जाति की आत्मकथा

 जाति की आत्मकथा

तेज प्रताप नारायण (लेखक के चार कविता संग्रह,दो कहानी संग्रह ,एक उपन्यास, एक साझा उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं ।पाँच किताबों का संपादन भी कर चुके हैं ।भारत सरकार द्वारा मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और प्रेम चंद सम्मान से समानित हो चुके हैं । एक व्यंग्य संग्रह शीघ्र प्रकाश्य है ।)

मैं जाति हूँ और भारत मे यत्र तत्र सर्वत्र पाई जाती हूँ ।मैं सर्वकालिक हूँ । भूत, भविष्य और वर्तमान हूँ ,हर जगह विराजमान हूँ । मैं इस देश के दुर्भाग्य की कहानी हूँ ।सब कुछ परिवर्तन शील है ज्ञान, विज्ञान ,दुनिया ,जहान लेकिन मैं परिवर्तित नहीं होती हूँ । मैं सत भी हूँ असत भी हूँ । मैं अनित्य में नित्य हूँ ,जड़ हूँ और चेतन भी ।

मैं भारतीय पुरूषों की हीर हूँ और महिलाओं की राँझा , मिठाईयों में खाझा हूँ और नशे में गाँजा । मैं स्त्री भी हूँ ,पुरुष भी । समस्त देश की व्यवस्था मेरे कंधो पर ही टिकी है ।समस्त आदर्श , सामाजिक मानदंड मुझसे ही संचालित होते हैं। मैं ब्रह्मा का मुख हूँ ,भुजा हूँ, पेट हूँ, जंघा और पैर हूँ ।मैं ब्रह्मा में हूँ और ब्रह्मा मुझमें हैं । मैं ब्रेन का न्यूरॉन हूँ ,भारतीय समाज की कठोरतम चट्टान हूँ । मैं धमनियों का ख़ून हूँ, महीनों में जून हूँ शहरों में देहरादून हूँ ,कपड़ों में पतलून हूँ , समय मे नून हूँ ,प्रदेशों में राजस्थान हूँ और देशों में हिंन्दुस्तान हूँ।मैं बहुत तड़पाती हूँ और लोगों को दीवाना बनाती हूँ । मैं एक हूँ लेकिन अनेक हूँ ।

मेरी जन्म की कहानी अज़ीब है । मैं काल की संतान हूँ ।मेरे जन्म के बारे में विद्वानों के विचार अलग अलग हैं ।

कुछ का कहना है कि कर्म के अनुसार मैं बनती बिगड़ती रहती थी ।मसलन कोई व्यक्ति व्यापार करता रहा हो और फिर देश की सेना या पुलिस में भर्ती हो जाए तो क्षत्रिय हो जाता था और सफ़ाई करने वाला व्यक्ति ज्ञान या पांडित्य अर्जित कर ले तो पंडित हो जाता था।

कुछ किताबों और विद्वानों का मत है कि ब्रह्मा के अलग अलग अंगों से पैदा होने वाले लोग अलग -अलग वर्णो और फ़िर जातियों के हए । मुझे यह समझ में नहीं आता है कि ब्रह्मा तो एक पुरूष है फिर उन्होंने कैसे गर्भ धारण कर लिया और वह भी गर्भ शरीर के अलग अलग स्थानों पर । पर वें तो भगवान हैं कुछ भी कर सकते हैं ।वैसे भी उनकी संतान होने के कारण मुझे कोई हक़ नहीं प्रश्न करने का ।

कुछ विद्वानों का कहना है कि पहले इस देश मे मेरा अस्तित्व नहीं था और कुछ लोग बाहर से आए फिर विभिन्न प्रकार की किंवदंतियों और कहानियाँ रच कर मुझे पैदा कर दिया ।

जितने लोग उतने मत हैं और यही तो सच्चा लोक तंत्र है । पर शंका से परे है कि मुझसे यह देश बहुत प्यार करता है और मुझे भी इस देश से बहुत प्यार है ।

हमारा प्यार लौकिक और पारलौकिक दोनो है। मैं और यह देश एक दूसरे को अपनी बाँहों का सहारा दिए हुए सदियों से एक साथ आगे बढ़ते रहे हैं ।यह देश तो त्याग की प्रतिमूर्ति है ।मेरे प्यार में पड़ने के बाद इसने अनगिनत नुकसान झेले हैं ,विदेशियों द्वारा लूटा गया है ,बार -बार रक्त रंजित हुआ है और सदियों तक गुलाम रहा है लेकिन फ़िर भी इसने मेरा दामन नहीं छोड़ा है इसके लिए मैं इसकी बहुत आभारी हूँ ।काश! सारे लोग एक दूसरे के प्रति ऐसे ही समर्पण का भाव रखें ।आपस मे बेवफ़ाई न करे जैसा मेरे साथ किया है ,तो कितना अच्छा हो ।

मैं इतनी भाग्यशाली हूँ कि मन करता है रो पडूँ । हाय ! ! यह समाज जिसने अपना सब कुछ लुटा दिया लेकिन मुझे न छोड़ा ।दिल के कोने में बिठाए रहा और सारे दर्द दबाए रहा ।

ऐसा नहीं है कि मुझसे प्रेम के कारण हर कोई घाटे में ही रहा हो कुछ लोगों को मेरे कारण आनंद की अनुभूति भी हुई । उनके दोनों हाथों में लड्डू और सिर कढ़ाई में रहा है ।

हमारा अद्भुत प्यार है जिसमें सब कुछ सिमट जाता है । विज्ञान आया,पूँजी आई ,शिक्षा आई लेकिन एक सच्चे प्रेमी की तरह हमने एक दूसरे का दामन न छोड़ा । जो मेरे प्यार के रास्ते मे आया है उसे मैंने नेस्तनाबूद कर दिया है ।बेवफ़ाई मुझे नाक़ाबिले बर्दाश्त है । बेवफ़ाई करने वालों के लिए खाप पंचायत और लव जिहाद संस्था वाले नहीं छोड़ते हैं और ऐसा सबक सिखाते हैं कि कोई जाति की सीमाओं का अतिक्रमण करने की सोच नहीं सकता है ।

देखो! इतना बताते- बताते मेरे आँखों मे पानी आ गया है। इतना समर्पण ,इतनी दीवानगी या तो ख़ुदा के लिए होती है या मेरे लिए है। मतलब मैं ही ख़ुदा हूँ ।समर्पण की हद तो यहाँ तक है कि देश मे कई सारी सेनाएं और सभाएं मेरे नाम से चल रहीं हैं । मुझे बचाने के लिए सब एक दूसरे को काटते रहते हैं । ईश्वर से ज़्यादा लोग मुझे पूजते हैं । मेरी खुशी का ठिकाना नहीं होता है और मैं गलबहियां डाल कर अपने चाहने वालों को प्यार कर लेती हूँ ,उनका माथा चूम लेती हूँ ।
मेरा चरित्र विचित्र है, मैं ख़ुद पर ही वार कर सकती हूँ ।ख़ुद को ही उंच नीच कह सकती हूँ ।

मेरे लिए लोगों ने असीमित त्याग किया है ।अनगिनत इंसानो को उनके हक़ हुक़ूक से मरहूम करने में भी लोगों ने मेरा प्रयोग किया है ।मेरे कारण ही द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अँगूठा कटवाया ,मेरे कारण ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कर्ण सूत पुत्र कहलाया और संबूक मार डाला गया ।

दुनिया मे कोई उदाहरण न होगा जब किसी ने प्यार में पड़कर ख़ुद की संतानों की प्रगति रोक दी हो उन्हें आगे न बढ़ने दिया ।इसके लिए मैं हमेशा हमेशा के लिए शुक्रगुज़ार हूँ इस देश का ।
मैं जानती हूं कि मेरा कोई तार्किक और वैज्ञानिक अस्तित्व नहीं है ।मैं तो सिर्फ़ एक कल्पना हूँ जो सदियों से अस्तित्व में रहने के कारण वास्तविकता में बदल गई हूँ ।

ऐसा नहीं है कि सब कुछ अच्छा ही अच्छा रहा है मेरे साथ। मुझे प्यार मिला है तो नफ़रत भी मिली है ,सम्मान मिला है तो दुत्कार भी कम नहीं मिली । मैं सर्वत्र होकर भी अकेली ही हूँ ।जब कोई मेरा भारतीय प्रेमी विदेश जाता है तो मुझे भी अपने साथ विदेश ले जाता है । न मेरा वीज़ा लगता है और न ही किराया। विदेश में जब जाती हूँ बड़ा अकेलापन महसूस करती हूँ । मेरी कोई बहन ,सखी ,सहेली वहाँ नही मिलती ।कहीं कहीं एक दो कजन ज़रूर मिल जाते हैँ जिनका नाम रंग ,नस्ल है ।लेकिन विदेशी लोग बड़े बेवफ़ा हैं उन्होंने सब छोड़ छाड़ दिया है और इंसान को इंसान की तरह मानने लगे हैं ।वैसे मेरे प्रेमी भी मेरे कजन को बड़ा प्यार करते हैं ।उन्हें काला, सांवला नहीं पसंद है ।

कोई मुझे बताए मैं क्या करूँ जब मुझे लोगों से और लोगों को मुझ से इतना प्यार है ।ऐसा प्यार जिसमें हमेंशा सावन ही रहता है और सब हरा हरा ही दिखाई देता है ।मेरी ख़ुश किस्मती है कि मैं हर जगह वैल्यू पाती हूँ । व्यक्ति की वैल्यू से भी ज़्यादा । हर गुण ,धर्म पर भारी हूँ मैं । आज कल लोग मुझे खरी खोटी भी सुनाने लगे हैं लोग सोचते हैं कि मेरे कारण समाज ठहर गया है ।अब मैने तो किसी को फ़ोर्स नहीं किया है कि मुझे प्यार करो ,मेरी इज्ज़त करो ।अब लोगों को मैं हसीन लगती हूँ ,थोड़ी ज़हीन लगती हूँ तो मेरी क्या ग़लती ? मेरी खूबसूरती पर लोग मर मिटे हैं, मेरे दीवाने बन गए हैं तो आख़िर मैं क्या करूँ? मैं इतनी बदतमीज़ तो हो नहीं सकती कि लोगों को बेइज्ज़त करूँ । अगर लोगों को प्यार नहीं कर सकती तो नफ़रत का हक़ मुझे नहीं है ।

मैं कई बार सोचती हूँ कि मुझसे इस देश के लोग इतना प्यार क्यों करते हैं तो मैं पाती हूँ कि मेरे रहने से जिन लोगों का फ़ायदा हुआ है वें मुझे चाहते हैं और जिनकी ज़िन्दगी दोयम हुई है वें मुझे बिल्कुल प्यार नहीं करते हैं ।वें मुझसे मुक्ति चाहते हैं लेकिन मैंने उनको ऐसे घेर रखा है कि उनको मुक्ति नहीं मिल पा रही है। अगर मैं इस देश का पहला प्यार न होती तो देश पता नहीं कहाँ होता ।हो सकता है देश विश्व गुरु के शिखर पर अब भी होता जैसे कभी बुद्ध के ज़माने में था । पर पहला प्यार भुलाए कहाँ भूलता है ।

मुझसे प्यार का ग़लत खामियाजा भुगतने के कारण कुछ लोगों जागरूक भी हुए । छत्र पति साहू जी ने प्रतिनिधित्व में सन्तुलन लाने के लिए एक कानून भी पास किया जिससे जाति प्रेम की आग में जल रहे लोगों को तनिक राहत हो । बाद में जब देश आज़ाद हुआ तो ऐसा कानून बनाया गया कि सबको समान अधिकार प्राप्त हो और मेरी वज़ह से झुलसे लोग तनिक खुश हो सकें ।
अरे !मैं क्या क्या बताऊँ ।मेरी महिमा अंनत है । मैं अपनी बड़ाई ख़ुद क्या करूँ ? और कब तक करूँ ।

“हैलो ! किस जातीय महा सभा से हैं ?
एं ! यादव महा सभा ??
एं ! ब्राह्मण महा सभा ??
प्लीज एक मिनट इंतज़ार करें ।

‘देखा आपने ! ऐसी ही रोज़ फ़ोन आते हैं।हर कोई बुलाना चाहता है । ‘
हँसते हुए , “मैं कैसे मना करूँ ? “
पता है इन सभाओं में केवल मेरे ही चर्चे होते हैं ।
और सिर्फ़ चर्चे ही होते हैं । फ़िर खा पीकर सब मस्त ।

ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग —-…
“ओह !! फ़िर से फ़ोन की घन्टी ।कौन है जो फ़ोन कर रहा है “
हेलो !!
आना है ,कहाँ ??
अच्छा अमेठी में ??
पर क्यों ??
कुछ जाति की बात करनी है?
ओह रियली ! यू लव मी ! मी टू !!
मैं बिल्कुल पहुँचूंगी। “

“ट्रिंग ट्रिंग …..
हेलो , मंत्री जी
देश के हाल चाल कैसे हैं ??
जी जी अच्छे ही होंगे ।नहीं होंगे तो भी सब अच्छा ही बताएंगे ।
जी कहाँ आना है ??
ओके मेरठ और मुजफ्फरनगर दोनों जगह आ जाऊँगी ।
जी जी आप चिंता न करें ।सभी डरेंगे । आपको ही सब वोट करेंगे । “

“ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग
जी मैं हमेशा की सेवा में हाज़िर हो जाऊंगी ।
जी जी मैं जानती हूँ आप मेरे चैम्पियन हैं ।
ठीक है ,नमस्ते जी । “

“ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग

देखा आपने ।राजनीति भी मेरी पार्टनर बन चुकी है ।चुनाव जीतने के लिए हर कोई चाहता है कि मैं उसके साथ रहूँ ।चुनावी टिकट भी मुझे देख कर दिए जाते हैं ।
लोगों का इतना प्यार है मेरे प्रति , जिस कारण से मैं न केवल ज़िंदा हूँ बल्कि और मजबूत होती जा रही हूँ ।
मेरी कहानी ख़त्म नहीं हुई । बहुत कुछ सुनाना शेष है लेकिन यह तो निश्चित है मैं इस देश को ऐसे ही खोखला करती रहूंगी और यहाँ के लोग अपने स्वार्थ के लिए मुझे ऐसे ही प्यार करते रहेंगे ।
जाति ज़िंदाबाद । देश से क्या मतलब ?
फ़िर कभी अपनी कहानी सुनाऊँगी ।

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