कानपुर

 कानपुर

युवा लेखक अभिषेक पटेल ‘अभी ‘ एक बैंक अधिकारी हैं।विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं ।

“मियाँ चाहे कर लो दुनिया टूर ।
अई ग़जब है अपना कानपुर ।।”
कानपुर एक ऐसा शहर जिसने हाल ही में 215 वर्ष पूर्ण किये हैं ।इस शहर में हमारा दिल बसता है और हमारे दिल में ये शहर बसता है ।इस शहर को देखकर यकीन होता है कि मुफलिसी भी जिन्दादिली को रोक नहीं सकती ।ख़ुशी से लबरेज रहने के लिए भौतिकता व आडम्बर से भरी सम्पन्नता कोई मायने नहीं रखती ।कुछ ऐसी मजेदार वजहे हैं, जो इस शहर को हरदिल अजीज बनाती हैं –

1. कभी यहाँ महिला महाविद्यालयों के बाहर सजे संवरे युवा लड़को को देखिये । परीक्षाओं में सदैव देर से पहुँचने वाले ये लड़के पूरी मेहनत से ब्रम्ह्म मुहूर्त में उठ कर तैयार होकर अवलोकित स्थलों पर समय से पूर्व
ही तैनात हो जाते है ।इनके पास उधार का एक दोपहिया वाहन होता
है, जिसमे बीस रूपए का पेट्रोल होता है । इनके पास डायरी के आकार का एक मोबाइल भी होता है जो तीन सिम से युक्त परन्तु talktime से मुक्त होता है । मजाल है कि कभी कोई कन्या सार्वजानिक वाहन के इन्तेजार में
खड़ी रहे ।ये युवा अपनी पढाई, आराम ,कैरियर आदि की तिलांजलि देकर कन्या को गंतव्य स्थल तक छोड़ने की जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हैं ।यहाँ तक कि ये युवा काकादेव जाने की टेम्पो भी चुनने में महिलाओं का पूर्व उपस्थित होना अनिवार्य मानते है ।प्रेरणास्त्रोत के बीच मार्ग पर उतरने पर ये भी साथ में उतरने में गुरेज नहीं करते चाहे गृह युद्ध का सामना देर से घर पहुँचने पर करना पड़े। सम्पूर्ण विश्व में अन्यत्र कही भी युवा वर्ग द्वारा महिला सशक्तिकरण हेतु ऐसा त्याग
दुर्लभ है ।

2. कभी आप परेड की तरफ जाइये आपको लाइन से मर्सिडीस, ऑडी जैसी कंपनियों के शोरूम मिलेंगे ।जिनके सामने खुदी हुई सड़को के गढ्ढे अन्दर शोरूम में रखी गाड़ियों को ऐसे मुंह चिढ़ा रहे है कि तुम अन्दर ही रहो देखते है कैसे बाहर निकलती हो ? खैर इन गड्ढो के कारण एक चौबीस घंटे अनवरत अघोषित योग कार्यक्रम में प्रत्येक व्यक्ति सम्मिलित होकर प्रत्येक क्षण कपाल भाती जैसा कम्पन महसूस करता है ।

3.यहाँ राहगीर को पता बताना राष्ट्रीय धर्म है ।किसी पान की गुमटी , अड्डेबाजी पर जमघट, दुकान या
राह चलते बस आप पता पूँछ लीजिये इतनी शिद्दत से पता बताया जायेगा कि पता पूछने वाला कोमा में और बताने वाले युद्धरत हो जाते हैं । लगता है कि कहीं तृतीय विश्व युद्ध कानपुर में पता बताने को लेकर न हो ।खैर इसी बीच पता बताने वाला एक परोपकारी व्यक्ति बेताल की तरह आपके विक्रम रुपी वाहन पर सवार हो कर बर्रा तक बैठ जाता है जब आप उससे कहते हैं मुझे बरा देवी चौराहा जाना था , तब ‘परोपकारी’ का जवाब होता है “मुझे तो यहीं तक जाना था ।आप तीन किलोमीटर आगे आ गए ।”

4. विक्रम टेम्पो यहाँ का राष्ट्रीय वाहन है । सामर्थ्य में ये दिल्ली की ब्लू लाइन बसों को भी मात दिए है ।ये अगर सामने से आ रही हो क्या नीली क्या लाल बत्ती सभी किनारे हो जाती
हैं ।घंटाघर या रावतपुर में ये ऐसे सवारी पकड़ते है कि कई सवारियां दंगा समझ कर भागने लगती है ।

5. कानपुर को प्रदूषण के शहर के रूप में प्रचारित किया जाता है , जबकि इसे पर्यावरण व उर्जा संरक्षण हेतु रॉयल पुरस्कार प्रदत्त करना चाहिए ।मार्च के माह में जब सम्पूर्ण विश्व स्वेच्छा से मात्र एक घंटे का ब्लैक आउट करता है तब केसा जैसा संवेदनशील विद्युत् विभाग प्रासंगिक हो जाता है ।जो अनिच्छा से 365 दिन व रात में कई बार ब्लैक आउट(विद्युत् कटौती) करता है ।ऊर्जा संरक्षण के इस भागीरथ प्रयास को प्रोत्साहन की आवश्यकता है ।

6. कानपुर चिकाई करने वालो का शहर है जो किसी के भी भोकाल को हौंकने की तथा रखता है ।

7. यदि कोई बालक गंगा बैराज नित्य प्रतिदिन जाए तो ये सोच के बिलकुल न घबराये कि वो धार्मिक हो गया अथवा आत्महत्या करना चाहता है ।निश्चित तौर पर वो भावी गृहस्थ जीवन हेतु प्रयासरत है तथा नित्य प्रेम परीक्षा स्थल अर्थात गंगा बैराज पर प्रणय आवेदन प्रेषित कर रहा है ।

8. यहाँ रायबहादुरों की पर्याप्त आबादी निवास करती है ।उनसे आप अमेरिका की परमाणु संधि से लेकर पड़ोस के जल निकासी की समस्या तक पर राय ले सकते हैं ।ये वही लोग हैं जो अंतिम यात्रा में भैरव घाट के बाहर आकर लाल पेड़ा खाने की फरमाइश करते हैं ।

9. मौन में महान शक्ति है ।इस कथन को कानपुर वालो ने ही आत्मसात किया है ।इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु मुख में गुटखा का दबा रहना अवश्यम्भावी है ।सरकारी कर्मचारी विशेष कर रेलवे पूछताछ पर बैठा कर्मचारी विशेष रूप से मौन धारण कर लाभान्वित होता है । विश्व की सबसे सस्ती रिश्वत गुटखा का जनक भी कानपुर है जिससे निम्नतम व्यक्ति भी अपने कार्यों की पूर्ति हेतु सम्पूर्ण स्वावलंबन को प्राप्त कर सका है ।

10. कुछ मंदिरों में सॉरी का प्रयोग वर्जित है, वहां दयालु शब्द का प्रयोग किया जाता है ।कोई निर्दयी व्यक्ति आपको धक्का देकर , आपके ऊपर जल चढ़ा कर धतूरा रगड़ कर आपको दयनीय स्थिति में पहुंचा कर धीमे से कहता है- “दयालु” ।

खैर ये गजब शहर है , लड़का कब नोट्स बनाते हुए इजी नोट्स पढने लगे, कभी तफरीह के लिए लड़को के झुण्ड निकलने लगे , कभी कुछ कर गुजरने के ख्वाब पलने लगे , कभी अजनबी की मदद को भी हाथ बढ़ने लगे , कभी छोटी बातों पर भी पडोसी लड़ने लगे, कभी गैर भी खून से बढ़कर लगने लगे ।।।

ऐसा है मेरा शहर – कानपुर।
अभिषेक पटेल “अभी”

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