अनुपमा सरकार की कविताएँ

 अनुपमा सरकार की कविताएँ

अनुपमा सरकार

शैक्षणिक योग्यता : बैचलर ऑफ़ एप्लाइड साइंस, एम्.ए (अंग्रेजी)

वेबसाइट: https://scribblesofsoul.com/

यूट्यूब चैनल : मेरे शब्द मेरे साथ  https://www.youtube.com/MereShabdMereSaath/

प्रकाशित किताबें: फ़ुर्सत के पल,  Don’t Hate The Don’ts    

साझा संग्रह प्रकाशित      :  स्पंदन Resonance,  लहर लहर इकतारा, Colours of Refuge,  सरगम Tuned,  मशाल,  परदे के पीछे की बेखौफ आवाज़ें, शब्दों की अदालत, शब्दों के पथिक

पत्रिकाएं व् समाचारपत्र (प्रकाशित) :  हंस, अक्षर पर्व, शब्द व्यंजना, मंतव्य, उपासना समय, मधुराक्षर, भोजपुरी पंचायत, आकाश, भोजपुरीजिनगी, डिफेंडर, सौरभ दर्शन,  सुसम्भाव्य

इमेल :    anupamasarkar10@gmail.com

 [ 1 ]

फटता है कलेजा

घुटी चींखें बाहर आने को मचलती हैं

जलतीं हैं आँखें

खारी नदियां समन्दर में कूद पड़ती हैं

तड़पतीं हैं सांसें

कमज़ोर धड़कनें धौंकनी सी चलती हैं

लड़खड़ाते हैं कदम

दलदली ज़मीं धीमे धीमे खिसकती है

गुफा है अँधेरी, रोशनी नदारद, आवाज़ें गुम

दूर दूर तक पसरा है सन्नाटा

खीझता, पसीजता, खुद से ही टकराता

स्याह हुआ आसमां,

तितलियों ने उड़ना

जुगनुओं ने चमचमाना छोड़ दिया

नहीं कोई संगीत बारिश की बूंदों में

नहीं कोई हरकत छुईमुई के फूलों में

नहीं गरजतीं घटाएं, बिजलियाँ नहीं चमकतीं

नहीं खिलतीं कलियाँ, कोयलिया नहीं कूकतीं

अजब सा मंज़र है, धधकती सी टीस

और इन सबके बीच

इक नन्हा सा दिया

तूफानी लहरों में डगमग चलता !

अपनों की तोहमतें, गैरों की बेइंसाफियां

हंसते हुए झेलता !!

सुनो ! इन उँगलियों में जान बाकी है अभी

गोद जाऊंगी कुछ इबारतें नई !!

[2 ]

कच्चे सूत में पिरोए मोतियन की माला सी

कतरा कतरा बिखरी है ज़िंदगी

वेदनाओं संवेदनाओं से परे बेजान लाश सी

पल पल सिसकती एक लड़की

सपनों की आंच अरमानों के सांच में ढली सी

दम दम आहें भरती है बावरी

आसमां में उड़ने का ख़्वाब लिए अपाहिज सी

इंच इंच फिसलती है हर घड़ी

खुद ही बहकती दहकती लहकती धौंकनी सी

गढ़ लेती है इक मज़बूत लड़ी

बींधती संघर्षों के मोती स्वाभिमान की सुई से

फिर फिर संवारती है ज़िंदगी

और इस बिखरन और संवरन के बीच अनाम सी

टुकड़े टुकड़े जीती वो लड़की

कभी समय मिले तो छू लेना ह्रदय की वीणा से

झंकृत मृत काठ की वो पुतली !!

[ 3 ]

दुनियादारी की बातें दिमाग समझता है

इस दिल का क्या करूं

पगला बस इक नाम लिए धड़कता है

यन्त्रवत् सी दिन भर हंसती खिलखिलाती हूँ

रोबोट सी सारे काम निपटाती हूँ

खुद को यकीन दिलाती हूँ कि सब ठीकठाक है

सूरज चमक रहा है सड़क पर चहलपहल है

आस्मां में बादल चाँद बिजली सब हैं

बस धुंधलके में छिपे हैं

जल्द ही धुप चमकेगी सब साफ नज़र आएगा

दिन ढलेगा चाँद उभर आएगा

सितारे चमकेंगें बिजलियाँ खनकेंगीं

सब कुछ वही होगा वैसा ही जैसा

सदियों से होता आ रहा है

पर फिर यकायक एक अक्स उभरता है

मन में हलचल होती है

इक नाम बुदबुदा उठती हूँ

और भूल जाती हूँ सारी दुनिया

बस नंगे पाँव दौड़ी दौड़ी

तेरे पास चली आती हूँ

देहरी पर ठिठकती हूँ कहूँगी क्या

किस काम से आई हूँ

क्या कहना था ऐसा जो

सुबह शाम का फर्क़ भूल आई हूँ

उलझी हूँ खुद में तुम्हें सुलझाना चाहती हूँ

सवाल मेरे नदारद हैं जवाब तुमसे चाहती हूँ

पर नहीं फिर से गलत लिख रही हूँ

बहला रही हूँ खुद को इन शब्दों में

जो कहना सुनना है वो तो तुम ही जानते हो

दुनियादारी की बातें दिमाग समझता है

मन में बस एहसासों का दरिया बहता है

वो अपनी गति ले चुका, अब रुकना

दिशा बदलना, व्यवस्थित करना हमारे बस में कहाँ !!

[4 ]

नन्हीं सी बारिश की बूँद में

उफनता समन्दर देखा है कभी ?

मिट्टी से सने बीज की कोख में

पनपता विशाल पेड़ देखा है कभी ?

शहतूत की पत्तियों पर लाचार

रेंगता रेशमी कीड़ा देखा है कभी ?

साबुन के पानी में निढाल पड़ा

रंगीन बुलबुला देखा है कभी ?

नहीं,

अक्सर नज़र वही देखती है

जो स्वार्थी आँखें देखना चाहें

दुनिया उतना ही समझती है

जितने में फायदा मिल जाए

पर सच्चाई नहीं बदलती

सोने की धूल, हीरे की चमक

मोती का मोल, सूरज की दमक

अक्षुण्ण है, अजर-अमर !

याद रख,

केवल निष्क्रिय है तू मानव

मृतप्राय नहीं, असमंजस त्याग

नकार निराशा के घटक

नवजीवन का संचार कर !

[ 5 ]

ईंट गारे से बने मकान भाते हैं मुझे

नन्ही इकाईयां एक हो जाएँ तो

कितनी मज़बूत है ज़िन्दगी

हौले से बताते हैं मुझे

पर आज की सुबह कुछ अलग है

मार्बल कटने की तीखी आवाज़

कानों में पिघला शीशा घोल रही है

ड्रिलिंग मशीन कर्कश स्वर में

जाने कौन से व्यंजन मन भर तोल रही है

उफ्फ़ ! ये सटे से मकान

ये ऊंची इमारतें

ये लोहे के जंगले

ये भिंचे से छज्जे

इस महानगरीय शोर से दिल उकता गया

मुझे सालों पुराना इक सफर याद आ गया

सरसों के लहलहाते खेतों की मुंडेर पर

उगे टेढ़े मेढ़े पेड़ों की ऊंची डालियों पर

मोरनी का लगभग चींखते हुए जाना

नवजात शिशुओं का खुलकर चहचहाना

और झीने कोहरे की चादर का मेरे होंठों को छू जाना

उन चरमराती पत्तियों पर निस्संकोच मेरा बढ़ते जाना

जंगली फूलों की पंक्तियों में गुलाब की छटा देख मेरा

आत्म मुग्ध हो जाना

न वाहनों का शोर

न भीड़ की चांय चांय

बस मीलों फैला आसमां, भीना सा धुआँ और मैं

कुछ महानगरीय कोने कितने सुकून भरे होते हैं न

दिल को बिन आंच पिघला जाते हैं

और सालों बाद भी स्वप्न सरीखे

खुली आँखों में तैर जाते हैं!

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