कहानी नन्हे शेरू की- एक अंधा तेंदुआ शावक

 कहानी नन्हे शेरू की- एक अंधा तेंदुआ शावक

डॉ राकेश कुमार सिंह,वन्यजीव विशेषज्ञ हैं ।साहित्य में गहरी अभिरुचि रखते हैं ।

माँ मुझे बचा लो, मां तुम कुछ बोलती क्यों नहीं, तुम कहाँ हो मां, मुझे कुछ भी दिखाई क्यों नहीं पड़ रहा, मेरे छोटे भाई बहन की आवाज़ क्यों नहीं आ रही, मुझे ये लोग मार डालेंगे मां।“ शायद यही शब्द निकलते नन्हे शेरू के मुख से, यदि उस बेज़ुबान तेंदुए शावक को बोलने की क्षमता होती।
ठीक एक वर्ष पहले मई 2019 में जब एक छोटे से लगभग पांच से छः माह के तेंदुए शावक को पिंजरे से निकाला जा रहा था तो जैसे उसे कुछ सूझ ही नहीं रह था। एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे में जाते समय वह पिंजरे की सलाखों से टकरा रहा था। उसकी गर्दन झुकी हुई थी और उसका सिर लगातार हिल रहा था। उसकी आंखों के सामने हाथ हिलाने पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। जी हाँ, आपका सोचना सही है। निर्दोष शावक अंधा हो चुका था, उसे खतरनाक स्तर तक अंदरूनी चोटें आई थीं। यहां तक कि उसके सिर की गतिविधियां तक उसके स्वयं के नियंत्रण में नहीं थीं। वह दर्द से कराह रहा था। उस दिन मैंने देखा कि सचमुच उसकी आँखों में रोशनी नहीं आँसू थे।
किसी तरह मासूम शावक को पिंजरे में रखकर अस्पताल लाया गया। उसकी तेजी से चल रही सांसे और बढ़ी हुई धड़कनें इशारा कर रही थीं कि वह किस कदर डरा हुआ है। पिंजरे के अंदर उसे इलाज़ के लिए कसना (मांसाहारी वन्यजीवों को उपचार हेतु स्क़वीज़र पिंजरे में कस दिए जाने से वह हिल नहीं पाता व आसानी से उपचार किया जा सकता है) सम्भव नहीं था। क्योंकि अंदरूनी चोटों से वह भयानक पीढ़ा महसूस कर रहा था। शावक इतना छोटा भी नहीं था कि उसे पिंजरे से बाहर निकाल कर इलाज़ किया जा सके।
शावक का दर्द बढ़ता जा रहा था। मैं जानता था यदि उसे उपचार न मिला तो भयंकर पीढ़ा उसकी जान ले लेगी। तभी हमें लगा कि शावक आँखों की रोशनी तो खो ही चुका है। ऐसे में यदि उसके पिछले पैरों को पकड़ के तुरंत तेजी से इंजेक्शन लगा दिये जाएं तो उसके आत्म रक्षक वार से बच जा सकता है। यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि इस उम्र के तेंदुए शावक के नाखून व दांत काफी विकसित हो चुके होते हैं और उनके एक वार से खून की धारा बह सकती है। मैंने अविलम्ब सावधानी से उसके पिछले पांव को खींच कर दर्दनिवारक दवा उसकी मांसपेशियों में पहुंचा दी।
शावक को सम्भवतः लाठी डंडे से पीटा गया था। ऐसे में आवश्यक था कि शावक को एकांत में रखकर मनुष्य की आवाज़ से दूर रखा जाए जिससे कि उसके अंदर से मनुष्य के प्रति नफरत व डर दोनों कम हों। शावक को पिंजरे में एकांत में रखकर एक पर्दे से ढक दिया गया। उसके डिहाइड्रेशन का स्तर काफी अधिक हो चुका था। वह कुछ भी खा-पी सकने में असमर्थ था। किसी तरह मैंने व अन्य चिकित्सकों ने उसकी पूंछ से उसे एक बोतल डेक्सट्रोज चढ़ाया।
अगले दिन भी शावक निढाल पड़ा था। शावक ने खाना तो दूर, पानी भी नहीं पिया। तमाम प्रयासों के बावजूद शावक की हालत बिगड़ने लगी। उसके सिर का हिलना और बढ़ गया। वह बार-बार गिर पड़ रहा था। यदि उसने मुंह से खाना नहीं खाया तो मुश्किलें और बढ़ सकती थीं। ऐसे में जब-जब शावक मुंह खोलता तो एक सीरिंज में चिकेन का शोरबा भरकर उसके मुंह में पिचकारी के रूप में पहुंचाया जाने लगा। यह कार्य अत्यंत थकाने वाला था। लेकिन शावक की हालत देखकर हम सब पुनः-पुनः प्रयास करते रहे। कभी-कभी मुझे स्वयं लगा कि यह सब मेहनत व्यर्थ होने वाली है। लेकिन मासूम शावक की बेजान आंखें जैसे कुछ कह रही होती थीं। कई दिनों तक यही सिलसिला बदस्तूर चलता रहा। इससे इतना ज़रूर हुआ कि शावक की हालत स्थिर होने लगी।
लेकिन सिर्फ दवाओं व शोरबे के सहारे किसी मरीज को लम्बे समय तक ज़िंदा रख पाना सम्भव नहीं था। हमें कुछ न कुछ करना था कि वह मांस के टुकड़े खाये। परन्तु शावक के मुंह खोलते ही उसके मुंह में मांस के टुकड़े फेंकने पर भी वह उसके मुंह से गिर जा रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वह खाना तो चाहता है परंतु उसका अपने मुंह की मांसपेशियों पर नियंत्रण न होने से टुकड़े खुद-ब-खुद गिर पड़ते हैं। तय हुआ कि इससे भी छोटे मांस के टुकड़ों को उसके अंधेपन का फायदा उठा कर पास से मुंह में इस प्रकार फेंका जाए कि वह उसके गले तक सीधा पहुंचे। यह कार्य जोखिम भरा था क्योंकि शावक इतना छोटा भी नहीं था कि उसके दांतों से चोट न पहुंचे। कई प्रयासों के बाद कुछ टुकड़े उसके गले तक पहुंचे व उन्हें वह निगलने भी लगा। अब उसे सीरिंज से पानी व शोरबा पिलाना और जब वह मुंह खोले तो गले तक किसी तरह मांस के टुकड़े फेंक कर पहुंचाना, प्रतिदिन का कार्य हो गया।
शावक अब समझने लगा था कि यह सब उसे बचाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। अब वह स्वयं हम सबकी आवाज़ से मुंह खोलने का प्रयास करने लगा था। परन्तु अकसर उसके मुंह से मांस के टुकड़े गिर पड़ते थे। जिन्हें वह अंधा शावक जब ढूंढने के प्रयास करता था, तो सबकी आंखें नम हो जाती थीं। इसलिए यह प्रक्रिया दिन में कई घण्टे करनी पड़ती थी। उसके इस नाज़ुक हालत में भी रोग से लड़ने के जज़्बे को देखते हुए सब उसे शेरू बुलाने लगे। कुछ ही दिनों में वह अपने नाम पर प्रतिक्रिया भी देने लगा। एक दिन अनजाने में मेरा हाथ उसके मुंह के पास रह गया तो वह उसे चाटने लगा। यही प्रक्रिया उसने अपने कीपर के साथ की और उससे पिंजरे के बाहर पंजे निकाल कर घावों पर मरहम लगवाने लगा।
शेरू ठीक तो हो रहा था। लेकिन एक अंधा तेंदुआ पूरा जीवन कैसे जीयेगा यह यक्ष प्रश्न मुझे बार-बार परेशानी में डाल देता था। उसकी आँखों में तमाम दवाइयों को डालने से भी कोई खास फर्क नज़र नहीं आ रहा था। हाँ, इतना अवश्य था कि वह आवाज़ की दिशा में देखने का प्रयास करता था। अंधेरे में टार्च की रोशनी की ओर वह आंखें घुमाने लगा था। तभी मेरे एक विचार आया कि शावक की आँखों की ज्योति जाने का कारण आंखों की नसों का क्षतिग्रस्त होना हो सकता है। केवल दवाओं से रोशनी वापस आना सम्भव न था। अतः तय हुआ कि शेरू की आंखों के सामने पिंजरे के बाहर से चुटकी बजाते हुए इधर उधर घूमा जाये। ताकि आवाज़ की दिशा में देखने के प्रयास में उसके आंखों की कसरत हो सके। यह प्रक्रिया काम करने लगी। धीरे-धीरे शेरू के आंखों की रोशनी लौटने लगी। इसका यह भी फायदा हुआ कि वह किसी तरह अपना खाना पानी भी स्वयं लेने लगा।
अब शेरू की 80 प्रतिशत से अधिक ज्योति वापस आ चुकी है। शेरू को समय ने एकदम शांत और एकांतवासी बना दिया है। वह किसी को देखकर कभी भी गुर्राता नहीं। शेरू ने स्वयं को ठीक करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने कभी हमें अनावश्यक परेशान नहीं किया। यहां तक कि वह इंजेक्शन भी बड़ी आसानी से लगवा लेता था। अब वह केवल उन्हीं लोगों के बुलाने पर आता है, जो उसके इलाज के समय उसके पास रहे। लेकिन किसी अनजान को देखते ही छिप जाना, स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है कि वह कुछ अनजान क्रूर हाथों की उन हरकतों को अभी भी भूला नहीं सका है।
आज शेरू डेढ़ वर्ष का हो गया है। लेकिन उसके और मेरे बीच का यह अटूट बन्धन और मेरे प्रति शेरू का स्नेह तथा उसकी आँखों में भरी कृतज्ञता को शब्दों में व्यक्त कर पाना सम्भव नहीं है।
वह शेरू जिसे आज जंगल की पगडंडियों को नापना था। वह शेरू जिसे अपना स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित करना था। वह शेरू जो एक ही वार में अपने से दोगुने शिकार को धराशायी कर सकता था। वह शेरू जिसे आज उन्मुक्त विचरण करना था। वह आज उम्रभर सलाखों के पीछे किसी अन्य के दिये मांस के टुकड़ों पर निर्भर है। यह वह न्याय है जहां न चाहते हुए भी सजा बेगुनाह को मिलती है और मुलजिम आज़ाद घूमते हैं।

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