थोड़े अपने थोड़े पराए

 थोड़े अपने थोड़े पराए

तेज प्रताप नारायण

अक्सर हम एक जाति को दुश्मन दूसरी जाति का मानते हैं ।यहाँ जाति मतलब caste ही नहीं बल्कि धर्म,मज़हब,स्त्री ,पुरुष ,पशु ,पक्षी ,देश जैसे प्राकृतिक और कृत्रिम विभाजनों को अलग अलग जाति का मान कर अपनी बात रख रहा हूँ ।जैसे स्त्री ,पुरूष को अपना दुश्मन मानती है ,एक कास्ट दूसरी कास्ट को अपना दुश्मन मानती है ।
क़रीब सात आठ महीने पहले की बात होगी मेरे घर की बालकनी में एक कबूतर ने अंडा दिया था । अंडे से बच्चे के बाहर आने के बाद उसकी माँ दाना- पानी के जुगाड़ में बच्चे को बालकनी में ही छोड़कर निकल जाया करती थी ।बच्चा इंतज़ार में अकेला बैठा रहता था।जितना हम लोगों से बन पड़ता था हम लोग उसकी अन्य जानवरों से बचाने का प्रयास करते थे । लेकिन यह तो संभव था नहीं कि 24 घण्टे कबूतर के बच्चे की देखभाल कर पाते । हमने एक बात महसूस किया कि जैसे मौक़ा मिलता कुछ कबूतर आ जाते और बच्चे के पास मंडराने लगते ।हम लोग सोचते कि यह तो कबूतर ही हैं,अपने परिवार के छोटे बच्चे से मिलने आते होंगे।कोई बिल्ली तो है नहीं कि बच्चे को नुकसान पहुंचा पाएगी । लेकिन हम लोग ग़लत थे। एक बार ची ची की तेज़ आवाजों के साथ पंख फड़फड़ाने का शोर सुनाई पड़ रहा था ,हमें लगा कि हो सकता है कि माँ बच्चा खेल रहें होंगे लेकिन शोर बढ़ता गया।वहाँ जाकर देखा तो एक कबूतर बच्चे की माँ की गर्दन को दबाकर बच्चे पर लगातार वार किए जा रहा था । बच्चा गों गो करके छटपटाकर लहूलुहान हो गया था ।
ख़ैर हम लोगों ने डांट कर आततायी कबूतर को भगाया ।उस बच्चे को वेटेनिरी डॉक्टर के पास ले जाया गया लेकिन बहुत कोशिश के बावज़ूद वह बच्चा बच नहीं पाया।

दो महीने पहले बालकनी में फिर से एक कबूतर ने अंडे दिये जिससे दो बच्चे निकले ।उन बच्चों को रहने की व्यवस्था एक कार्टन में कर दी गयी। लेकिन अब भी बीच -बीच में दो तीन कबूतरों का झुंड आ जाता है और कबूतरों के बच्चों पर अटैक करने का प्रयास करते हैं ।
समझ से परे है कि कबूतर ही अपने वंश का दुश्मन कैसे बन सकता है ??

लेकिन थोड़ा ध्यान से देखा जाए तो मिथक से लेकर रियल तक ऐसी कई घटनाएं मिल जाएंगी जिससे पता चलता है कि अपने घर या अपने समाज के ही लोगों ने समाज का अहित किया है । मिथकीय चरित्र सुग्रीव,विभीषण से लेकर महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह की बात हो या शिवा जी के पुत्र सम्भा जी के साथ पेशवाओं का छल हो ,ज़्यादातर डिच अपने लोगों ने ही किया है ।
गहराई में देखा जाए तो अक्सर राइवलरी अपने लोगों में ज़्यादा होती है।चाहे वह सिबलिंग राइवलरी हो,फ्रेंड्स की राइवलरी या इन कास्ट राइवलरी । इसका कारण इंटरेस्ट कॉन्फ्लिक्ट या स्वार्थों का टकराव है । एक फील्ड या एक घर या एक समाज के लोगों के आपसी हित में ज़्यादा टकराहट होती है ,एक ही स्थान के दो दावेदार होने की वजह से या स्पेस के बँटवारे से कॉन्फ्लिक्टिंग सिचुएशन बनती है। ऐसे में बिवेयर न रह सकें तो अवेयर ज़रूर रह सकें तो बेहतर हैं । मतलब हमारा कोई ग्रुप हो ,कोई क्लब हो तो किसी को जज न करें लेकिन यह ज़रूर पता रखें कि कौन सा व्यक्ति आपके सिस्टम को शार्ट सर्किट कर सकता है ,कम से कम उस व्यक्ति पर ओवर डिपेंडेंट न रहें । हमें अपने क़रीबी को राइवल नहीं मानना है हाँ उसे वॉच ज़रूर करते रहना है ।कनफ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट है तो थोड़ी राइवलरी हो सकती है लेकिन इस राइवलरी को दुश्मनी में न बदला जाए,यह ज़रूरी है ।इस तर्क को आगे बढ़ाया जाए तो समझ मे आता है कि भारत को ख़तरा पाकिस्तान से नहीं बल्कि अपनी आंतरिक कमज़ोरियों से है ,इंटर्नल कनफ्लिक्ट से है ।हिंदू को ख़तरा मुस्लिम से नहीं बल्कि कुछ वर्गों की सोच और स्वार्थ से है। व्यक्ति को ख़तरा किसी राइवल से ज़्यादा अपनी आंतरिक कमज़ोरियों से है ।
ऐसे में ज़रूरी है कि हर स्तर पर हम ख़ुद के बारे में अवेयर होने के साथ अपने क्लोज सर्किल के लोगों के बारे में अवेयर रहें और अपना दीपक स्वयं बनें ।सेल्फ अवेयरनेस के साथ अपने आसपास के व्यक्तियों के बारे में अवेयर रहें और लचीला व्यवहार बनाए रखें । दूसरों के बारे में अवेरनेस का मतलब उनपर संदेह करना या जज करना नहीं है बल्कि उन्हें समझना है ।

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