नीलम सक्सेना चंद्रा की कविताएँ

नीलम सक्सेना चंद्रा लेखन में जाना माना नाम है | कविताएँ एवं कहानियाँ लिखना आपका शौक है| आपके चार उपन्यास, एक उपन्यासिका, छह कहानी संग्रह, बत्तीस काव्य संग्रह व तेरह बच्चों की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं| आपको विभिन्न पुरस्कारों से सुशोभित किया गया है, जैसे अमेरिकन एम्बेसी द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता में गुलज़ार जी द्वारा पुरस्कार, रबिन्द्रनाथ टैगोर अंतर्राष्ट्रीय काव्य पुरस्कार २०१४, रेल मंत्रालय द्वारा प्रेमचंद पुरस्कार, चिल्ड्रेन ट्रस्ट द्वारा पुरस्कार, पोएट्री सोसाइटी ऑफ़ इंडिया द्वारा काव्य प्रतियोगिता २०१७ में द्वितीय पुरस्कार, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा सोहनलाल द्विवेदी पुरस्कार, ह्यूमैनिटी अन्तराष्ट्रीय वीमेन एचीवर अवार्ड २०१८, भारत निर्माण लिटरेरी अवार्ड पुरस्कार इत्यादि| इनके द्वारा लिखे गीत ‘मेरे साजन सुन सुन’ को रेडियो सिटी द्वारा फ़्रीडम पुरस्कार इत्यादि| आपके लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में तीन रिकार्ड्स हैं| नीलम को फ़ोर्ब्समैगज़ीन द्वारा २०१४ के देश के अठहत्तर प्रख्यात लेखकों में नामित किया गया है|

ईमेल: neelamsaxena27@hotmail.com

【ज़िंदगी की बैलगाड़ी 】

बैलगाड़ी में बहुत कम ही बैठी हूँ –
शायद सिर्फ दो बार,
पर सोचती हूँ
कि शायद ज़िंदगी भी बैलगाड़ी ही है,
चलती रहती है धीरे-धीरे
तरह-तरह के मंज़र दिखाती हुई!

सुबह आती है उम्मीद के केसरिया रंगों के साथ,
सारा जहान जगमगाने लगता है,
और ज़िंदगी की बैलगाड़ी भी
दौड़ने लगती है
जोश से भरी हुई…

दोपहर को कहीं रुक जाने को मन करता है.
किसी मज़बूत दरख़्त की छाँव में,
जुस्तजू की सुराही से ठंडा पानी पीते हुए-
पर बैलगाड़ी कहाँ रूकती है भला?
वो तो चलती ही जाती है
दरख्तों और झूलती टहनियों को
पीछे छोड़ते हुए!

शाम को डूबते हुए आफताब के साथ
अक्सर ख्वाब भी डूबने लगते हैं,
और रात आते ही दिल चाहता है
सो जाएँ किसी आरामघर में!

पर जो भी सोया, वो ही खोया-
क्योंकि ज़िंदगी की बैलगाड़ी को तो
मुसलसल चलना ही होता है!

जो नहीं हारते रात के इन अंधेरों से
और चलते ही रहते हैं लगातार
वही परिंदों की तरह छू पाते हैं आसमान;
आखिर
रात के बाद ही तो
फिर से सुबह उगती है
जिगर के स्याह कोनों में!

【डर 】

जब कोई डर
साँसों के साथ जिस्म में
भरने लगता है
तो वो लहू के ज़रिये
अंग-अंग में समाता ही जाता है
और बनाता जाता है हमें कायर!

हाथ-पाँव शिथिल होते जाते हैं,
दिमाग निष्क्रिय सा होने लगता है,
और हर किस्सा लगने लगता है
गंभीर और उदासीन…

अगर हम डरते हैं,
तो डर और भी ज़ोरों से पकड़ लेता है
हमारी हर सोच को…

सुनो,
अब एक ठंडी सी आह भरो,
और डर की जगह
हर साँस से साथ भरते जाओ
जिस्म को उम्मीद से, रौशनी से, जुस्तजू से-
देखना इनके आगे
डर किस तरह भागने लगेगा
और फिर एक दिन छोड़ देगा साथ
हमेशा-हमेशा के लिए!

【जोश कहाँ से पाती हो】

जोश कहाँ से पाती हो ?
उसने पूछा,
“कहाँ से पाती हो तुम इतना जोश?
दिन भर कुछ न कुछ करती ही रहती हो,
थकती नहीं क्या?”

मैं हौले से मुस्कुरा दी!
अब उसे कहाँ समझा पाती
कि मुझे जोश मिलता है
इस कभी न थकने वाली क़ुदरत से?

सुबह-सुबह
जब उठकर हरी घास पर नंगे पाँव चलती हूँ,
मेरे सारे जिस्म में एक तरंग की
लहर सी उठती है;
जब शोख बेल को हँसते हुए
हवाओं के साथ रक्स करते देखती हूँ,
मैं भी लहराने लगती हूँ,
जब दचकती सी गिलहरी की आँखों में झांकती हूँ
और उसके डर के बावजूद, उसका आगे बढ़ना देखती हूँ,
मुझे भी चलते रहने की हिम्मत आ जाती है;
जब ऊंचे से जामुन के दरख़्त को
और ऊंचा बढ़ते देखती हूँ,
मेरा भी हौसला बढ़ने लगता है;
जब कलियों और गुलों की रंगत देखती हूँ,
मेरे भी ज़हन में हज़ारों रंग भर उठते हैं,
जब रंगीन तितलियों को उड़ते देखती हूँ,
मेरे भी अरमानों को पर लग जाते हैं;
जब खुशनुमा परिंदों को आसमान छूते देखती हूँ,
मेरा मन भी बुलंदियों को छूने को उत्साहित हो उठता है;
और जब आफताब की रौशनी से सारे जग को
खिला-खिला देखती हूँ,
मेरी भी उम्मीद खिल उठती है!

वो कवि भी नहीं है,
और न ही उसे क़ुदरत से इतनी मुहब्बत है…
कैसे समझेगा वो मेरी यह बातें?
बस, यही सोच, मैं मंद-मंद मुस्कुरा दी;
पर जब उसने मेरा हाथ पकड़, मुझसे कहा,
“तुम पाती रहो क़ुदरत से जोश,
पर मुझे जोश तो तुमको देखकर मिलता है!”
मैं खिला-खिलाकर हँस दी ।

कवि

क्या लिखता है एक कवि?

क्या वो किसी के दिल का दर्द
अपने अलफ़ाज़ में उतारकर
उसके साथ कई शामें गुजारता है,
अलफ़ाज़ को मोती सा चमकाता है,
और जब वो नहीं बदल पाता अँधेरा
तो लिख देता है एक कविता?

क्या वो किसी की ख़ामोशी
अपनी जुबाँ पर कई रातों तक रख
उसकी तल्खियत निकालने की
नाकाम कोशिश करता रहता है
और जब वो नहीं निकाल पाता
ज़हन से उसका ग़म,
तो लिख देता है एक कविता?

क्या वो कोई खिलती हुई उम्मीद
आफताब के सीने से निकली किरण से
उधार मांग लाता है और बिछाता जाता है
उसे अपने महबूब की राहों पर,
पर जब महबूब पलटकर भी नहीं देखता
तो लिख देता है एक कविता?

या वो डुबो देता है अपने जिगर को
ख़ुशी की रेशे भरी चाशनी में
और अपने जिगर से निकलती हुई
रौशनी के तेज़ से बहते एहसासों को बाँध
सजाता जाता है कविताओं का गुलदस्ता?

अलग-अलग वक़्त पर,
अलग-अलग कवि,
अलग-अलग एहसासों के शहरों से
अपनी मंजिल तय कर रहे होते हैं,
और लिखते रहते हैं कविता पर कविता-
फिलहाल मैं और मेरी रूह तो
रौशनी से लबरेज़ हैं,
और मैं फैलाते जा रही हूँ
सिर्फ और सिर्फ ख़ुशी!

【ज़िन्दगी का झरना 】

ज़िन्दगी का झरना
जब नदी बन बह निकलता है,
तो वो पीछे मुड़कर नहीं देखता…
वो तो सिर्फ
आगे को देखता है,
आगे की सोचता है
और आगे को ही बढ़ता है…

तब उसे याद नहीं आते
वो एहसास जो उसे पहाड़ से बिछुड़ने का
ग़म दिया करते थे,
तब वो नहीं खो जाता दर्द की उन दास्तानों में
जो उसे रुला दिया करते थे,
और वो तनहाई और ख़ामोशी
जिससे वो कभी बहुत डरा करता था…
उसे…उसे तो वो गले से लगा लेता है…

जो हाथ में ही नहीं होता
हम अक्सर उससे चिपके रहते हैं
और वो ख्वाहिश किसी जोंक की तरह
हमारा खून चूसती रहती है…

कुछ तमन्नाओं को छोड़ना ही पड़ता है-
और वो छोड़ देना अच्छा होता है,
हर दास्ताँ के लिए-
चाहें वो झरना हो या हमारी ज़िंदगी…

मुड़-मुड़ कर कुछ हासिल नहीं होता,
हर किस्से से कुछ सीखो,
और फिर बढ़ते जाओ,
किसी अलबेली नदी की तरह
इतराते हुए!

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