कहानी संग्रह “एयर पोर्ट पर एक रात ” की समीक्षा

 कहानी संग्रह “एयर पोर्ट पर एक रात ” की समीक्षा

समीक्षक : अशोक वर्मा भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं और वरिष्ठ कवि एवं लेखक हैं।

तेज प्रताप नारायण का कहानी-संग्रह “एयरपोर्ट पर एक रात” पढ़ा। यह संग्रह जीवन का दस्तावेज़ है। इसमें स्त्री है, पुरुष है और थर्ड जेण्डर भी है; बचपन है, जवानी है, वृद्धावस्था भी है; गाँव है, नगर भी है; जीवनमूल्यों का अवमूल्यन है, भ्रष्टाचार है, प्रदूषण भी है। संग्रह की पहली कहानी ‘लंगड़ी बहू‘ अत्यंत मार्मिक है। इस कहानी में 1980 ई. के पूर्व के ग्रामीण जीवन की सही तस्वीर है। शादी के समय लड़की और लड़के के शारीरिक दोष छुपाना, जन्म से लड़की को बोझ समझना, लड़कियों की शारीरिक-मानसिक ऐसी विकृतियों का, जिनके सफलतापूर्वक इलाज़ संभव थे, भी इलाज़ न कराना, लिंगाधारित भेदभाव करना आदि प्रवृत्तियों का इस कहानी में सशक्त ढंग से उद्घाटन हुआ है। ‘फेसबुक और डियर वैलेंटाइन‘ में महिला उत्पीड़न के दूसरे पक्ष को दिखाया गया है। प्रसून की सहज और स्वाभाविक भावनाएँ सामान्य नवयुवक की भावनाएँ हैं। फिरभी प्रिया द्वारा प्रसून को फ्रेण्ड रिक्वेस्ट के लिए महिला उत्पीड़न संबंधी नोटिस भेजवाना अस्वाभाविक प्रतीत होता है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘एयरपोर्ट पर एक रात’ में हवाईयात्रा संबंधी जानकारी की कमी से उपजी विकट समस्या से जूझ रहे शान्तनु को अचानक अपने पुराने प्यार वंदना का दिख जाना फिल्मी लगता है। इस कहानी में तनाव, ख़ुशी और आनंद का सुन्दर वर्णन है।
गुप्त प्रसाद‘ में धार्मिक श्रद्धा, आस्था और अंधभक्ति का बहुत ही स्वाभाविक चित्रण है। बिट्टू की अस्वस्थता को दूर करने के लिए माँ-बाप की बेचैनी उनको बाबा की शरण में लाती है। अंधभक्ति में उन्हें बाबा के आडम्बर, विलासिता और कुटिल इरादे दिखाई नहीं पड़ते, परन्तु भारती के धैर्य, समझदारी और सूझबूझ से बाबा के तिलिस्म का भंडाफोड़ हो जाता है। इस कहानी में पारिवारिक संबंधों की गहनता भी उजागर हुई है। ‘ज़िंदगी का दूसरा अध्याय’ में देश के एक हिस्से में प्रचलित उस परंपरा का, जिसमें नवयुवकों का अपहरण करके उनकी बलात् शादी कर दी जाती है, वर्णन है। कहानी के नायक विक्रम की शादी अपहरण करके बलात् करा दी जाती है। अपने साथ घटित इस घटना का प्रतिशोध लेने के लिए वह लड़की को विवाह के बाद नैनीताल घुमाने ले जाता है, शारीरिक संबंध बनाता है, बाद में विदा कराने को कहकर वापस चला जाता है, विदा कराने के झूठे वादे करता है और विदा कराने नहीं आता। अंत में गोपिका जब अपने पिता के साथ उसके पास पहुँचती है और पाती है कि विक्रम नूतन के साथ शादी करके रह रहा है, तब वह अत्यंत दुःखी होती है और उसके पिता को अपने कृत्य का, अपहरण करके बलात् शादी कराने का, पछतावा होता है। गोपिका के सामने जीवन का दूसरा अध्याय प्रारंभ करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता। ‘मैं हूँ न’ में रियल एस्टेट में ठगी के गोरखधंधे, रिश्तों की छीजन और नौकरीपेशा लोगों की कशमकश का यथार्थ वर्णित है। प्रकाश न चाहते हुए भी बिल्डर के चुंगल में फँसता चला जाता है और अंत में, जिस फ्लैट के लिए वह इतना सब झेलता और खर्च करता है, पाता है कि वह भी पहले से ही किसी और के नाम है।
जज साहिबा’ न्यायालयों की वर्तमान स्थिति की यथार्थ तस्वीर है। न्यायालयों के सभी कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के लिए वहाँ विद्यमान व्यवस्था सबसे उपयुक्त है, क्योंकि केवल मुवक्किल के हित छोड़कर यह व्यवस्था अन्य सभी के हित साधती है। आदर्शवादिता, ईमानदारी, कर्मठता, पारदर्शिता, तत्परता, सचाई, न्याय आदि का इस व्यवस्था में कोई मूल्य नहीं है। विभा चौधरी इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। कहानी का कथ्य और कथानक दोनों बहुत अच्छे हैं। ‘अद्भुत‘ एक ऐसे बच्चे की कहानी है, जो थर्ड जेण्डर है। विजय, उसकी पत्नी सारिका और उसके पिता अपने परिवार में अद्भुत के आगमन पर लैंगिक समानता का समर्थन करते हुए उसको सामान्य बच्चे की तरह पालते हैं। यह कहानी बदलते सामाजिक दृष्टिकोण को दृढ़ता से दर्शाती है। ‘दद्दा जी’ वृद्धावस्था की कहानी है। ‘लंगड़ी बहू’ के समय की समाज के संस्कार इसमें भी प्रकट होते हैं। बिना दद्दा की इच्छा के उनकी शादी कर दी जाती है और वे अपनी पत्नी को वह सम्मान तथा प्यार नहीं दे पाते, जो पत्नी को मिलना चाहिए था। धीरे-धीरे पत्नी अपनी स्थितियों से समझौता कर जीना सीख लेती है। लेकिन वृद्धावस्था में अपने पति से वह उसी प्रकार दूर रहती है, जिस प्रकार जवानी में पति उससे दूर भागते थे। अंत में दद्दा के हालात की अनुभूति दद्दी को होती है और वे दोनों एक-दूसरे को मानसिक संबल प्रदान करने लगते हैं। ‘मन की आवाज़‘ ग्लोबलाईजेशन और बदलते जीवनमूल्यों की कहानी है। पिता अपनी बेटी के एक बड़ी कम्पनी में नौकरी लग जाने से ख़ुश नहीं है, क्योंकि उसे आशंका है कि उसकी बेटी काॅरपोरेट कल्चर के मकड़जाल में फँसने के बाद निकल नहीं पाएगी।
धरती कहे पुकार के’ मानव द्वारा प्रकृति के अविवेकपूर्ण दोहन की कहानी है। अविवेकपूर्ण मानवीय दोहन के परिणामस्वरूप प्रकृति का संतुलन दिन प्रतिदिन बिगड़ रहा है। प्रलय का आना और संपूर्ण संसाधनों का धरा रह जाना तथा सुनीता एवं उसके बच्चों का कालकवलित हो जाना, आदमी को इस संबंध में सोचने के लिए विवश करती है। ‘रिश्तों का समीकरण’ वैवाहिक जीवन में होनेवाली उथल-पुथल की कहानी है। राज और प्रिया शादी पूर्व एक साल तक कोर्टशिप में रहे, लेकिन वे एक-दूसरे को नहीं समझ पाए। शादी के बाद उनके बीच तकरार चलती रहती है। प्यार की परीक्षा में असफल होने के भय से राज सभी मानसिक प्रताड़नाएँ झेलता रहता है। ‘चंपा‘ एक वेश्या की वृद्धावस्था की कहानी है। कहानी में चंपा, उसकी मौसी और उसकी बाँदी झुमकी तीन चरित्र हैं और उन्हीं के अतीत और वर्तमान का वर्णन है। ‘ज़मीन’ गाँव के वर्तमान के यथार्थ का चिट्ठा है, जिसमें ईर्ष्यालु दया राम, गाँव की राजीति, पुलिस और ग्रामप्रधान एक सीधे और सज्जन ग्रामीण राम लाल को अपराधी बना देते हैं। यह कहानी गाँव के सच का दस्तावेज़ है। ‘किचेन सेट’ एक छोटे बच्चे की मासूमियत की कहानी है, जिसमें वह अपना खिलौना किचेन सेट बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए दे देता है।
“एयरपोर्ट पर एक रात” तेज प्रताप नारायण जी का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह में उनकी लेखकीय प्रौढ़ता दिखायी देती है। वर्तमान जीवन की उनकी समझ व्यापक और परिपक्व है। यह संग्रह जीवन के सच को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। आधुनिक जीवन के लगभग सभी महत्वपूर्ण सामयिक और प्रासंगिक विषयों और मुद्दों को संग्रह की कोई न कोई कहानी अपना विषय बनाती है। अपने कथ्य को व्यक्त करने के लिए कथानक का सर्जन करने में तेज प्रताप जी पूर्णरूपेण सक्षम हैं। संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ भाषा-शैली और संप्रेषणीयता की दृष्टि से अच्छी हैं। आम प्रचलन के शब्दों का प्रयोग ख़ूब हुआ है। रोचकता के दृष्टिकोण से भी कहानियाँ अच्छी हैं। पढ़ना शुरु करने के बाद उत्सुकता और जिज्ञासा के कारण पढ़ना बंद करना कठिन हो जाता है। वर्तनी संबंधी त्रुटियों की संख्या अधिक है, इसे छोड़कर संग्रह की भाषा सरल, सुबोध, स्पष्ट और उपयुक्त है। अपनी कहानियों के माध्यम से तेज जी आधुनिक जीवन की विसंगतियों को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरते हैं। संग्रह की कहानियाँ अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में पूर्ण सफल रही हैं।

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