र आत्मा प्रसिद्ध हो गया.

पुराने वक्त की बातों को छोड़ दीजिए. मैंने अपनी आंखों से ऐसे कुछ आदमियों को देखा है जिनमें कुछ मर गये हैं और कुछ अभी तक जिन्दा हैं. उनका भीतरी जीवन कितना घृणित, स्वार्थपूर्ण और असंयत था. लेकिन बाहर भक्त लोग उनके दर्शन, सुमधुर आलाप से अपने को अहोभाग समझने लगते थे. नजदीक से देखिये, ये धार्मिक महात्माओं के मठ और आश्रम ढोंग के प्रचार के लिए खुली पाठशालाएं हैं और धर्म–प्रचार क्या, पूरे सौ सैकड़े नफे का रोजगार है. अधिकांश लोग इसमें अपने व्यवसाय के ख्याल से जुटे हुए हैं. अयोध्या में एक महात्मा थे. उनसे रामजी इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने स्वयं बैकुण्ठ से आकर उनका पाणिग्रहण किया. हां, पाणिग्रहण किया! पुरुष थे पहले, पीछे तो भगवान की कृपा से वह उनकी प्रियतमा के रूप में परिवर्तित कर दिये गये। रामजी के लिए क्या मुश्किल है. जब पत्थर मनुष्य के रूप में बदल सकता है तो पुरुष को स्त्री के रूप में बदल देना कौन–सी बड़ी बात? ऐसा–ऐसा परिवर्तन तो आजकल भी अनायास कितनी बार देखा गया है.

एक नया मत इधर 50–60 वर्ष से चला है. वह दुनिया भर की सारी बेवकूफियों, भूत–प्रेत, जादू–मंत्र सबको विज्ञान से सिद्ध करने के लिए तुला हुआ है. बेवकूफ हिन्दुस्तानी समझते हैं कि ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से गदहे नहीं निकलते और सभी जैक और जानसन साइन्स छोड़कर दूसरी बात ही नहीं करते. इन अधकचरे पंडितों ने अपने अधूरे ज्ञान के आधार पर भूत–प्रेत, देवी-देवता, साधु–पूजा सबको तीस बरस पहले निकले वैज्ञानिक ‘सिद्धान्तों’ से सिद्ध करना शुरू किया.

हालांकि उन सिद्धान्तों में अब 75 फीसदी गलत साबित हो गये हैं, लेकिन अभी अन्धे भक्तों के लिए उस पुराने विज्ञान के पुट से तैयार किये हुए ग्रंथ ब्रह्मवाक्य बन रहे हैं. हिन्दुस्तान का इतिहास बहुत लम्बा–चौड़ा है ही-काल और देश दोनों के ख्याल से. हमारी बेवकूफियों की लिस्ट भी उसी तरह बहुत लम्बी–चैड़ी है. अंधी राष्ट्रीयता और उसके पैगम्बरों ने हममें अपने भूत के प्रति अत्यन्त भक्ति पैदा कर दी है और फिर हमारी उन सभी मूर्खताओं के पोषण के लिए सड़ी–गली विज्ञान की थ्योरियां और दिवालिये श्वेतांग तैयार ही हैं. फिर क्यों न हम अपनी अक्ल बेच खाने के लिए तैयार हो जायें? जिनके यहां वायुयान ही नहीं, काठ के घोड़े भी आकाश में उड़ते हों, जिनके यहां बारूद और आग्नेयास्त्र ही नहीं, मुख से निकली हुई ज्वाला में करोड़ों शत्रु एक क्षण में जलकर राख हो जाते हों, जिनकी सूक्ष्म दार्शनिक विवेचनाओं और आत्मवंचनाओं को सुनकर आज भी दुनिया दंग हो जाये, वह भला किसी बात को झूठा लिख सकता है? तिपाई पर भूत बुलाना, मेस्मेरिज्म, हेप्नाटिज्म आदि के द्वारा पहले वैज्ञानिक ढंग से हमें अपनी विस्तृत होती जाती बेवकूफियों के पास ले जाया गया और अब तो विज्ञान पारितोषिक विजेता लोग सरे मैदान हरसूराम और हरिराम ब्रह्मा की विभूति बांट रहे हैं. आखिर जब नोबल पुरस्कार विजेता आलिवर आज भूतो–प्रेतों पर पुस्तकें लिख रहा है और कसम खा–खाकर लोगों में उनका प्रचार कर रहा है तो हमारे इन स्वदेशी भाइयों का कसूर ही क्या?

अभी तक शिक्षित लोग फलित ज्योतिष को झूठ समझते थे, लेकिन अब उसके भी काफी अधिक हिमायती हो चले हैं. वह इसे पक्का विज्ञान मानते हैं. ज्योतिषियों की भविष्यवाणी को छापने के लिए हमारे अखबार एक–दूसरे से होड़ लगा रहे हैं. 27 अगस्त की ‘सर्चलाइट’ एक ज्योतिषी महाराज की मौसम संबंधी भविष्यवाणी को एक प्रधान पृष्ठ पर स्थान देती है. फिर पूना में लाखों रुपये खर्च करके इसके लिए यंत्र और विशेषज्ञ रखने की क्या जरूरत है? स्वदेशी का जमाना है, कांग्रेस का मंत्रिमंडल भी हो गया है. ज्योतिषियों को चाहिए कि एक बड़ा–सा डेपुटेशन लेकर मुख्य–मंत्रियों से मिले. उनको विश्वास रखना चाहिए कि कांग्रेस के छह प्रान्तों में ऐसे मंत्री बहुत कम ही होंगे जिनका ज्योतिष में विश्वास न होगा. ज्योतिषी लोग देश–सेवा के ख्याल से अपना वेतन कम करने को तैयार होंगे ही, फिर क्या जरूरत है कि स्वदेशी साधन के रहते ऋतु–भविष्य–कथन के यंत्र, भूकम्प के सिस्मोग्राफ आदि का बखेड़ा और उस पर हजार–हजार, पन्द्रह–पन्द्रह सौ रुपये महीना लेने वाले विशेषज्ञों को रखा जाये?

ज्योतिषी लोग अपने काम को बड़ी सफलता के साथ कर सकते हैं. उन्हें न यंत्रों की आवश्यकता है और न बाहर से सूचनाओं के मंगाने की. एक स्थान पर बैठे–बैठे ही वह सभी बातें बतला दिया करेंगे. फिर तारीफ यह कि एक ही आदमी अतिवृष्टि और अनावृष्टि को भी बतला देगा और भूकम्प को भी. स्वराज्य की किस्त आने–जाने में अगर कुछ देर होगी तो उसे भी नेताओं की जन्म–पत्री देखकर बतला देगा. अभी इसी साल एक महाराज बादशाह की गद्दी देखने विलायत जाना चाहते थे. दुष्ट ग्रहों की उन्हें बड़ी फिक्र थी और उनसे भी अधिक फिक्र थी उनकी मां की. एक ज्योतिषी जी ने आकर मेष–मिथुन गिनकर महाराज को भी सन्तुष्टकर दिया कि कोई ग्रह खिलाफ नहीं है और मां को भी खम ठोंककर कह दिया कि महाराज को कोई अनिष्ट नहीं है, मैं जिम्मेवारी लेता हूं. सब लोग प्रसन्न हो गए. ज्योतिषी जी को 5,000 रु– मिले. भला इतना सस्ता जिन्दगी का बीमा कहीं हो सकता है? ऐसा होने पर एक और फायदा होगा. हरेक प्रांतीय सरकार में एक सरकारी ज्योतिषी और 10–5 सहायक ज्योतिषी होने पर मंत्रियों और पदाधिकारियों को भी ज्योतिषियों के पीछे गली–गली की खाक न छाननी पड़ेगी. अपनी बीवी और छोटे–मोटे बबुआ–बबुनी सबका वर्ष–फल साल का साल पहुंचता रहेगा. स्वदेशी व्यवसाय को जरूर आपको प्रोत्साहन देना चाहिए और इससे बढ़कर शुद्ध स्वदेशी व्यवसाय और क्या हो सकता है जिसके दिल, दिमाग, शरीर और परिश्रम सभी चीजें सोलहों आने स्वदेशी हैं.

हम लोगों के मिथ्या विश्वास क्या एक–दो हैं कि जिन्हें एक छोटे से लेख में लिखा जा सके? हमारे यहां तो इसके मिसिल के मिसिल और फाइल की फाइल तैयार हैं. और तारीफ यह है कि इन बेवकूफियों के भारी–भरकम बोझ को सिर पर लादे हुए हमारे नेता लोग समुन्दर पार कर जाना चाहते हैं. उन्हें पूरा विश्वास है कि बैकुण्ठ के भगवान, आकाश के नवग्रह और पृथ्वी के ज्योतिषी और ओझा–सयाने उनकी यात्रा में जरूर कुछ हाथ बटायेंगे.

हमारी जाति–पांति की व्यवस्था को ही ले लीजिए. वह हमारे ऋषि–मुनियों के उन बड़े आविष्कारों में है जिन पर हमें बड़ा अभिमान है. राष्ट्रीय भावनाओं की जागृति के साथ–साथ यद्यपि कुछ इने–गिने लोग जाति–पांति के खिलाफ बोलने लगे, लेकिन अब भी हमारे उच्च कोटि के नेताओं का अधिकांश भाग अपने ऋषियों की इस अद्भुत विशेषता की कद्र करने को तैयार हैं. नेताओं ने देख लिया कि यह जाति–पांति, आपस के फूट, भेदभाव के बढ़ाने का एक सबसे बड़ा कारण बन रहा है. कुछ साल पहले तो भीतर–भीतर जातीय संगठन भी इन्होंने कर रखा था और अब भी बहुतों को उसे छोड़ने में मोह लगता है. मैं अन्य नेताओं की बात नहीं कहता. मैं खास कांग्रेस के नेताओं की बात कहता हूं. उन बेचारों को इसी कोशिश में मरना पड़ रहा है कि कैसे राष्ट्रीयता और जाति–पांति दोनो साथ दाहिने–बायें कंधे पर वहन किये जा सकते हैं. उनमें से कुछ ने तो जरूर समझ लिया होगा कि यह असंभव है.

शुद्ध राष्ट्रीयता तब तक आ ही नहीं सकती जब तक आप जाति–पांति तोड़ने पर तैयार न हों. अगर आप जाति–पांति तोड़े हुए नहीं हैं, तो आपका वास्तविक संसार आपकी जाति के भीतर है. बाहर वालों के साथ तो सिर्फ कामचलाऊ समझौता है. जब आप किसी पद पर पहुंचेंगे तो ईमानदारी रहने पर आपकी राय को प्रभावित करने में सफलता सबसे अधिक आपके जाति–भाइयों की होगी. नौकरी– चाकरी दिलाने, सब–कमेटी में भेजने और सिफारिशी चिट्ठी लिखने में मजबूरन आपको अपनी जाति का ख्याल करना होगा.

आदमी के दिल में हजारों कोठरियां जरूर हैं, लेकिन वहां ऐसी फर्क–फर्क कोठरियां नहीं हैं जिनमें एक में जाति–पांति का भाव पड़ा रहे और दूसरे में उससे अछूती राष्ट्रीयता बनी रहे. जैसे किसानों के आंदोलन में आने वाले समझदार आदमियों को पहले ही से तैयार होकर आना चाहिए कि उन्हें साम्यवाद में पैर रखना है, वैसे ही राष्ट्रीयता के पथ पर पैर रखने वालों को भी समझना चाहिए कि उन्हें जाति–पांति की दीवारों को तोड़ गिराना होगा. यदि कोई आदमी राष्ट्रीय नेता रहना चाहता है और साथ ही अपने जाति–भाइयों की घनिष्ठता को कायम रखना चाहता है तो या तो वह ईमानदार नहीं रहेगा या उसे असफल होकर रहना पड़ेगा. अपनी जाति के साथ घनिष्ठता रखकर कैसे दूसरी जाति का विश्वासपात्र कोई हो सकता है? मंत्रियों को तो खास तौर से सावधान रहना पड़ेगा. क्योंकि जाति–भाइयों की घनिष्ठता उन्हें आसानी से बदनाम कर सकती है. मेरी समझ में प्रान्त के लिए, राष्ट्र के लिए, कांग्रेस के लिए और व्यक्तिगत तौर से नेताओं के लिए अच्छा यही है कि हरेक प्रधान नेता तुरन्त से तुरन्त अपने लड़के–लड़कियों, भतीजे–भतीजियों अथवा भांजा–भांजियों या नाती– नतिनियों में से कम से कम एक की शादी जाति–पांति तोड़कर दिखला दे, जैसा कि महात्मा गांधी जी तथा राजगोपालाचारी ने करके दिखाया.

आंख मूंदकर हमें समय की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए. हमें अपनी मानसिक दासता की बेड़ी की एक–एक कड़ी को बेदर्दी के साथ तोड़कर फेंकने के लिए तैयार होना चाहिए. बाहरी क्रान्ति से कहीं ज्यादा जरूरत मानसिक क्रान्ति की है. हमें दाहिने–बायें, आगे–पीछे दोनों हाथ नंगी तलवार नचाते हुए अपनी सभी रूढ़ियों को काटकर आगे बढ़ना चाहिए. क्रान्ति प्रचण्ड आग है, वह गांव के एक झोपड़े को जलाकर चली नहीं जायेगी. वह उसके कच्चे– पक्के सभी घरों को जलाकर खाक कर देगी और हमें नये सिरे से नये महल बनाने के लिए नींव डालनी पड़ेगी.

(राहुल की किताब ‘दिमागी गुलामी’ का एक अंश)

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