“कुदरत का फैसला”

भावना सिंह कोरोना के शोर से – आज हर शहर खामोश है , गाँव गाँव बस्ती-बस्ती में – हर कस्बा मायूस है ।। ये एक कदम है कुदरत का – कोई फैसला जरूर लिया होगा , बहुत मनमानी हो गई आदमी की – हस्तक्षेप खुद आकर किया होगा।। शायद ये समझाने के लिये – आदमी […]Read More

कुलदीप कुमार ‘आशकिरण’ की कवितायेँ

{मुझे डर लग रहा है} मुझे डर लग रहा क्योंकि ! मेरी संवेदनाएं निष्प्राण हो रही और मैं दिशाविहीन। मुझे डर लग रहा है कहीं मैं मिस्टर प्रभाकर का आवारा मसीहा होकर दिशा की खोज में दिशाहारा से दिशांत न हो जाऊं । मुझे डर लग रहा है कहीं फिर से प्रेमचंद के होरी की […]Read More

सन्तोष पटेल की कविताएँ

{छोर} दो छोर मिलना सम्भव नहीं जानता हूँ मैं पता यह भी है मुझे रहेंगे इसी पृथ्वी पर हम पर हमारे घूर्णन के लिए हैं अपने अपने अक्ष यह भी है पता मुझे स्थित हैं हम पृथ्वी पर ही पर हम हैं दो ध्रुव की तरह जैसे तुम दक्षिण हो तो मैं हूँ उत्तर फिर […]Read More

सीमा अहिरवार ‘ज्योति’ की कविताएँ

{ स्तर } दुनिया में जब जन्म लिया, लड़की का रूप मिला, लड़के से लड़की का स्तर नीचे था. कुदरत ने मुझको काला रंग दिया, गोरे रंग से काले रंग का स्तर नीचे था. बचपन गरीबी में बीता, अमीरी से गरीबी का स्तर नीचे था. कद मेरा थोडा छोटा था, ऊंचे कद से छोटे कद […]Read More

साहित्यिक परिवर्तन का सफ़र जारी रहे

Rajiv Chaudhary आज जब हमारे रुबरु होने, एक दूसरे तक पहुंचने के रास्ते बाधित हैं, ऐसे में परिवर्तन मंच का साहित्यिक सफ़र अबाध रुप से चलाने के लिए तेज प्रताप जी ने Social Distancing के काल में Social Networking के ज़रिए नई राहें हमवार की हैं। ये नया सफ़र अत्यंत सुखद है क्योंकि इस पर […]Read More

पत्रकारिता बनाम चाटुकारिता

तेज प्रताप नारायण पत्रकारिता एक जिम्मेदाराना कार्य है एक जिम्मेदार पत्रकार का काम सही तथ्य को जनता के सामने प्रस्तुत करना, तमाम अफवाहों के बीच सच्चाई खोजकर समय से पूरे तथ्यों के साथ बिना पक्षपात के रिपोर्टिंग करनी होती है पर क्या आज के पत्रकार अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहे है ? हिन्दी […]Read More

सीमा पटेल की कविताएँ

{शब्द हीन संवाद} न तुम बोलो न मैं बोलू करतें है कोशिश एक शब्द हीन जीवन जीने की जहाँ सन्नाटा हो दूर तक साँसों की आवाज़ हो धड़कनों के सुर हो आपस की तपन हो केवल स्पर्श ही अपने शब्द हो बने अमर कहानी साँसों की भाषा की {बूँद} माँगा था साथ हमने वो प्यार […]Read More

सत्ता का संतुलन

Vijay Gautam ‘मूकनायक’ अभूतपूर्व, भरपूर, कई देशों के लिए मिशाल, चुनौतीपूर्ण, सामूहिक शक्ति, एकजुट होकर, सामूहिकता, 130 करोड़ लोग, इतनी बड़ी लड़ाई, विराटता, भव्यता, विद्वता, ईश्वर का रूप, जनतारुपी महाशक्ति, विराट स्वरूप, अंधकार के बीच, निरंतर, प्रकाशमय सबसे ज्यादा प्रभावित, निश्चितता, प्रकाश का तेज़, संकट का अंधकार, चुनौती, प्रकाश की ताकत का परिचय, महाशक्ति का […]Read More

कुछ राजनीतिक कविताएं

राजीव चौधरी “सहरा” 1 मुल्क की उस अवाम के लिए वो, निज़ाम आख़िर, कैसे अपना हो। जिसके लिए वहां रोटी कमा लेना, और जी लेना ही एक सपना हो। 2 लोग जो ख़ैरख़्वाह थे अपने मुल्क के, रोड़े कुछ कम नहीं उनकी राह में थे। निगाहों में ख़्वाब जिनके तरक्की के, वही लोग हुक्मरानों की […]Read More

जी हाँ ! हम मज़दूर हैं

रचना चौधरी बुद्धिजीवियों, प्रभुत्त्ववादियों से अलग, कुछ और ही दुनिया है हमारी, गरीबी का बिछौना बिछाए चारों पहर थकन से चकनाचूर हैं, जी हां !!! हम मज़दूर हैं… ऊँची अट्टालिकाओं की नींव धरने वाले खुद झोपड़ियों में रहने को मज़बूर हैं, जी हां !!! हम मज़दूर हैं… गली मोहल्लों में लैंप पोस्ट लगाते हैं, मगर […]Read More