हमारे टोक्यो पैराओलंपिक हीरो

By :धर्मेंद्र गंगवार,बरेली

ध्वजवाहक-

नाम- मारियप्पन थान्गावेलु

खेल – ऊँची कूद

मारियप्पन भारत के पैरा खेल में हाई जम्प के खिलाड़ी है। रियो पैरालिम्पिक खेल में पुरुष वर्ग की हाई जम्प की प्रतियोगिता में T-42 केटेगरी में गोल्ड मैडल जीत, भारत का नाम बहुत ऊँचा किया। सन 2004 के बाद मारियप्पन पहले पैरालिम्पिक खिलाड़ी है, जिन्हें इस खेल में गोल्ड मैडल मिला है। मारियप्पन के पिता उसके बचपन में ही परिवार को छोड़ कर कही चले गए थे। मारियप्पन का पालन पोषण उनकी माँ ने अकेले किया। वे एक मजददूर के रूप में ईंट उठाने का काम करती थी। तबियत ख़राब होने के कारण उनकी माँ ने फिर कुछ समय बाद सब्जी बेचने का काम शुरू कर दिया था। 5 साल की उम्र में मारियप्पन का एक बस दुर्घटना के कारण एक पैर काटना पड़ा और इस दुर्घटना ने उसे जीवन भर के लिए अपाहिज बना दिया। स्कूल में मारियप्पन के शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षक ‘आर राजेन्द्रम’ ने उनकी हाई जम्प खेल की प्रतिभा को जाना, और उनको बढ़ावा दिया। उन्होंने मारियप्पन को हाई जम्प की अलग अलग प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। 14 साल की उम्र में अपनी पहली ही प्रतियोगिता में मारियप्पन ने बाकि सक्षम शरीर एथलीटों के सामने दूसरा स्थान प्राप्त किया. उसके बाद उन्होने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2021 में वे भारत की ओर से ध्वजवाहक होंगे। जज़्बे को सलाम।

नाम- अमित कुमार सरोहा

खेल – डिस्कस थ्रो

हॉकी के नेशनल खिलाड़ी थे । 22 साल की उम्र में कार एक्सीडेंट से व्हील चेयर पे आ गए । रीढ़ की हड्डी टूटी, हॉकी छूट गयी पर इनका हौसला तोड़ने वाला कोई नही था। पैरा खेल शुरू कर दिए । आज पैरा में डिस्कस और क्लब थ्रो के चैंपियन है । अब नैशनल नही ओलंपिक खेलने जाएंगे। इनके जज्बे को सलाम।

नाम- एकता भयान

खेल – डिस्कस थ्रो
2003 में एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुई, और व्हीलचेयर पे आ गयी। जहां बाकी सभी ऐसे मौके पर जिंदगी से हार जाते है, वहीं एकता का जुनून इस सब पर भारी पड़ा। खेल शुरू किया और आज डिस्कस और क्लब थ्रो की चैंपियन है। हरियाणा सरकार में अफसर है । अपना दूसरा ओलंपिक खेलने जा रही है । हरियाणा से पैराओलंपिक जाने वाले एथलेटिक्स के खिलाड़ियों में अकेली महिला खिलाड़ी है। देश और प्रदेश का नाम गौरवान्वित करती इस बेटी पर हमें गर्व है।

नाम- देवेंद्र झाझडिय़ा

खेल– जेवलिन थ्रो

चूरू जिले के गांव झाझडिय़ों की ढाणी में 1981 में जन्में देवेंद्र झाझडिय़ा का हाथ आठ साल की उम्र में पेड़ पर चढ़ते समय करंट आने से हुए हादसे के कारण काटना पड़ा। इसके बावजूद उनका हौसला कम नहीं हुआ। 2004 में एथेंस पैराओलिंपिक के लिए क्वालीफाई किया और स्वर्ण पदक जीता और 6 2.15 मीटर जेवलिन फेंककर नया वल्र्ड रिकॉर्ड कायम किया।
2004 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया।
मार्च 2012 में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा भारत के प्रतिष्ठित पद्मश्री अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। यह सम्मान प्राप्त करने वाले वह पहले पैराओलिंपियन हैं।
उन्होंने 2016 में रियो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता, जिसके बाद उन्हें सर्वोच्च खेल पुरस्कार खेल रत्न अवार्ड दिया गया।

नाम- अवनी लखेरा

खेल– शूटिंग

साल 2012 में मात्र 12 वर्ष की आयु में सड़क दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी चोटिल होने से पैरालिसिस का शिकार हो गईं। अवसाद से उबरने में उनके परिवार ने उनका साथ दिया। अभिनव बिंद्रा की बायोग्राफी से शूटिंग करने की प्रेरणा मिली। पैरालंपिक  में शूटिंग प्रतियोगिता में आज तक भारत की झोली में गोल्ड नहीं आया है. ऐसे में इस बार उम्मीद है की राजधानी जयपुर की गोल्डन गर्ल अवनी गोल्ड पर निशाना साधकर इस सूखे को खत्म करेगी.

नाम- विवेक चिकारा

खेल– तीरंदाजी

विवेक चिकारा ने एमबीए किया था और वह प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे थे. वर्ष 2017 एक सड़क हादसे में उन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा। हादसे के कारण उनकी नौकरी भी छूट गई। इसके बाद उनके पिता उन्हें मेरठ के गुरुकुल लेकर आए। इसके बाद से उन्होंने कोच सत्यदेव का साथ नहीं छोड़ा। 2004 के ओलंपियन और ध्यानचंद अवार्डी कोच सत्यदेव बताते हैं जहां भी वह गए विवेक उनके साथ रहे। 2019 में बैंकॉक में एशियन पैरा आर्चरी चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया और ओलंपिक कोटा हासिल किया।

नाम- वरुण सिंह भाटी

खेल– ऊँची कूद

बचपन में ही पोलिया होने की वजह से उन्हें चलने फिरने में समस्या आती थी। वरुण चाहते थी की उनके जीवन में पोलियो उनकी कमजारी न बने इसके लिए उन्होंने स्कूल में स्पोट्स को चुना। खेल को ही जीवन मानने वाले वरुण की स्कूल के बाद कॉलेज में इसके प्रति लगन और बढ़ गई। वो अपनी ट्रेनिंग पर ज्याद फोकस करने लगे। पोलिया होने के बावजूद हार न मानकर लगातार वरुण की यह मेहनत उन्हें एक बड़े मुकाम तक लेकर जाने वाली थी। वरुण भाटी को वर्ष 2017 में टाइम्स ऑफ इंडिया स्पोर्ट्स ने पैरा एथलीट ऑफ ईयर के रुप में चुना। वर्ष 2018 में भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोंविद ने उन्हें अर्जुन अवार्ड देकर सम्मानित किया।

नाम- मुकेश और पूनम

खेल– टेबल टेनिस

मुकेश पहले सामान्य वर्ग में टेबल टेनिस प्लेयर थे। एक नेशनल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे, इतने में एक बच्चा अचानक रेलवे ट्रैक पर आ गया। मुकेश ने ट्रैक पर पहुंच कर बच्चे की जान तो बचा ली, लेकिन ट्रेन की चपेट में आने से अपना पांव खराब कर बैठे। वहीं, उनकी पत्नी को बचपन में पोलियो था। दोनों ने हिम्मत नहीं हारी और टेबल टेनिस में पूरी ताकत लगा दी। आज नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर मेडल बटोर रहे हैं।

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1 Comment

  • बहुत-बहुत शुभकामनाएँ और बधाई

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