घर वापसी

विमलेश गंगवार   [लेखिका ,संस्कृत की भूतपूर्व प्रवक्ता हैं ।इनके तीन उपन्यास और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ।विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी कहानियाँ ,कविताएँ और लेख प्रकाशित होते रहते हैं ।] रात दिन चलने के बाद जब वह अपने गांव वापस आये तो हारे थके तो ही , अपना घर खोजते रहे।यह […]Read More

डॉ अनीता सिंह पटेल की कविताएँ

【जब पेट ख़ाली हो】 ज़रा भाषण कर दिखाओ ज़रा चिंतन भी उड़ेलो ज़रा आदर्श बघारो तुम्हें चुनौती है!!! हां चुनौती है ये सब कर दिखाओ जब पेट खाली हो । 【कल की ही तो बात】 अभी कल ही की तो बात है कहा था तुमने अंतहीन नहीं है रेल की पटरियां जल्द ही अंत होगा […]Read More

अफीम

Vijay Gautam ‘मूकनायक’ विज्ञान कई दिनों से जागा किसी लैब में जूझ रहा था. समस्या जटिल थी, संसाधन कम थे, और उस से भी कम था समय. खोज के लिए समय चाहिए था , समय लाशों के दाम मिल रहा था. धर्म के ठेकेदारों ने धर्म को कहीं बेच दिया था, सो मानव-सेवा छोड़ चुपचाप […]Read More

प्रवासी श्रमिकों के लिए हो कृषि आधारित रोजगार का सृजन

डाॅ. देवेंद्र सिंह माटी फाउंडेशन संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश किसी भी देश की तरक्की में किसानों, मज़दूरों और मेहनतकशों की अहम भूमिका होती है। देश की लगभग 56 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि आधारित कार्यकलापों में संलग्न है। गाँवो में भूमिहीन मजदूरों को वर्ष में कई महिनों तक बेरोजगार रहना पड़ता […]Read More

जीना है तो पीछे जाना ही होगा

राजेश पटेल  कोरोना हमें बहुत सीख दे रहा है। अहं का नाश। सादा जीवन। कम जरूरतों में जीना। मांसाहार के बिना भी जीना। नशे का त्याग। स्वजन को पूरा समय देना। बिना एसी रहना। संतोष करना। हाथ जोड़ना। प्रकृति के साथ तालमेल। धूप अच्छा लगना। बाजार से दूर रहना। बाजारू चीज न खाना। अंधविश्वास से दूरी। […]Read More

मुझे बुद्ध होने दो

आलोक सिंह “गुमशुदा “ मुझे बुद्ध होने दो छोड़ कर नफरतों के घर तोड़ कर जाति धर्म के धड़ मुझे बुद्ध होने दो तार्किक हो हर एक विषय असत्य की हो हार, सत्य की हो विजय ग्यान की गंगा निरंतर प्रवाहित होने दो मुझे बुद्ध होने दो हटा कांटें राहों से , सबको बढ़ने दो […]Read More

रोहित ठाकुर की कविताएँ

[ कविता ] कविता में भाषा को लामबन्द कर लड़ी जा सकती है लड़ाईयांँ पहाड़ पर मैदान में दर्रा में खेत में चौराहे पर पराजय के बारे में न सोचते हुए  । [ रेलगाड़ी  ] दूर प्रदेश से घर लौटता आदमी रेलगाड़ी में लिखता है कविता घर से दूर जाता आदमी रेलगाड़ी में पढ़ता है […]Read More

ज़िंदगी संगीत है

ज़िंदगी संगीत है यही मौत है, यही मीत है। इससे क्या गिला क्या शिकवे यही तो सच्ची प्रीत है। ज़िंदगी सांस है आस है संघर्ष है, हार नहीं जीत है। जिंदगी हवा है, पानी भी भूख है, प्यास है, लहरों की रवानी भी। बचपन, तरुणाई और जवानी बुढ़आपा की कहानी है। हर पल जियो जी […]Read More

लोटा भर अंधविश्वास

राजेश पटेल की कलम से ये साधारण लोटा नहीं है। इसमें अंधविश्वास भर कर पीपल के पेड़ की टहनी से लटका दिया गया है। चोरी चोरी की बात को स्वीकार करेगा, यह विश्वास भी इसमें भरा है। 80 हजार रुपये की चोरी का खुलासा करने के लिए इस अनुष्ठान में ओझा ने भी 5-6 हजार […]Read More

ज़िंदगी झरना है

ज़िंदगी झरना है, गिरना है, गिरकर संभलना है। बाधाओं को हराकर, मंजिल तक पहुंचना है ब्रह्म है, ब्रह्मांड है यह, प्रकृति है, प्राकट्य है यह। मर-मर कर जीना है, जी-जी कर मरना है। दिग है, दिगंत है यह, आदि है, अनंत है यह। आगे ही आगे बढ़ना है, निरंतर चलते ही चलना है,’ ज़िंदगी झरना […]Read More