प्रमुख कृतियां- अब तक तीन पुस्तकें स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें से ‘मादा ही नहीं मनुष्य भी’ स्त्री विमर्श पर आधारित है और दूसरी पुस्तक ‘समय से परे सरोकार’ समसामयिक विषयों पर केंद्रित है। तीसरी पुस्तक ‘ताल ठोक के’ कविता संग्रह है। इनके अतिरिक्त दो कविता संग्रहों में रचना प्रकाशित होने के […]Read More
ब्रिजेश कुमार (शोधार्थी) , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) […]Read More
शाक्य बीरू ‘ एन्टी वायरस ‘ खालीपन से भरा था यह जीवनखिल उठा था मनउनके आने कीआहट मात्र से हीख्वाहिशें.. धड़कनों के मचान परकरने लगी थी खिलदंड़उमंगें मचलने लगी थींज्वार भाटे की तरहतरंगें उठने लगी थींऔरख्वाबों के चिलमन से झांकतीउनके मोहब्बत की खुश्बूजगाने लगी थीसुप्त पड़े अरमानों को मेरेपर..उनके ठहरे जज्बातया किसी कसमें-वादोंकी जंजीरों नेलगा […]Read More
एक साधारण परिवार में जन्मे और ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े इं दिनेश कुमार सिंह ने लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. किया, और देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज आई. ई. टी. लखनऊ से बी.टेक. है।अन्ना आंदोलन से प्रभावित होकर उत्तर प्रदेश सरकार की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर भ्रष्ट्राचार के खिलाफ जंग में कूद पड़े,व्यवस्था परिवर्तन और समाजसेवा […]Read More
युवा कवि अभिषेक पटेल ‘अभी ‘ इलाहाबाद बैंक में अधिकारी हैं ।विभिन विषयों पर अनवरत लिखते रहते हैं। हम सभी मकानों से अब, अपने प्यारे घरों में आ गए । कुछ दिन को ही सही, शजर पर लौट परिंदे आ गए ।। जिनके लिये कमाने को दर दर फिरते रहते थे । वक़्त नही मिलता […]Read More
रीना गोयल ( हरियाणा) रिमझिम सी पड़ी फुहारों का ,श्रृंगार धरा कर इतराई । आया मौसम बरसातों का , घिर आयी आँगन बदराई ।। खिला-खिला सा नील गगन है ,छायी धरती पर हरियाली तपती आकुल भू को सिंचित , करती बूँदनियां मतवाली मन का वृंदावन झूम रहा , देह बाँसुरी धुन लहराई ।।1।। आया मौसम […]Read More
ये किसी शाह का फरमान नजर आता है गाँव का गाँव ही वीरान नजर आता है कौन जीता है यहाँ काट रहे जीवन सब किस में अब जीने का अरमान नजर आता है हौसला हो तो कोई राह नहीं मुश्किल है पंथ मुश्किल भी हो आसान नजर आता है तेरे अंदर है भरा डर जो […]Read More
राहुल रेड करो कुछ भी वो पौधों का भला होने नहीं देते ये बरगद हैं जो पौधों को बड़ा होने नहीं देते उन्हे है खौफ़ कद उनका मेरे आगे न घट जाए वो अपने सामने मुझको खड़ा होने नहीं देते करूँ कैसे यकीं उस न्याय के मंदिर पे तुम बोलो जहाँ मुंसिफ ही मुजरिम को […]Read More
कानपुर के युवा कवि और कथाकार विक्रम प्रताप सिंह का लेख ।ज़िन्दगी सियासत के शामियाने में और टेम्पो हाई है इनकी बहुचर्चित किताबें हैं । ये लेखक के अपने विचार हैं । 2009 का दौर था, मेरा आशियाना हैदराबाद में था। उसी दौरान लोकसभा चुनाव हुये। आँध्रप्रदेश में काँग्रेस का बोलबाला रहा, जहाँ तक मुझे […]Read More