औरत

पटना के शिक्षक विमल कुमार भारती का समकालीन कविता में प्रमुख स्थान है ।हाइकू विधा के भी आप सशस्क्त रचनाकार हैं। मैं सदियों से होमक्वारेंटाइन में हूँ तुम्हें कुछ ही दिनों मेंघुटन होने लगी घर में मेरे निकट रहते होपर जब मेरे साथबाहर निकलते हो, तोकुछ कदम आगेअथवा पीछे चलते होताकि मुझसे तेरी सामाजिक_दूरी बनी […]Read More

ताकि इंसानियत बची रहे

कोरोना काल में सत्ता और समाज के विभिन्न परतों को खोलता हुआ ‘ ‘रजनीश संतोष ‘ का लेख ।.एक युवक चुपचाप पत्तियाँ खा रहा था, इधर-उधर देखता और धीरे से नीचे पड़ी पत्तियाँ उठाता और मुँह में ठूँस लेता. मैं उस स्थिति की कल्पना कर के भी घबरा जाता हूँ जब मुझे पत्तियाँ खाने के […]Read More

मशाल 2021

मशाल पत्रिका, अंक-3 व परिवर्तन साहित्य सम्मान-2021 के लिए रचनाएं आमंत्रित दोस्तो, ऐसे समय में जबकि कविताएं लिखना बेहद आसान नज़र आता हो, लेकिन समझना उतना ही मुश्किल, परिवर्तन साहित्यिक मंच और साहित्य संचय प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में एक प्रयास हुआ ऐसे रचनाकारों को एक सशक्त और सार्थक मंच प्रदान करने का, जहां मौजूद […]Read More

बेड़ियां

तेज प्रताप नारायण [लेखक के चार कविता संग्रह,दो कहानी संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं । एक साझा उपन्यास का सह लेखन और संपादन भी कर चुके हैं ।पर्दे के पीछे की बेख़ौफ़ आवाज़ें, शब्दों की अदालत में,मशाल,मशाल 2019,मशाल 2020 कविता संग्रहों का संपादन भी कर चुके हैं । कविता संग्रह ‘ अपने […]Read More

सीमा अहिरवार ‘ज्योति’ की कविताएँ – 3

 [ व्यथा ] नौजवाँ  खून  जब  चला  जाए  दुनिया  से मजबूत  कांटे  सा  टूटता  है  तन  में वो  गलता  नहीं निकलता  नहीं धसता  जाता  है अंग अंग  में चीरता  जाता  है दिल  के हर एक  कोने  को आंख  से पानी  नहीं खून  टपकता  हो जैसे नौजवाँ खून  जब चला जाए  दुनिया से मजबूत  कांटे सा  […]Read More

शाहाना परवीन की कविताएँ

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ी लिखीं शाहाना परवीन को कविता,लघुकथा, लेख लिखने में रुचि के साथ एंकरिंग का भी शौक़ है ।वर्तमान में पटियाला में रहती हैं । contact:shahana2020parveen@gmail.com 【तेज़ाब 】 उफ्फ ! नाम लेते ही ऐसा लगाजैसे अंदर तक किसी ने जला दिया होरूह तक काँप जाती हैजब सुनती हूँ इस शब्द कोपर आज […]Read More

भारतीय समाज लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अनुपयुक्त है~

【रजनीश संतोष आज के ज़माने के बेहतरीन  ग़ज़लगो,उम्दा कवि और लेखक हैं ।समसामयिक मुद्दों पर ये ख़ास नज़र रखते हैं और मुद्दों के पीछे के मुद्दों को बड़ी क़ाबलियत से सामने लाते हैं ।】 विलबर्स कहते हैं कि, “जिन समाजों ने विज्ञान और लोकतन्त्र के जन्म की प्रसव पीड़ा खुद नहीं झेली, उन्हें उधार में […]Read More

इक घर बेघर सा

दीपक भारद्वाज “वांगडु” इक घर, बेघर सा अब यादों में बस याद लिए अनगिनत फरियाद लिए मुस्काते भ्रमित इन होंठों में दबे हुए आवाज लिए नीर भरे इन नैनों में झूठे से एहसास लिए ये दौर जो अब चल रहा है बिन बोले बहुत कुछ कह रहा है उजले कल की चाह लिए सुनहरे पल […]Read More

मेरी डायरी के कुछ पन्ने….

डॉ गौरव कुमार [ पिता] बारिश की मार में, छाते‌‌ कि तरह, ठिठुरती ठंढ में , गर्म कंबल की तरह, गर्मियों की लु में, शीतल जल की तरह, कड़कती धूप में, घनी छांँव की तरह, मकान की दिवारों में, मजबूत छत की तरह, और हर कठिन राह में, जो बनकर कंधा , सबका सहारा होता […]Read More

विवाह गीत

प्रसिद्ध कवयित्री डॉ अनुराधा ओस के आने वाले संकलन ‘ मड़वा के छाँव में’ से इन विवाह गीतों को लिया गया है ,साथ में इनका अर्थ भी दिया गया है ।इन लोकगीतों की भाषा अपनी आंचलिकता में अवधी और भोजपुरी दोनों को समाहित किए हुए है। 1] द सोवउँ -सोवउँ रे दूल्हे तोरी अँखिया, ललित […]Read More