शार्दूल कुशवंशी की भोजपुरी कविताएँ

【बुधुआ】 जिनगी भर बुधुआ पाथते रह गइल खपड़ा-नरिया, तबो न छवाइल ओकर घर हो, फूस के फूसे रह गइल, चमकल ना दीवाल,अउरी फरस हो, जाति के कुम्हार रहे उ,घड़ा भी उ पारत रहे, गांव के पंडित जी के घरे,फिरिये में पहुंचावत रहे, ओकर पसंद ना रहे ,ई काम आपन मेहरी से बतियावत रहे, पर ,डर […]Read More

मसूर के दाल के पकौड़े की सब्ज़ी

डॉ आर के सिंह वन्यजीव विशेषज्ञ और साहित्यकार हैं । 【एक】“गफ्फार मियां कहाँ?”“लाहौल बिला कूवत, कितनी बार मना किया है रास्ते में न टोका करो।”“अरे चचा खामख्वाह लाल पीले हो रहे हो। बस इत्ता ही तो पूछा है कि कहां जारे हो।”“मसूर लेने जा रहे हैं, बताओ।””लगता है चच्ची कुछ लज़ीज़ बना रही हैं।”“अब तुमसे […]Read More

मनीष मनचंदा की कविताएँ

राजकीय विद्यालय ,पलवल,हरियाणा में रसायन शास्त्र के प्रवक्ता मनीष मनचंदा को कविता के तत्वों और योगिकों की भी खासी पहचान है। 【पिता】 अब जब भी तुम्हारी तस्वीर को देखता हूं..याद कर बैठता हूं वो तुम्हारी सीख..की मेरी कीमत मेरे जाने के बाद जानोगे तुम.. सच था जिंदगी के मायने…तुम्हारे जाने के बाद ही जाने.. तुम्हारे […]Read More

रचना चौधरी का लेख– वर्तमान जीवनपद्धति और बच्चे

एक दौर था जब जानकारी प्राप्त करने और मनोरंजन के सीमित संसाधन हुआ करते थे हम बच्चों के पास। एक टी वी चैनल, उसपर भी अत्यंत सीमित से कार्यक्रम, सीमित विज्ञापन। इंटरनेट किस चिड़िया का नाम, कुछ अता पता ही नहीं था। लेकिन इन सीमित संसाधनों के बीच वैचारिक स्तर पर, आत्मिक स्तर पर विस्तार […]Read More

दम तोड़ता सरकारी सिस्टम

आशीष उमराव महामारी की आड़ में अति आवश्यक चीजों के दाम बढ़ना दुःखद है, देश में लाकडाउन शुरू होने से पहले ही बाजार में 60 रूपए के सेनेटाईजर की कीमत 300 हो गई और 20 रूपए वाला साधारण मास्क 50 रूपए में बेचा जाने लगा। आज भी इसकी कीमत लगभग यही है। जबकि सरकार द्वारा […]Read More

उजाले की तलाश

मुकेश कुमार उभरते हुए कवि और कथाकार हैं ।भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी हैं । रामधन अपनी पत्नी बढकी के साथ पैदल चले जा रहा था. पैर की चप्पलें टूट गयीं थीं. कपड़े की रस्सी से बद्धी का काम चला रहा था. धूप से सड़क तप रही थी.पैर झुलसे जा रहे थे.दो बच्चे भी थे. […]Read More

भ्रमशील समूहों की शल्य क्रिया

कर्नल सुबोध कुमार (रि.) मैंने बचपन से ही भ्रमशीलों की क्रिया-कलापों की शल्य-क्रिया करनी शुरू कर दी थी ।मैं पांचवीं क्लास में था । रबी फसल कट कर अनाज गांव- घर में आ चुका था ।और फिर शुरू हुई भ्रमशीलों के टीड्डों की झुंड का गांव पर आक्रमण ।एक जादूगर आया और टोले में डमरू […]Read More

“”प्यासा””

जन्मों से प्यासा प्यार को देखता है उन निगाहों को जो दे सकें सहारा दिलासा मिटा सकें जो उसकी वर्षों की प्यास को यही इस लिए बैठा है वो यही कहीं आयेगा कोई न कोई उसकी इस हसरत को पूरी करने को।।Read More

समाज का लोकतांत्रिक चरित्र,ऑस्ट्रेलिया और हम

रजनीश संतोष चर्चित ग़ज़लकार, कवि और लेखक हैं ।समसामयिक मुद्दों पर अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हैं ।.लोकतंत्र नुमाइश और लफ़्फ़ाज़ी की चीज़ न होकर समाज के चरित्र का हिस्सा हो तब ही ऐसे नज़ारे सम्भव हैं. लोकतंत्र न तो कोई व्यवस्था है और न नियम क़ानून. प्रधानमंत्री से लेकर व्यापारी, अधिकारी, किसान, मज़दूर […]Read More

साइकिल और पर्यावरण

इंजीनियर दिनेश कुमार सिंह बता रहे हैं साइकिल का महत्च !! 60 और 70 के दशक में या कह लो 80 के दशक तक देश मे जनता की आम सवारी साइकिल ही हुआ करती थी तब तक फटफटी आम आदमी की सवारी नही बन पायी थी मोटर कार तो सपना हुआ करती थी।सार्वजनिक यातायात तो […]Read More