रचना चौधरी का लेख– वर्तमान जीवनपद्धति और बच्चे

 रचना चौधरी का लेख– वर्तमान जीवनपद्धति और बच्चे

एक दौर था जब जानकारी प्राप्त करने और मनोरंजन के सीमित संसाधन हुआ करते थे हम बच्चों के पास। एक टी वी चैनल, उसपर भी अत्यंत सीमित से कार्यक्रम, सीमित विज्ञापन। इंटरनेट किस चिड़िया का नाम, कुछ अता पता ही नहीं था। लेकिन इन सीमित संसाधनों के बीच वैचारिक स्तर पर, आत्मिक स्तर पर विस्तार हेतु अनंत संभावनाएं थी। हम अपने विषय में सोचते थे, अपने आस पास के बारे में सोचते थे। खाली समय में इंटरनेट या यू ट्यूब पर कुछ नया खोजने, जानने के चक्कर में प्रकृति और स्वयं को खोने का विकल्प नहीं हुआ करता था तब। तब खाली वक़्त में हम कभी ये देखते थे कि माँ कैसे सूप से फट फट की आवाज़ करके चावल से भूसी और गर्द को निकालने का जादू कर लेती थी। कैसे वो सफेद चावलों से काले कंकड़ अलग कर रही होती थी। हमें नहीं पता था लेकिन अंजाने में हम भी सीख गए कि जिंदगी में कूडे कचरे ज़रूर होंगे बहुत सारे, लेकिन हमें उन गैर ज़रूरी चीजों को कैसे थोड़ी सख्ती तो थोड़ी मेहनत से अपनी ज़िंदगी से बाहर निकालना है। कभी जो टी वी के आगे बैठे भी तो खाने के नए- नए स्वादिष्ट किंतु हानिकारक विकल्पों से नई इक्षायें और आत्मसंतुष्टि के नये पैमाने नहीं मिले हमें। हमने तो सीखा कि पोषक तत्वों से भरपूर एक थाली में क्या- क्या होना चाहिए।
हमें अनेकता में एकता के बल को जानने के लिए नैतिक शिक्षा की किताबें और यू ट्यूब पर url डालकर सर्च नहीं करना पड़ता था। एक छोटा सा एनिमेशन अपनी काव्यात्मक प्रस्तुति से हमें बताकर सिखा देता था कि_ सूरज एक, चंदा एक, एक- एक – एक करके तारे भये अनेक, एक चिड़िया, अनेक चिड़िया_

हमें लग रहा है हम विकास कर रहे हैं, शायद भौतिक रूप से हम दिन प्रतिदिन समृद्धि होते जा रहे हैं मगर इस समृद्धि, इस विकास की कीमत जो हम चुका रहे हैं उसको तो हम कभी देखते ही नहीं अपने मन की जेब टटोलकर।

ये प्रौद्यगिकी, ये विकास, ये इंटरनेट की सुलभता उंगली की पोरों पर हर सवाल का जवाब अच्छा है। लेकिन यदि ये सब कुछ पाने की कीमत हमें हमारे बच्चों या हमारी नैसर्गिकता, मौलिकता को खोकर चुकानी पड़ रही हो, क्या तब भी।

हर सवाल का जवाब मीडिया और इंटरनेट से मिल जाना, सहज है, सुविधाजनक है लेकिन इस सुलभता में मन ने खुले आसमां में उड़ना ही छोड़ दिया है। याद करने पर भी शायद ही याद आये हमारे बच्चों को कि यूं ही बेसबब उन्होंने खुले आसमां को घंटों देखा हो। उन्होंने इंद्रधनुष देखने के लिए आसमां को ज़रूर तलाशा होगा, लेकिन यूं ही आसमां निहारते हुए इंद्रधनुष दिख जाने का आनंद उन्होंने कभी उठाया ही नहीं। बेमतलब ही आसमां निहारते – निहारते कभी ख़ुद को नहीं पाया होगा।

ये सॉफ्टवेयर हर चीज, हर जानकारी को असेस करना जानते हैं। गूगल ड्राइव पर हर तस्वीर को, लिखे हुए को सेव रखने का विकल्प होता है। लेकिन खुद को कैसे Explore करना है, कैसे अपने बचपन को बच्चा होकर सहेजना है ये जवाब नहीं किसी भी सॉफ्टवेयर के पास।

इन बच्चों ने तो बड़े बड़े शॉपिंग मॉल्स से थोड़ा मंहगे मगर पैकेज्ड ब्रांडेड राईस ही आते देखा है घरों में। जो बिल्कुल उजला और साफ सुथरा होता है। भला कैसे समझ पाएंगे ये बच्चे कि ज़िंदगी की रेसिपि के ingredient में कंकड़ पत्थर भी मिलेंगे और उन्हें कभी हल्की चोट करके तो कभी थोड़ा वक़्त देकर चुनकर बाहर निकाल फेंकना होगा।

   उन्हें हर चीज परफेक्ट और रेडी मेड मिल रही है। हर जवाब बस एक क्लिक पर उपलब्ध है। आखिर कैसे वो इन कृत्रिम पंखों से उड़ पाएंगे जीवन की असीम संभावनाओ के आसमां में, तब जबकि उन्हें न तो आकाश का सही रंग पता है, न क्षितिज के भुलावे का आभास है। 

भौतिकता के प्रति, धन के प्रति, सामाजिक प्रस्थिति के प्रति जागरूकता तो है इन बच्चों में मगर अपने प्रति? उन्हें सब आता है, बड़े बड़े सवाल हल करना, सुंदर और वैज्ञानिक प्रोजेक्ट बनाना।

मगर क्रोध का प्रबन्धन !
जीवन की समस्यायों का प्रबंधन!
निराशाओं के बावज़ूद आशा को बनाये रखने का प्रबंधन!

क्या जीवन इतना सुलभ है जितना सुलभ जीवन उन्हें उपलब्ध कराया जा रहा है! शायद नहीं__ तो फिर जीवन की तमाम जटिलताओं और अभावों के साथ अपनी सहजता को बनाये रखना उन्हें कौन सी पुस्तक या कौन सी वेबसाइट पर सिखाया जायेगा?

कल्पनाशीलता अपने आप में साधन भी है और साध्य भी एक बच्चे के विकास हेतु। किंतु इतनी सुविधाओं के बीच, प्रत्येक प्रश्न के उत्तर की त्वरित उपलब्धता और सुलभता के बीच क्या ये बच्चे अपनी कल्पनाशीलता के आयामों को छू पा रहे हैं?

“ऐसा न हो कि वर्तमान जीवनशैली में ‘कल्पनाशीलता’, ‘सहजता’, ‘सृजनात्मकता’, ‘आत्मनियंत्रण’, ‘अवसाद प्रबंधन’ __ व्यक्तित्व का एक अवशेषी गुण बनकर रह जाय।

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