जगदीश सौरभ की ग़ज़लें

 जगदीश सौरभ की ग़ज़लें

【एक】
तू पत्थर तो नहीं है फिर पिघलता क्यों नहीं मुझसे
यहीं दिल्ली में रहता है तो मिलता क्यों नहीं मुझसे

फकीरों की तरह अपनी ही धुन में मस्त रहता है
अज़ब इन्सान है आखिर ये जलता क्यों नहीं मुझसे

ज़माने की मसीहाई थमा के मत जा मुझको सुन
मैं हैराँ हूँ कि मैं ही खुद सम्हलता क्यों नहीं मुझसे

मेरी ख्वाहिश के तहखानों में लाखों रंग बिखरे हैं
तेरी सूरत में फिर भी कोई ढलता क्यों नहीं मुझसे

मेरा दुश्मन मेरे ज़ेहन में बसता भी है हँसता भी
हजारों कोशिशें कर लीं निकलता क्यों नहीं मुझसे

【दो】
दुनिया का तमाशा है ये हसरत तो नहीं थी
चुपचाप देखना पड़ा आदत तो नहीं थी.

जो मिल न सका ज़िन्दगी में ख़्वाब ही तो था
जो मिल गया था, वो भी हक़ीकत तो नहीं थी.

इस ज़हनोदिल में भर गया है शहर का धुआं
कुछ साल पहले ऐसी तबीयत तो नहीं थी.

बीमारहुए, घर का पता याद आ गया
चल कर के देखते हैं, अदावत तो नहीं थी.

तुम, तुम हीरहे उम्र भर,मैं, मैं ही रह गया
कुछ भी था जानेजाँ ये मुहब्बत तो नहीं थी.

【तीन】
पेड़ों ने नए इल्म गढ़े पंछियों के बीच
बस्ती बहेलियों की बसी घोसलों के बीच

उनवान था सहराओं में भी फूल खिलेंगे
शोले बरस रहे हैं यहां बारिशों के बीच

मुंसिफ ने हँसके रोटी के मसले पे कहा, चल
चल चाँद दिखाते हैं तुझे बादलों के बीच

उसने उठाये हाथ सवाली मिजाज़ से
शरमा के खुद ही खींच लिए तालियों के बीच

रमुआ ने हाथ जोड़ लिए क़ातिलों के बीच
मैं क्या करूँगा जाके वकीलों, जजों के बीच

मैं साँस ले रहा हूँ ग़ज़ब दहशतों के बीच
सिसकी फँसी पड़ी हो जैसे कहकहों के बीच

खुद को समेट लें तो चलें और कहीं पर
कुछ और धरतियाँ भी होंगी धरतियों के बीच

अहमक़ था मैं, सस्ती सी क़लम ले के आ गया
ऊँचे, अदीब, नामचीन शायरों के बीच

【चार】
बच्चे जैसा चीख रहा था इक बूढ़ा दीवार के पीछे
जैसे कश्ती डूब रही हो लहरों की मंझधार के पीछे

उजली-उजली चमकीली चीजें थीं सजी दुकानों पर
कालापन तहखानों में और पूरा सच बाज़ार के पीछे

नहा के खाके धुप में बैठ के पूरा दिन बतियायेगा
पूरा हफ़्ता बैल बना था हरखू इक इतवार के पीछे

किसको फुरसत अब्बू का टूटा चश्मा बनवाये कौन
अब्बू, जिनकी आँखें धँस गयीं एक इसी परिवार के पीछे

डिग्री बाँध के सीए पर मोहना पंखे से झूल गया
लड़की का चक्कर था कोई खबर छपी अखबार के पीछे

【पाँच】
बारिश की तरह अब्र से झर लूँ तो फिर चलूँ
शबनम सा ज़मीनों पे बिखर लूँ तो फिर चलूँ

गीले लजीज़ लम्हे बहुत बेशकीमती
ठहरो ज़रा सा आँख में भर लूँ तो फिर चलूँ

हिज़रत में मुसलसल है अंधेरों के बयाबाँ
कुछ रोशनी के पंख कुतर लूँ तो फिर चलूँ

दरिया से बहक जाने हवाओं से महकने और
सहरा से तिश्निगी का हुनर लूँ तो फिर चलूँ

दुश्वारियों ने सोख लिया ज़िन्दगी का ताब
तुमको गले लगा के निखर लूँ तो फिर चलूँ

बस्ती से आ रहा किसी के चीखने का शोर
बेबस ही सही फिर भी सिहर लूँ तो फिर चलूँ

पुरखों की खाली आंत के फाकाकशी के ज़ख्म
रोटी नमक के साथ तह कर लूँ तो फिर चलूँ

सब बावफ़ा थे और इक मैं ही था बेवफ़ा
ये तोहमतें भी अपने ही सर लूँ तो फिर चलूँ

【छह】
ये क्या कि अपने ही हाथों अपनी तमाम रातें अज़ाब कर लूँ
कलम उठाऊँ, गजल लिखूँ और थोड़े कागज़ खराब कर लूँ

मैं नींद बिस्तर से झाड़कर के सजा के तकिये के नीचे रख दूँ
और अपनी बोझिल उनींदा आँखें मसल मसल कर चराग कर लूँ

अगर हक़ीक़त यही है तो फिर तिलिस्म क्या है फरेब क्या है
तो मैं भी पत्थर को पानी करके उसे बदल कर शराब कर लूँ

फरिश्ते आए हैं मुझको लेने मगर ज़रा सा ठहरना होगा
चलूँगा चलना तो है ही बैठो सबर तो रक्खो हिसाब कर लूँ।

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1 Comment

  • Meri kuch gazalen hain kripya publish krne ki kripa kren

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