सरिता सैल की कविताएं

 सरिता सैल की कविताएं

नाम : सरिता सैल
जन्म : 10 जुलाई ,
शिक्षा : एम ए (हिंदी साहित्य)
मोबाइल नंबर-8431237476
ई मेल आईडी – saritasail12062@gmail.com
सम्प्रति : कारवार के एक प्रतिष्ठित कालेज में अध्यापन

मेरे लिए साहित्य मानव जीवन की विवशताओं को प्रकट करने का माध्यम है।
प्रकाशन : सृजन सारोकार , इरावत ,सरस्वती सुमन,मशाल, बहुमत, मृदगं , वीणा, संपर्क भाषा भारती,नया साहित्य निबंध और, दैनिक भास्कर ,आदि पत्र पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।
कोंकणी, मराठी एवं अंग्रेजी भाषा में कविताओं का अनुवाद ।
एक संग्रह “कावेरी एवं अन्य कवितायेँ” प्रकाशित
साझा संग्रह – कारवाँ में कविताएं शामिल।
कोंकणी भाषा से हिंदी में एक उपन्यास का अनुवाद प्रकाशनाधीन।


[ घोषणापत्र ]

घोषणा पत्रों की योजनाएं
बड़ी ईमानदार लगती हैं ,
जब तक वो वृक्षों के
देह पर लिखी होती हैं
वरना नेताओं की वाणी का
जामा पहनते ही
बेईमानी के बाजारों का
चौसर का खेलने लगती हैं ।

मेरा दस साल का बेटा
चुनावी घोषणापत्र
जोर-शोर से पढ़ रहा था
और मेरे बुजुर्ग पिता
व्यग्य और निराशा के
भाव लिए दीवार पर
टकटकी लगाए सुन रहे थे
और मैं उन दोनों के बीच
टूटी कड़ी सा खड़ा था

घोषणा पत्रों का ठूंठ वृक्ष
चुनावी रैलियों में
फल फूल जाता है
अंगूठे में चढ़े स्याही के साथ
दम तोड़ देता है ।


[ राजनीति ]

राजनीति में विरोधी
वह मदारी हैं
जो कांच के दरवाजे
के अंदर बैठकर
उस पार का दृश्य देखता है
और जब जनता
सूखे पत्तों की तरह
धूप में कड़क(तिलमिला) हो जाती हैं
तब उनकी हड्डियों को
चुल्हे में सरकाकर
उस पर बिना बर्तन रखे
तमाशा देखता है ।

[ ईश्वर ]

इन दिनों बीहड़ में बैठकर
पाषाण पर लिख रहा है
दस्तावेज सृष्टि के पुनर्निर्माण का
उसके पहले वो छूना चाहता है
जंगली जानवर के हृदय में स्थित प्रेम
जिसका वह भूखा है सदियों से
उसने खाली कर दी तमाम बैठकें
जहां पाप के कीचड़ में पुण्यबीज
बोने की इच्छाएँ जमा हो गई हैं
दिमागों को अंतिम आशीर्वाद देकर
वो वहाँ से उठ चला है
नदियाँ बीहड़ की तरफ मुड़ी हैं
सुना है ईश्वर के चरणों के स्पर्श से
बंधनमुक्त सांसें भर रही हैं
वनराई के सबसे ऊँचे तरू से
बेल खींचकर ईश्वर ने
पुरूषों के कदमों का माप लिया है
कछुए के पीठ की कठोरता
उसने अपने कलम में भरकर
गढ़ ली है
स्त्री की प्रतिमा।
तमस गुणों को नवजात के
मुट्ठी में बंद करके
ईश्वर ने बांध दिया है
स्वार्थी मनुज को
दंन्तुरी मुस्कान में

[दर्ज होंगे वो जख्म ]

इतिहास के पन्नों पर
दर्ज होंगे ये तमाम जख्म
हिम की घाटियों में
जिस दिन
ऋषियों के कमंडल में
पापियों ने
खून भर दिया था
उसी दिन मेरे देश का
एक अंग सुन्न हो गया था
दर्ज होंगे इतिहास के पन्नों पर
सफेद भू पर रक्तवर्णी कमल
जिस दिन
एक नारी की
बलात्कार के बाद
अपवित्र करार दी गई देह…
प्रतिशोध की अग्नि
जलाकर भस्म कर दिया था
उसी दिन धरती की
बाँझ होने की प्रक्रिया
आंरभ हुई थी

दर्ज होंगी इतिहास के पन्नों पर
वो गीली चीखें आंसुओं से भरी
जिस साल
बीज बहे थे जलधारा में
गद्दी पर बैठे राजा ने
आश्वासनों को बांधकर भेजा था कागज़ में
जो मौसम की मार खाते-खाते
किसानों तक पहुँचते – पहुँचते
बह गये लालच के तूफान में
जब मुआवज़े की रकम को
लिखते-लिखते टूट गई थी
सरकारी बाबू की कलम
दर्ज होंगे इतिहास के पन्नों पर
चमगादड़ बन लटके किसानों की लाशें
दर्ज हो जायेगी वो घटनाएँ
जहाँ सवाल गूंगा बना था
जवाब चाटुकारिता करते-करते
गधों के पैरों में लेट गया था

दर्ज होगी वो रकम भी
जो संसद की दीवारों की
मरम्मत के लिए लगी थी
कहा जाता है
उस समय सबसे ज्यादा
संसद की दीवारें टूटी थीं
दर्ज होंगी इतिहास के पन्नों पर
वो बेजुबान माली संसद के बगीचे का
जो वायदों के बेरंग होते रंगों को
संजो रहा है पौधे के गर्भ में

सरिता सैल
कर्नाटका

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