कोलकता की युवा कवयित्री रचना चौधरी सिर्फ कविताएँ ही नहीं बल्कि कहानी लेखन में भी रुचि रखती हैं।आठ लेखकों द्वारा लिखित साझा उपन्यास ‘ज़िन्दगी है हैंडल हो जाएगी ‘ का सहलेखन और संपादन भी कर चुकी हैं । 【मज़दूर के गर्भ की पीड़ा】 छः माह हुए थे गर्भ में माँ मैं बहुत हुई उत्साहित थी […]Read More
‘हाइकू ‘कविता की जापानी विधा है ।नीलम सिंह ,कविता की समकालीन रचनाकारों में इस विधा की सिद्धहस्त रचनाकार हैं । 【पिता】 पिता की सीख तजुर्बा ज़िन्दगी का नहीं है भीख.. पिता सरीखा न इस जहान में दूजा अनोखा.. पिता ने देखा अपना प्रतिबिंब स्व संतान में.. पिता के कंधे जिम्मेदारियों तले झुक जाते हैं… पिता […]Read More
【मजदूरों के दिन】 कई दिनों फांके किए, कोई न आया सामने. मिन्नतें की, गिडगिडाए कोई न आया सामने. एक दिन रोटी मिली, थे कौए हजारों सामने. कई दिनों चलते रहे, सुनसान सूनी राह पर. पथ पर थे काँटे बहुत, चुभते रहे, टूटे बहुत फिर मिला सीधा सा रास्ता कितने खड़े थे सामने. कई दोनों रोते […]Read More
क्या करें! हमारे यहाँ का नियम ही यही है मजदूर ही मजबूर हैं… क्या किसी अमीर वर्ग को इस लॉक डाउन की वजह से खाने/रहने की समस्या हुई है? बेचारे! नौकरी छूटी रहने का ठिकाना गया जब पेट की भूख का सवाल आया तो घर का रुख करना पड़ा डर/दहशत में जो कोई साधन मिला […]Read More
【एक】 तू पत्थर तो नहीं है फिर पिघलता क्यों नहीं मुझसे यहीं दिल्ली में रहता है तो मिलता क्यों नहीं मुझसे फकीरों की तरह अपनी ही धुन में मस्त रहता है अज़ब इन्सान है आखिर ये जलता क्यों नहीं मुझसे ज़माने की मसीहाई थमा के मत जा मुझको सुन मैं हैराँ हूँ कि मैं ही […]Read More
आकांक्षा दत्ता समझ का ये खेल है, कि तेरा मेरा क्या मेल है । तू धूप सा मैं छांव सी , तू है बिसात मैं दाँव सी । तू रंगों से भरा मैं श्वेत सही , तू पर्वत सा अडिग मैं रेत सही । तू सागर है गहरा सा , मैं आसमान हूँ ठहरा सा […]Read More
(1)मंजर •••••••••••••• जहां होता था प्रेमलाप सुबह की पहली किरण के साथ खिल उठता था मौसम तितलियों के झुंड सी भागती, दौड़तीं ,खिलखिलाती बालाएं बरामदे में बिखेर देती थी सतरंगी हवाएं । अपने दुपट्टे को करीने से ओढ़ती मोबाइल फोन से सेल्फी लेती कक्षा की ओर तेज कदमों से जाती हुईं अ़फसराओ सी मेरी स्मृतियों […]Read More
हुल जोहार के महान क्रन्तिकारी मा चानकु महतो जिन्होंने आदिवासियों के साथ हजारो की संख्या में तीर कमान एव कुल्हाड़ी से लैस होकर अंग्रेजो को मौत के घाट उतार दिया था और आदिवासी समाज ने कभी भी अग्रेजो की अधीनता स्वीकार नही की ।आपके बलिदान दिवस 15 मई पर आपको शत शत नमन। ‘अपना खेत […]Read More