आधुनिक कृषि एवं पर्यावरण

 आधुनिक कृषि एवं पर्यावरण

डॉ. देवेंद्र सिंह
माटी फाउंडेशन,
संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश

कृषि भारत में आजीविका का साधन होने के साथ-साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक उत्सवों एवं पर्वों की प्रतीक है। ग्रामीण जनसंख्या के 75 प्रतिशत लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती आधारित जीविका पर निर्भर हैं। कृषि का राष्ट्रीय आय में लगभग 27.4 प्रतिशत का योगदान है। भारतीय कृषि मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर रहती है तथा एक वर्ष के अंतर्गत मुख्यतः रबी, खरीफ एवं जायद फसलों की रोपाई की जाती हैं।

“कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषि:” (कृषि पाराशर-श्लोक-7)
अर्थात्‌ कृषि सम्पत्ति एवं मेधा प्रदान करती है तथा कृषि ही मानव जीवन का आधार है।

आधुनिक कृषि प्रणाली ने समूचे देश में विभिन्न कृषि उत्पादों जैसे भोजन, चारा, रेशा एवं जैव ऊर्जा के उत्पादन की वृद्धि में सकारात्मक योगदान दिया है। कृषि कार्य में उपयोगी सर्वाधुनिक विधियां जैसे- उच्च गुणवक्ता वाले बीज, सिंचाई की नवीनतम विधियां, पौधों में पोषक तत्वों के लिए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग तथा रोगों एवं कीटों का पीड़कनाशी रसायनों द्वारा नियंत्रण तथा विभिन्न्न प्रकार के कृषि यंत्र शामिल है। कृषि में फसल, बागवानी, पुष्प उत्पादन, सगंधीय पौधा उत्पादन, मशरूम संवर्धन, पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, रेशम कीट पालन एवं मत्स्य पालन से विभिन्न कृषि उत्पादों जैसे भोजन, चारा, रेशा तथा कई अन्य वांछित उत्पादों का निर्मित किए जाते हैं। कृषिक अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीनतम कृषि उपकरणों, विभिन्न कृषि गतिविधयों, पौध सरंक्षण, फसल की कटाई तथा फसलोत्तर प्रबंधन आदि महत्वपूर्ण कृषि पद्धतियों का उपयोग करके किसानों की आर्थिक एवं सामजिक स्थिति में सुधार किया जा सकता है। आधुनिक कृषि का मुख्य उद्देश्य अच्छी फसल के साथ-साथ वायु, जल, भूमि व मानवीय स्वास्थ्य का संरक्षण करना भी है।

(अ) कृषि क्षेत्र में नवीन प्रौद्योगिकियां

कृषि के आधुनीकरण तथा नवीन प्रौद्योगिकीयों ने कृषि आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित किया है। हरित क्रांन्ति के फलस्वरूप देश में पारम्परिक कृषि को आधुनिक तकनिकीयों द्वारा प्रतिस्थापित करने से धान, गेहूँ, गन्ना, मक्का तथा बाजरा आदि फ़सलों की उत्पादकता में काफ़ी वृद्धि हुई है। देश खाद्यान्नों की आपूर्ति में आत्मनिर्भर बना तथा व्यवसायिक कृषि को बढ़ावा मिला। कृषि में तकनीकि एवं संस्थागत सुधारों को अधिक कारगर ढंग से लागू कर कृषि क्षेत्र का और अधिक विकास किये जाने की आश्यकता है।

1. कृषि रासायनों का उपयोग
रासायनिक उर्वरक: उर्वरक, कृषि उपज को बढ़ाने के लिए प्रयुक्त होने वाले रसायन हैं, जो पेड-पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं। जल में अति घुलनशील रसायनों का मिट्टी में या पत्तियों पर छिड़काव किया जाता है जिसे पौधे जड़ों एवं पत्तियों द्वारा अवशोषित करते हैं। नवीन कृषि नीति के परिणामस्वरूप रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में तेजी से वृद्धि हुई है। हरित क्रांति की शुरूआत 1966-1967 में प्रमुख रासायनिक उर्वरकों का उपयोग लगभग 7 किग्रा. प्रति हेक्टेअर था, जो 2018-2019 में बढ़कर 123.4 किग्रा. प्रति हेक्टेअर हो गया है, फसल की पैदावार बढ़ने के साथ-साथ खेत, खेती तथा पर्यावरण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ रहा है। फसल लगाने से पूर्व मिट्टी की जांच कराकर रासायनिक उर्वरकों की उचित मात्रा तथा नीम लेपित यूरिया, जैविक उर्वरक, केंचुआ खाद, कम्पोस्ट खाद, मुर्गी खाद, हरी खाद का अधिक प्रयोग करने के साथ–साथ समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है।
रासायनिक पीड़कनाशी: पीड़कनाशी (Pesticides) वह कृषि रसायन होते हैं, जो पौधों को हानि पहुँचाने वाले सूक्ष्मजीवों, कीटों, सूत्रकृमियों, कृन्तकों एवं खरपतवारों को नियंत्रित करते हैं। पीड़कनाशीयों को उनके प्रकार तथा उपयोग के आधार पर उन्हें कीटनाशी, कवकनाशी, सूत्रकृमिनाशी, खरपतवारनाशी, शाकनाशी आदि वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। कृषि विकास के अन्तर्गत पौध संरक्षण में आधुनिक पीड़कनाशीयों का खाद्यान्नों की आपूर्ति में अहम भूमिका हैं तथा कृषकों के आय में वृद्धि भी करते हैं। पौधों में होने वाले रोगों, हानिकारक कीटों तथा अवांछनीय खर-पतवारों को कृषि रसायनों से जल्द ही नियंत्रित किया जा सकता है। ये अधिक समय तक प्रयोग-योग्य रहते हैं, इनको एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना आसान होता है तथा प्रयोग करना भी सरल होता है। नियंत्रित रूप से प्रयोग करने पर ये कीटनाशक कृषकों, श्रमिकों या उपभोक्ताओं के लिये किसी भी तरह से हानिकारक नहीं होते हैं।

2.उन्नतशील बीजों के प्रयोग
कृषि में उन्नतिशील प्रजातियों के उच्च गुणवत्तायुक्त वाले बीजों का विशेष महत्तव होता है। अधिक उत्पादन के लिये जैविक तकनीक के माध्यम से विभिन्न प्रकार की नई प्रजातियों के बीजों का उत्पादन किया जा रहा है। नवीनतम प्रजातियों के उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीजों के प्रयोग से लगभग 20-30 प्रतिशत उत्पादकता में की वृद्धि की जा सकती है। कृषकों द्वारा अपने खेत के बीजों कई वर्षों तक लगाइतार बुवाई करने से उनकी आनुवंशिउक शुद्धता एवं उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नवीन पौध प्रजनन विधियों के माध्यम से उच्च पोषक तत्वों से युक्त, दालों में प्रोटीन की प्रचुरता, गेहूँ के बेहतर पकने की गुणता, फलों एवं सब्जियों की संरक्षण की विशेषता तथा अधिक तेल का निर्माण करने वाली फसलों के बीजों का उत्पादान किया जा रहा है। जैव प्रौद्योगिकी का बीज उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है, इस तकनिकी से प्रतिरोधी किस्म के बीजों का विकास किया जा रहा है जिनमें विभिन्न प्रकार के बीमारियों, कीटों, गर्मी, सर्दी, खारेपन, बर्फ, सूखे इत्यादि से बचाव की क्षमता होती है।

3. सिंचाई सुविधाओं का विकास
कृषि क्षेत्र में सिंचाई की सुविधाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। कुल सिंचित क्षेत्रफल के आधे से अधिक भाग पर सिंचाई के छोटे साधनों- कुओं, तालाबों, झीलों, जलाशयों, बाँधों, नलकूपों, मिट्टी के कच्चे बाँधों, नलों तथा जल स्रोतों द्वारा सिंचाई की जाती है। शेष भाग की सिंचाई बड़े साधनों, जैसे- नहरों एवं नालियों आदि के माध्यम से की जाती है। उन्नत सिंचाई साधनों के इस्तेमाल से किसान समय, श्रम व पानी की बचत कर सकतें हैं तथा इससे पोधों का उचित मात्रा में जल मिलने से उनका विकास भी बेहतर होता है। कतार सिंचाई, फुहार सिंचाई, टपक सिंचाई तथा रेन गन सिंचाई आदि विधियों का प्रयोग करके जल संसाधनों का समुचित किया जा रहा है। सीमित पानी की उपलब्धता के कारण वैकल्पिक फसलों या नई फसल प्रणालीयों के प्रयोग से फलों एवं सब्जीओं का उत्पादन करके किसान अपने उपज का अधिक मूल्य प्राप्त कर रहें हैं।

4. आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रयोग
विकासशील देशों में कृषि गतिविधीयां मुख्य्त: कामगारों पर निर्भर करती हैं, ग्रामीणों का बड़ी संख्या में शहरों की ओर पलायन होने के कारण कृषि श्रमिकों की संख्या में भारी कमी है। कृषि विकास में आधुनिक कृषि उपकरणों, जैसे- हल, ट्रैक्टर, थ्रेसर, कम्बाइन हार्वेस्टर, हैप्पी सीडर, रेज्ड बेड प्लांटर, मल्टीक्रॉप प्लांटर, ऊर्जा संचालित व ट्रैक्टरों द्वारा छिड़काव के उपकरण, बुवाई करने वाली मशीनें, ट्रॉलियां तथा डीजल एवं बिजली के पम्पसेटों आदि के महत्वपूर्ण योगदान से कृषि क्षेत्र के उपयोग एवं उत्पादकता में वृद्धि हुई है।

मशीनीकरण द्वारा अधिक भूमि क्षेत्रों पर कृषि से संबंधित क्रियाएं बहुत कम समय में संभव है तथा कृषि उत्पाद जल्द ही बाजार पहुँच जाता है। जीरो टिलेज सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल से धान कटाई के उपरांत बिना खेत की तैयारी किए सीधे गेहूं की बुवाई से 85 प्रतिशत समय व 90 प्रतिशत डीजल की बचत होती है। अच्छे मृदा स्वास्थ्य एवं अधिक फसल पैदावार के लिए भूमि समतलीकरण अति आवश्यक तथा लेजर लेवलर की सहायता से भूमि का समतलीकरण करना सुविधाजनक रहता है। गन्ना रेकर एवं बेलर से पत्तियों के जलाने से होने वाले प्रदूषण भी रोका जा सकता है। धान की कटाई के उपरांत खेत में खड़ी फसल के अवशेषों को हटाने में बेलर मशीन का उपयोग से प्रायः जलाकर नष्ट किए जाने वाले इस बायोमॉस को बेल बनाकर ईंधन के रूप में व अन्य औद्योगिक जरूरत के रूप में उपयोग कर अतिरिक्त लाभ कमाया जा सकता है। कम्बाइन हार्वेस्टर से फसल कटाई के उपरान्त स्ट्रारीपर यंत्र से खेत से फसल अवशेषों को एकत्र कर पशुओं के लिये भूसा बनाया जाता है जो पर्यावरण संरक्षण में सहायक होता है।

5. जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका
कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी की उपयोगिता बढ़ने से ‘रासायनिकरण’ का स्थान ‘अनुवांशिकी अभियांत्रिकी’ ने ले लिया है, जिसमें बीज के नई किस्मों के उत्पादन का प्रमुख स्थान है। जैव अभियांत्रिकी द्वारा नए पौधों में जैविक तथा गैर-जैविक प्रतिबल का सामना करने की क्षमता अधिक होने के साथ-साथ फसलों की पैदावार भी अधिक होती है। जैव प्रौद्योगिकी विधि से प्रतिकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों के बीजों की नई किस्मों के उत्पादन की बेहतर सम्भावनाएं हैं। आधुनिक अनुवांशिकी अभियांत्रिकी ने सम्भावनाओं के नए द्वार खोल दिये हैं, जिससे कृषि अनुसंधान में इसकी लाभप्रदता बढ़ गई है। जैव प्रौद्योगिकी से अनेक तरह के विकल्प उपलब्ध होने के फलस्वरूप कृषि वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों को सामूहिक योगदान की दिशा में प्रयास करना आवश्यक है।

6. प्रसंसकरण एवं भंडारण तकनिकी
अधिक फसल उत्पादन के बाद कृषि उत्पाद को सुरक्षित रखना सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। खाद्य प्रसंस्करण की महत्ता को देखते हुए देश में पहली बार खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय का गठन किया है। खाद्य प्रसंस्करण को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने बजट 2018-19 में खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के लिए 1,400 करोड़ रू. आवंटित किये हैं। खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने के लिए सभी 42 मेगा फ़ूड पार्क में अत्याधुनिक परीक्षण सुविधा स्थापित की जा रही है। कृषि आय बढ़ाने के लिए डेयरी, पशुपालन, मत्स्य, मुर्गी पालन इत्यादि के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है। किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा का विस्तार मत्स्य एवं पशुपालन करने वालों तक कर दिया गया है। इसके लिए सरकार ने प्रशिक्षण, सहायता और अनुदान देने की व्यवस्था की है, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के जरिये महिलाओं को ग्रामीणों आजीविका कार्यक्रम के अंतर्गत स्वाबलम्बी बनाने के प्रयास किया जा रहा है। टमाटर, आलू और प्याज जैसी शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों की कीमतों को अनिश्चितता से बचाने के लिए “ऑपरेशन फ्लड” की तर्ज पर “ऑपरेशन ग्रीन” योजना शुरू की गई है। ऑपरेशन ग्रीन के द्वारा किसानों, उत्पादक संगठनों, कृषि संभार तंत्र, प्रसंस्करण सुविधाओं, व्यवसाय प्रबंधन में सामंजस्य स्थापित किया जा रहा है। कृषि उत्पादों की विपणन प्रणाली में सुधार के लिए “ई-पोर्टल” एवं “ग्रामीण कृषि बाजार” को स्थापित किया जा रहा है, जो कि कृषि विपणन प्रणाली की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इससे किसान घरेलू स्तर पर उपलब्ध कृषि उत्पाद का मूल्य संवर्धन कर अधिक लाभ सकते हैं।

7. डिजिटल कृषि प्रौद्योगिकी
सुरक्षित, पौष्टिक एवं किफायती भोजन उपलब्ध कराने के साथ ही खेती को सामाजिक, आर्थिक तथा पर्यावरणीय रूप से लाभदायक व टिकाऊ बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग को डिजिटल कृषि के नाम से जाना जाता है। फसलों की उत्पादकता बढ़ाने तथा खेती को सक्षम व लाभदायक बनाने के लिए आधुनिक तकनीकियों और सेवाओं का उपयोग किया जा रहा है। कृषि प्रसार, मत्स्य पालन, बागवानी, पशु पालन, भूमि अभिलेख आदि प्रमुख क्षेत्रों में डिजिटल प्रौद्योगिकी के उपयोग से कृषि विकास को नवीन आयाम मिला है। किसान अब कृषि से संबंधित समस्याओं का समाधान के लिए नई कृषि विधियों को सीखने और दुनिया भर में हो रहे कृषि प्रयोगों के बारे में जानकारी के लिए फेसबुक, व्हॉट्सऐप, यूट्यूब, सीडी जैसे साधनों का उपयोग कर रहे हैं।

भारत में आज भी अधिकतर खेती मौसम आधारित है, लेकिन किसान घर बैठे कृषि वैज्ञानिकों के बताए तरीकों से इन समस्यायों से निपट रहे हैं। किसान सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल से फसलों की रोपाई, बीज शोधन व कटाई आदि के लिए नयी कृषि तकनीकीयों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। कृषि जलवायु यानी खेती के लिए अनुकूल मौसम आधारित अध्ययन के जरिए जरूरी सूचना, फसलों के बारे में उनकी मांग और आपूर्ति की जानकारी, समूचे देश के मंडीयों में फसलों के मूल्य बारे में समुचित सूचना मिल जाती है।

नवीनतम प्रौद्योगिकियां द्वारा विशेषज्ञों की सहायता के बिना ही क्षेत्रीय जलवायु तथ आर्थिक विशेषताओं का सही विश्लेषण हो जाता है। उपग्रहों से प्राप्त आकड़ो तथा पथ प्रदर्शक उपकरणों के उपयोग से सभी क्षेत्रों का पूरा अवलोकन करके फसलों के लिए उत्तम योजना बनाना, वित्तीय नियोजन, खनिज उर्वरकों और पौध संरक्षण के उत्पादों की लागत को कम किया जा सकता है। जिन किसानों को ठीक से पढ़ना नहीं आता वे भी वीडियो को देखकर और सुनकर खेती के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। किसानों के लिए कई ऐप्स हैं जिनसे खेती से जुड़ी हर जानकारी पलक झपकते ही मिल जाती है।

(ब) कृषिक कार्यकलापों का पर्यावरण पर प्रभाव

आधुनिक कृषि पद्धतियां वैश्विक तापमान वृद्धि का एक कारण है। संयुक्त राष्ट्र के “सहस्राब्दी पारिस्थितिकी तंत्र मूल्यांकन” संकलन प्रतिवेदन के अनुसार “कृषि जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा है”। विश्व भविष्य परिषद के अनुसार, कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 14 प्रतिशत के लिए कृषि प्रत्य्क्ष रुप से उत्तरदायी है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. रतन लाल के अनुसार, “पिछले 150 वर्षों में, अनुचित कृषि एवं चराई प्रथाओं के कारण 476 अरब टन कार्बन कृषि योग्य भूमि से उत्सर्जित हुआ है, जबकि इसकी तुलना में केवल 270 गीगावाट जलने वाले ईंधन से निकले हैं”। जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय पैनल (IPCC, 2013) के अनुसार, कृषि, वनीकरण और भूमि-उपयोग की पद्धति में परिवर्तन, मानव-प्रेरित ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का 25 प्रतिशत जितना हिस्सा है। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने तथा उपज बढ़ाने के लिए, हमने उन कृषि पद्धतियों को अपनाया है जिनका पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ता है तथा प्राकृतिक संसाधनों का शोषण होता है।

1. मृदा एवं जल पर प्रभाव
आधुनिक कृषि में अत्यधिक जल आपूर्ति के कारण खेत के ऊपर की उपजाऊ मिट्टी का निष्कासन हो जाता है, जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों की कमीं होने लगती है, तथा मिट्टी की उर्वरता शक्ति में कमी के कारण फसल की उत्पादकता कम हो जाती है। अधिक जल आपूर्ति के कारण मृदा से वायुमंडल में कार्बन का उत्सर्जिन होने से वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है।

अत्याधिक नाइट्रोजन उर्वरक के प्रयोग से मिट्टी में नाइट्रेट का स्तर बढ़ जाता है जो भूमिगत-जल को प्रदूषित कर देता है। अत्याधिक जल आपूर्ति से जल-जमाव हो जाता है तथा मिट्टी में लवणता बढ़ जा से उत्पादकता में कमीं हो जाती है। जब जलाशय या जल श्रोत में कृत्रिम या गैर-कृत्रिम पदार्थों जैसे नाइट्रेट्स और फॉस्फेट की मात्रा अधिक होना सुपोषण (Eutrophication) कहलाता है, इस समृद्धकरण से जल में बायोमास अत्याधिक हो जाता तथा जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है इसका जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अधिक सिंचाई के कारण भूमिगत जल में कमी होने से मिट्टी तथा पानी का आपसी पारिस्थितिक तंत्र अंसतुलित हो जाता है|

2. जैव विविधता पर प्रभाव
जैव विविधता प्रकृतिक गुण है तथा पारिस्थितिक तंत्र के स्थायित्व का आधार है। पृथ्वी पर उपस्थित सभी पौधे, पशु-पक्षी व विविध प्रकार के अति सूक्ष्म जीव हमारी धरती की जैव विविधता हैं। हरित क्रांति एवं औद्योगिक क्रांति का तेजी से विस्तार, अधिक पशुधन उत्पादन, मत्स्य पालन तथा जलीय संवर्धन, एक फसली फसलें, पालतू पशुओं की सीमित संख्या तथा कुछ मछलीयों एवं जलीय प्रजातियों का संवर्धन किया जा रहा है। लगभग 90 प्रतिशत से अधिक फसलों की किस्में खेतों से विलुप्त हो चुकी हैं। पारम्परिक धान के खेतों में केवल धान ही नहीं, वरन मछलियाँ व मेढ़क जैसी अनेक जैव-विविधताएँ पायी जाती थीं, जो कई समुदायों, विशेषकर आदिवासियों के आहार का हिस्सा थीं। रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के प्रयोग ने इस जैव-विविधता को लगभग समाप्त कर दिया है। कई घरेलू जीवों की लगभग आधी प्रजातियाँ समाप्त हो चुकी हैं।

किसानों के मित्र केंचुए व लाभदायक सूक्ष्म जीव भूमि में अधिक क्षार की मात्रा होने से धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं तथा रासायनिक खादों के अंधाधुंध उपयोग से खेती की लागत भी बढ़ती जा रही है। विभिन्न वैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि कृषि रसायनों के अत्यधिक उपयोग से जहाँ एक ओर पौधों तथा सूक्ष्म जीवों की विशिष्ट विविधता नष्ट हो रही है, वहीं दूसरी ओर फसलनाशी कीटों के प्राकृतिक दुश्मनों की विविधता में भी कमी आ रही है तथा साथ ही हानिकारक कीटों की विविधता में भी वृद्धि हो रही है।

3. खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव
पेड़-पौधों पर सभी प्राणी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जीवित रहने के लिए किसी न किसी रूप मंर आश्रित होते हैं। पेड़-पौधे, सूर्य की उर्जा का उपयोग करके, प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से भोजन बनाते हैं तथा उत्पादक कहलाते हैं। शाकाहारी जंतु वनस्पतियों को भोजन के रूप में खाते हैं तथा अपनी वृद्धि एवं अस्तित्व के लिए पेड़-पौधों पर ही निर्भर रहते हैं, इनको प्राथमिक उपभोक्ता कहते हैं। माँसाहारी प्राणी, शाकाहारी प्राणियों को खाते हैं तथा पूरी तरह शाकाहारी प्राणियों पर ही निर्भर रहते हैं, इन्हें द्वितीय उपभोक्ता कहते हैं। इस प्रकार सभी शाकाहारी प्राणियों पर ही निर्भर रहते हैं तथा आपस में सम्बद्ध हैं, इस क्रम को “खाद्य श्रंखला” कहते है। प्रकृति में एक प्राकृतिक संतुलन स्थापित है, और हर स्तर पर संतुलन इस खाद्य श्रंखला को प्रभावित करता है।

कृषि रसायनों का उपयोग शत्रु तथा मित्र कीटों की संख्या को एक समान प्रभावित करता है। मनुष्य इस खाद्य श्रंखला के शीर्ष पर है इस कारण वह सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के माध्यम से भोजन में भारी धातुओं का प्रवेश होता है जो हमारे शरीर के लिए घातक हैं। जब रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है तो ये सारी जमीन, जल व वातावरण में फैल जाते हैं। बारिश कुछ कीटनाशी जहरों को पानी में बहाकर ले जाती है तो तालाबों एवं बड़े जलाशयों में मिल जाते हैं, जहाँ छोटे-बड़े पौधे तथा जीव-जन्तु इस जहर को खा लेते हैं जिससे ये जहर इनके शरीर में एकत्रित हो जाते हैं। इन जीवों को छोटी मछलियाँ खाती हैं। इन छोटी मछलियों को बड़ी मछलियाँ खाती हैं। बहुत सारी बड़ी मछलियों को बड़े जीव-जंतु एवं पक्षी जिनका आहार मछलियाँ हैं, खातें हैं। इस प्रकार कीटनाशी रसायन पक्षियों एवं बड़े जन्तुओं के शरीर में चले जाते हैं जिससे इनका स्वास्थ्य बिगड़ता है तथा कुछ जीवों की मृत्यु भी हो जाती है।

4. परागकणकर्ता जीवों पर प्रभाव
कीट एवं अन्य परागणक जीव भोजन, रेशों, खाद्य तेलों, दवाओं तथा अन्य उत्पादों के लिए स्वस्थ फसलों के उत्पादन में महत्वपूर्ण होते हैं। परागकणकर्ता समूह पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण घटक है। पीड़कनाशकों का फसलों पर बहुतायत उपयोग से तितलियों, मधुक्खियों तथा परागकण वाहको की संख्यां में निरंतर कमीं हो रही है। परागकणकर्ताओं का कृषि तंत्र में बहुत बड़ा योगदान है, ये परागकण के द्वारा उत्पादकता बढ़ाते हैं तथा फलों एवं बीजों की किस्म सुधार व विस्तार में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फसलों पर कृषि रसायन परागकण वाहकों के न केवल प्रजनन तंत्र पर बुरा प्रभाव डालते हैं बल्कि मकरंद/मधुरस को भी प्रदूषित करते हैं। ये घातक रसायन पौधों में परागकण वाहक मधुमक्खियों एवं तितलियों आदि की प्रजनन प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, जिनसे परागकण हेतु महत्वपूर्ण इन कीटों की संख्या में तीव्रता से कमी हो रही है।

5. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
वर्तमान समय में खेती मूल रूप से कृषि रसायनों जैसे रासायनिक खादों, कीटनाशकों, खरपतवार नाशी, फुफंदनाशी तथा फसल बढ़ाने वाले हार्मोन इत्यादि पर निर्भर है। लगभग सभी कृषि रसायन पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं, तथा हमारे एवं हमारे पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होते हैं। वे हमारे पारिस्थितिकीय संतुलन पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं। भूमिजल में नाइट्रेट का स्तर 25 mg/L से अधिक होने पर शिशुओं में ब्लू बेबी सिंड्रोम (Blue Baby Syndrome) नामक गंभीर बीमारी हो सकती है। सभी रासायनिक पीड़कनाशकों का मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं। निरंतर कृषि रसायनों के उपयोग से अनेकों बीमारियाँ उत्पन्न हो रही है। कृषि रसायनों से होने वाली कुछ प्रमुख बीमारियाँ जैसे- अपच, विविध चर्मरोग, प्रजनन तंत्र का विकार, कैंसर, बांझपन, यादाशत का घटना, सिर दर्द, चक्कर आना, उबकाई, दृष्टि दोष, श्वास रोग तथा तंत्रिका तंत्र बुरा प्रभाव इत्यादि है।

मानवीय स्वास्थ्य एवं किसानों के हितों की रक्षा को ध्यान में रखते हुए “कीटनाशी प्रबंधन विधेयक, 2019” का मसौदा तैयार हो चुका है। भारतीय दृष्टिकोण “जीवो जीवस्य भोजनम्” यानी प्रकृति के सह-अस्तित्व के सिद्धांत के को अपनाने की आवश्यकता है। हमें पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक कृषि प्रणाली में सन्निहित समेकित कीट प्रबंधन तथा जैविक कीटनाशकों को प्रोत्साहन और प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

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