एक थे डाकू सुल्ताना

 एक थे डाकू सुल्ताना

डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह

लेखक ,प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक, आलोचक और बौद्ध दार्शनिक हैं

गाँधी ने मूलतः अंग्रेज शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी …. फुले ने मूलतः भारतीय शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी….. लेकिन सुल्ताना ने एक साथ अंग्रेज और भारतीय दोनों शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

सुल्ताना डाकू ….असली नाम सुल्तान …गाँव का नाम हरथला …..जाति का नाम भाँतु ….पिता का नाम गयासिया भाँतु …फाँसी के पूर्व सुल्ताना का वजन 117 पौंड ….फाँसी की तारीख 7 जुलाई 1924।

सुल्ताना स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार और छेड़खानी के सख्त खिलाफ था।

जिम कार्बेट ने अपनी पुस्तक में एक वाकया का वर्णन किया है कि एक बार उसके गैंग के सदस्य पहलवान ने स्त्री लूट लाई थी। सुल्ताना ने उस स्त्री को बाइज्ज़त घर पहुँचाने का फौरन फरमान जारी किया।

जिम कार्बेट की पुस्तक ” माई इंडिया ” सुल्ताना के बारे में जानने के लिए महत्वपूर्ण समकालीन स्रोत है।

” माई इंडिया ” में लिखा है कि सुल्ताना ने पूरे डकैती जीवन में कभी भी किसी गरीब आदमी की एक कौड़ी भी नहीं लूटी।

यह भी लिखा है कि वह दुखियारों को मदद करने से कभी इनकार नहीं किया और छोटे दुकानदारों से जब सामान लेता था, तब दुगुना मूल्य देता था।

जिम कार्बेट ने ” माई इंडिया ” में और फिलिप मेसन ने ” दि मेन हू रूल्ड इंडिया ” में लिखा है कि सुल्ताना अमीरों को लुटता था और गरीबों में बाँट देता था।

यह प्रकार से उसका सामाजिक न्याय करने का तरीका था।

तब कुमाऊँ के पुलिस कमिश्नर पर्सी बिंडहम थे। सुल्ताना से हैरान-परेशान बिंडहम ने अपने समय के तेज तर्रार पुलिस आॅफिसर फ्रेडी यंग की माँग ब्रिटिश सरकार से की।

फ्रेडी यंग ने सुल्ताना की गिरफ्तारी के लिए 300 सिपाहियों और 50 घुड़सवारों की फौज लगाई। चप्पे-चप्पे पर खुफिया तैनात किए गए। तब जाकर 14 दिसंबर, 1923 को सुल्ताना की गिरफ्तारी हो सकी।

फ्रेडी यंग ने सुल्ताना को पकड़ने में जिम कार्बेट की मदद ली थी। जिम कार्बेट बाघ और चीता मारने का शिकारी और जंगल का अनुभवी था।

लेकिन सुल्ताना दरियादिल इंसान था। अपनी गिरफ्तारी से पहले पुलिस आॅफिसर को छोड़ दिया था। जिम कार्बेट ने लिखा है कि बरगद के एक पेड़ के पास सुल्ताना मिला था और उसने मेरी और मेरे साथियों की जान बख्श दी थी।

यहीं कारण था कि फ्रेडी यंग और जिम कार्बेट सुल्ताना की फाँसी नहीं चाहते थे। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत और जमींदार डरे हुए थे तथा वे आखिरकार बगैर सुल्ताना का पक्ष जाने जल्दबाजी में फाँसी दिलवा डाले।

और इस प्रकार गरीबों के मसीहा सुल्ताना का अंत हो गया।

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