लुइस ग्लुक की कविताएँ

 लुइस ग्लुक की कविताएँ

Louise Elisabeth Glück is an American poet and essayist. She won the 2020 Nobel Prize in Literature, whose judges praised “her unmistakable poetic voice that with austere beauty makes individual existence universal (विकिपीडिया)

वर्ष 2020 का साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार अमेरिकी कवयित्री लुईस गलुक को मिला है। उनकी कविताएं प्रकृति के प्रति प्रेम, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के लिए जानी जाती है। प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद।

अंग्रेज़ी से अनुवाद किया है अरुण चन्द्र रॉय ने।

【अक्टूबर 】

क्या आ गई है फिर से सर्दी ,

क्या फिर से हो रही है ठंढ

क्या वह फिर से धंस गया है बर्फ में
क्या वह ठीक नहीं हुआ

क्या बसंत के बीज़ रोपे नहीं गए
क्या रात का अंत नहीं हुआ

क्या पिघलते बर्फ से बंद नहीं हुआ
छोटी नदियों को लबालब भरना !

क्या मेरा शरीर बचा नहीं

क्या मैं नहीं अब सुरक्षित?

आतंक और हाड़ कँपाती ठंड

क्या खत्म नहीं होंगे

क्या घर के पीछे का बगीचा

तैयार नहीं होगा, क्या रोपे नहीं जाएंगे इसमें पौधे !

मुझे स्मरण है कैसा महसूस कर रही थी धरती,

लाल और गहन रोष

ऐसे में क्या
समानान्तर नहीं लगाए गए थे बीज़

क्या लताएँ दक्षिणी दीवारों पर नहीं चढ़ी थी ।

अब मैं फिक्र नहीं करती

कि कैसा लगता है किसी को

जब मुझे चुप कराया गया था

कैसा लगा था मुझे, बेमानी है अब इसका वर्णन करना

जिसे बदला नहीं जा सकता हो, उसके बारे में जानना कैसा लगता है ?

क्या रात का अंत नहीं होगा,

जब गर्भ में रोपा गया बीज़,
क्या धरती नहीं थी सुरक्षित !

जब धरती के लिए बहुत जरूरी था
तब क्या हमने नहीं रोपे बीज !

जो बीज़ रोपे गए, क्या उनमें फल लगे?

【जंगली परिजात 】

जहाँ ख़त्म होते थे मेरे दुःख
उसके आगे था एक दरवाजा

तुम्हे बता दूँ कि जिसे तुम मृत्यु कहते हो
उसे मैं सदैव याद रखती हूँ ।

बाहर का अनन्य शोर , देवदार की झूलती शाखाएं
निढाल ढलता सूरज समा रहा है
बंजर धरती के आगोश में ।

ऐसे मे बचे रहना चुनौतीपूर्ण है
क्योंकि दफन हो रही हैं संवेदनाएं
धीरे धीरे धरती के अंधेरी कोख में ।

अचानक झुक रही है पृथ्वी एक ओर
भय से आत्मा सन्न है
असमर्थ है बोलने से
और खत्म हो रहा है सब कुछ
जैसे खतरे में है झाड़ियों में रहने वाली चिड़िया ।

आप जैसे लोग
जिन्हें याद नहीं इस दुनिया की यात्रा
उन्हें बताना चाहती हूँ कि
उठा सकती हूँ मैं अपनी आवाज़ फिर से
विस्मरण से जागने वालों की
आवाज़ हूँ मैं ।

मेरे भीतर से निकलती है
एक विशाल नदी
गहरे नीले समुद्र के वितान पर
छाया हुआ नीला आसमान
बसता है मेरे भीतर ।

【बच्चे जो डूब गए 】

जब उनके पक्ष में
नहीं है कोई निर्णय
फिर बेहतर है उनका डूब जाना ही।

चलिए, भीषण सर्दी में सबसे पहले
उन्हें बर्फ के भीतर डुबोते हैं
उनके पूरी तरह मर जाने के बाद
जब शरीर पानी से ऊपर उठकर तैरेगा
साथ में तैरेंगे उनके ऊनी स्कार्फ
बर्फ से भरे तालाब ले लेगा उन्हें
अपने असंख्य अँधेरे बाहों के गहन आगोश में।

किन्तु उन बच्चों को मौत आनी चाहिए
कुछ अलग तरह से
जीवन के शुरू होने के बाद जल्दी ही
हालांकि वे हमेशा से ही रहे हैं
रतौंधी के शिकार और कम वज़न वाले, कुपोषित।
अतः बाकी सब स्वप्न है कि
उनके मृत शरीर को नसीब हो
रौशनी, और श्वेत धवल कफ़न
जैसे सजा होता है मेजपोश।

सर्द तालाब में
धीरे धीरे डूबते हुए उन्हें सुनाई देती है
माता पिता की आद्र पुकार –
“क्या कर रहे हो वहां, किसका इन्तजार कर रहे हो !!
आ जाओ घर, घर आ जाओ,लौट आओ !!
और धीरे धीरे वे डूब जाते हैं गहरे नीले पानी में
हमेशा के लिए।

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