बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर

 बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर

बहुत कुछ नहीं बदला है
आज भी जंगल उजाड़े जा रहे हैं
आदिवासी मारे जा रहे हैं
लोगों के घर तोड़े जा रहे हैं ,
बिरसा तुम्हें आना होगा फिर एक बार
क्रांति का बिगुल बजाना होगा फिर एक बाार
उलगुलान करना होगा फिर एक बार
उलगुलान!!! उलगुलान!!! (असीम कोलाहल )
तभी निकलेगा
जनता की समस्याओं का हल ।

1875 में रांची के एक गाँव में जन्मे बिसरा मुंडा का नाम मुंडा रीती रिवाज के तहत बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था | बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था |

बिरसा मुंडा का परिवार घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करता था | थोडा बड़ा होने पर उन्हें जंगल में भेड़ चराने जाना पड़ता था | जंगल में भेड़ चराते वक़्त समय व्यतीत करने के लिए बाँसुरी बजाया करते थे और धीरे धीरे बाँसुरी बजाने में उस्ताद हो गये थे | उन्होंने कद्दू से एक एक तार वाला वादक यंत्र तुइला भी बनाया था जिसे वो बजाया करते थे ।

1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू की । इसे उलगुलान विद्रोह भी कहा जाता है ,ऊलगुलान का मतलब होता है असीम कोलाहल. द ग्रेट ट्यूमुल्ट. ।आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और ज़मीन पर अपनी दावेदारी के लिए विद्रोह शुरू किया ।यह विद्रोह न सिर्फ़ अंग्रेजो के ख़िलाफ़ था बल्कि देशी जमींदारों के ख़िलाफ़ भी।इस विद्रोह ने बिरसा के आँखों की किरकिरी बना दिया था । हालाँकि यह कोई बग़ावत नहीं थी,बल्कि यह तो आदिवासी स्वाभिमान, स्वतन्त्रता और संस्कृति को बचाने बिरसा का संग्राम था। बिरसा ने ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज‘ यानि ‘हमारा देश, हमारा राज‘ का नारा दिया ।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लोगों की भीड़ जमा करने से रोका।लेकिन वे संघर्ष से पीछे नहीं हटे इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार करने का प्रयत्न किया, लेकिन गांव वालों ने उन्हें छुड़ा लिया। शीघ्र ही वे फिर गिरफ़्तार करके दो वर्ष के लिए हज़ारीबाग़ जेल में डाल दिये गये। बाद में उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ा गया कि वे कोई प्रचार नहीं करेंगे।
24 दिसम्बर, 1899 को बिरसा मुंडा आन्दोलन आरम्भ हुआ। तीरों से पुलिस थानों पर आक्रमण करके उनमें आग लगा दी गई। सेना से भी सीधी मुठभेड़ हुई, किन्तु तीर कमान गोलियों का सामना नहीं कर पाये। बिरसा मुंडा के साथी बड़ी संख्या में मारे गए। उनकी जाति के ही दो व्यक्तियों ने धन के लालच में बिरसा मुंडा को गिरफ़्तार करा दिया। 9 जून, 1900 ई. को जेल में उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है ,उन्हें विष दे दिया गया था।

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