क्या दुख ही बुद्ध की शिक्षाओं का केन्द्रीय विषय है?

 क्या दुख ही बुद्ध की शिक्षाओं का केन्द्रीय विषय है?

संजय श्रमण

चार अरिय सत्य उन चार तीलियों की तरह हैं जो धम्मचक्र को उसकी धुरी से जोड़कर गतिमान रखती हैं। धम्मचक्र की धुरी ‘अनित्यता’ के दर्शन मे है, यही अनित्यता की दृष्टि जब भौतिक जगत से मनोजगत में प्रवेश कर जाती है तब ‘अनत्ता’ का दर्शन बन जाती है।

मनोजगत में जो अनत्ता है वही भौतिक जगत में क्षणभंगुरता या अनिच्चा या अनित्यता है। यह बुद्ध धम्म और धम्मचक्र की केंद्रीय धुरी है। यही बुद्ध का केन्द्रीय दर्शन है इसी से प्रतीत्य समुत्पाद , कर्म का सिद्धांत और अष्टांग मार्ग निकलते हैं।

बुद्ध स्वयं जब काम कर रहे थे तब इस सामूहिक दुख से मुक्ति का मार्ग बताते हुए अनित्यता की व्याख्या करते हुए वे व्यक्तिगत संदर्भों के उदाहरण ले रहे थे। अनित्यता की व्याख्या करने के लिए दुख की चर्चा बीच मे लाई गयी थी। दुख की चर्चा स्वयं मे कोई दर्शन नहीं है बल्कि अनित्यता को समझाने का एक उपाय मात्र है। आज जो दुख है कल वही दुख नहीं होगा, परसों कोई नया दुख आ जाएगा। इस तरह अनित्यता के केन्द्रीय दर्शन को समझाना ही बुद्ध का मूल प्रयास है।

दुख का उल्लेख करना उस प्रयास मे एक सहयोगी उपाय भर है। दुख की चर्चा को ही बुद्ध का केन्द्रीय दर्शन मान लेना एक भूल है जिसे बाबा साहब अंबेडकर बाद मे आकर ठीक करते हैं।

बुद्ध का स्वयं का गृहत्याग सामूहिक दुख और आसन्न युद्ध की विभीषिका को निरस्त करने के लिए हुआ था। ज्ञान प्राप्ति के बाद जब उन्होंने पहला उपदेश सारनाथ मे दिया तभी उन्होंने “बहुजन” शब्द की नींव रखकर धम्म के साथ “बहुजन हिताय” सूत्र का इस्तेमाल करना आरंभ किया। इस तरह आत्म और अनात्म की व्याख्या का आरंभ ही सामूहिक अस्तित्व को ठीक से समझने के लिए पहले चरण की तरह होता है।

गौतम बुद्ध देख रहे थे कि जो परम्पराएं आत्म या सनातन अनश्वर मैं या आत्मा को मानती हैं, उनके अनुयायी भयानक रूप से आत्मकेंद्रित स्वार्थी और पाखंडी हो जाते हैं। इन स्वार्थी मनुष्यों मे व्यक्तिगत सुख की धारणा ही इनके इश्वर और सनातन आत्मा सहित इनके पुनर्जन्म और मोक्ष को जन्म देती है। ऐसे ईश्वर और मोक्ष के कारण ये समाज के सामूहिक शुभ के लिए कभी संगठित नहीं हो पाते हैं और परस्पर विभाजित होते हुए पूरे समाज को छोटे छोटे डब्बों मे कैद कर देते हैं।

गौतम बुद्ध इसी आत्मभाव की प्रतीति से जन्मे विभाजन और शोषण से मुक्ति का मार्ग दे रहे थे। वे सामूहिक शुभ के मूल्यों को स्थापित करने के लिए व्यक्तिगत दुख मुक्ति की चर्चा को एक उपकरण की भांति उपयोग कर रहे थे। व्यक्तिगत अर्थ के सुख या आनंद को पाने का लक्ष्य बुद्ध ने न तो स्वयं बनाया न दूसरों को बताया। वे दुख से मुक्ति का मार्ग बताते हैं। दुर्भाग्य से बुद्ध के जाने के बाद सामूहिक दुख से मुक्ति की इबारत को व्यक्तिगत दुख से मुक्ति की इबारत तक सीमित करके बुद्ध की मूल शिक्षा को नष्ट कर दिया गया।

हमारे समय मे बाबा साहब अंबेडकर जब इस स्थिति को देखते हैं तब वे धम्मचक्र की केन्द्रीय धुरी अर्थात अनित्यता और अनत्ता से जुड़े चार अरीय सत्यों को व्यक्तिगत दुख मुक्ति की धारणा से आजाद करवाकर सामूहिक दुख से मुक्ति की तरफ दुबारा लाने का मार्ग बताते हैं। इस तरह बाबा साहब अंबेडकर गौतम बुद्ध की बहुजन हित की मौलिक धारणा को फिर से उसके मूल स्वरूप मे हमारे सामने स्थापित करते हैं।

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