थोड़े अपने थोड़े पराए

तेज प्रताप नारायण अक्सर हम एक जाति को दुश्मन दूसरी जाति का मानते हैं ।यहाँ जाति मतलब caste ही नहीं बल्कि धर्म,मज़हब,स्त्री ,पुरुष ,पशु ,पक्षी ,देश जैसे प्राकृतिक और कृत्रिम विभाजनों को अलग अलग जाति का मान कर अपनी बात रख रहा हूँ ।जैसे स्त्री ,पुरूष को अपना दुश्मन मानती है ,एक कास्ट दूसरी कास्ट […]Read More

उस ओर

मनोज बाथरे ,चीचली, जिला नरसिंहपुर ,मध्य प्रदेश वर्तमान परिवेश में कुछ चीजें ,हम समझ नहीं पा रहे हैं कि किस दिशा में जा रहे हैैं और किन कारणों से जा रहे हैं वहांाँ जहाँ हमें नहीं जाना पर क्या करें ? कुछ कारणों से ही सही कुछ हालातों से ही समझौता कर हम उस ओर […]Read More

मैं गांव वाला हूँ

दीपक भारद्वाज ‘वांगडु’ जुबां पे मिठास और मासूम ख्यालात थोड़ा सा अल्हड़ मगर प्यार भरा जज्बात सबसे प्यारा नाता और लगाव वाला हूँ हां मित्र, मैं गांव वाला हूँ रिश्तों में गजब का एहसास होता है छोटे से छोटा परब जहां खास होता है बचकानी मस्ती लिए सब होते हैं मगन पर एक नेक दिल […]Read More

रचना चौधरी का लेख: स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता के मायने

समाज में स्त्रियों की सामाजिक स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता की स्थिति लाने में उनकी आर्थिक स्वतंत्रता का बहुत बड़ा योगदान है | फाइनेंसियल फ्रीडम अपने आप में एक वृहद् विषय है | और उसका सम्बन्ध व्यक्ति की फाइनेंसियल कंडीशन की सुदृढ़ता की एक स्थिति से है , किन्तु यहाँ पर स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता का तात्पर्य […]Read More

तो हल्ला होता

पटरियों पर पड़े वो मज़दूर थे, किसी पार्टी का चोला ओढे होते तो हल्ला होता।। वो बिलखते परिवार मजबूर थे, किसी नेता के होते तो हल्ला होता।। उस नन्ही बच्ची के पांव में छाले थे, पैरों में विदेशी जूते होते तो हल्ला होता।। वो बिलखता मुन्ना मां के कांधों पे था, किसी आया के गोद […]Read More

मैं अब भी बिल्कुल ठीक हूँ माँ

दीपक भारद्वाज ‘वांगडु’ कहने को सब बढ़िया है लेकिन अपनी भी कुछ मज़बूरी है जीवन के इस पड़ाव में अब निभानी जिम्मेदारी जरूरी है इसीलिए तो चला आया मैं छोड़ के अपना वो संसार मिलता जहां सदा निश्छल प्यार पर दूर भले हूँ तुझसे लेकिन दिल के तेरे करीब हूँ माँ तुम मेरी चिंता मत […]Read More

एक थे डाकू सुल्ताना

डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह लेखक ,प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक, आलोचक और बौद्ध दार्शनिक हैं । गाँधी ने मूलतः अंग्रेज शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी …. फुले ने मूलतः भारतीय शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी….. लेकिन सुल्ताना ने एक साथ अंग्रेज और भारतीय दोनों शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। सुल्ताना डाकू ….असली नाम सुल्तान …गाँव का नाम हरथला […]Read More

सीमा अहिरवार ‘ज्योति’ की कविताएँ-4

[एक  बच्चा] एक  बच्चा  बेकार  सा  बच्चा बेबस  लाचार  माँ  बाप  का  बच्चा भाई बहनों  में  सबसे  बड़ा होशियार  सा  बच्चा मिट्टी  गारे  पत्थरों  को समेटता  बच्चा गोबर  के  उपलों चूल्हे  के धुएं  में  उलझा  हुआ  बच्चा अँधेरे  से  लङता  हुआ उजाले  को  खोजता  हुआ  बच्चा एक  बच्चा  बेकार   सा  बच्चा हर  काम  में  […]Read More

शून्य

आकांक्षा दत्ता बस एक शून्य हूँ मैं , ना आदि है ना अंत। ना शरीर है ना आत्मा , बस एक शून्य हूँ मैं । रात के घने अंधेरे की तरह , जिसने सच भी खो सा जाता है । बस एक शून्य हूँ मैं । साथ में चलते साये की तरह , जो ख़ामोश रहकर […]Read More

गाँव के किस्से-जब हुआ कोबरा से सामना

तेज प्रताप नारायण आम के मौसम में बच्चों को अलल सुबह ही जगा दिया जाता था । नींद न खुलती तो ऊपर पानी के छींटे डाल कर जगाया जाता ।हम लोग किसी तरह से आँख मींजते हुए उठते थे ।आँगन में सुबह की सुहानी नींद का मज़ा ही अलग होता था । आधी खुली और […]Read More