डर के साये में

 डर के साये में

तेज प्रताप नारायण

रीता को दरोगा पकड़ कर थाने ले गया ।सुबह से शाम तक बिठाए रखा ।रीता हाथ जोड़े गिड़गिड़ाती रही ,”साहब हमरी और हमरे मनई कौनो ग़लती नही है ।हमरे मरद तो सिर्फ •••”
वाक्य पूरा भी न हो पाया था कि हव लदार का डंडा फिर से चल गया ।रीता चीख़ पड़ी ।पूरा शरीर झनझना गया ।

“हमे न मारो साहेब ।जिकै ग़लती है उका पकड़ो और मारो । हमरे खेत मे नुकसान भवा है ,हमार घर जलाय दीन गा है और हमहिन का पकड़ लावा गवा है ।”
थाना पुलिस से हमेशा डरने वाली रीता के ऊपर हवलदार के जितने सोंटे पड़ते ।उसकी चीख़ निकलती और ज़ुबान भी चलती जाती ।हर डण्डे के साथ उसका दर्द बढ़ता जाता लेकिन उसका डर हवा हुआ जाता था । थाने में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा असतो मा सद गमय ,तमसो मा ज्योतिर्गमय के सत और ज्योति के रोम रोम में डर से सिहरन पैदा हो रही थी ।

थाने में कोई महिला पुलिसकर्मी नहीं जो महिलाओं से पूछताछ करती ।ऐसे में मर्द पुलिसवालों को हाथ साफ़ करने का मौक़ा मिला था । कभी डंडे से कभी हाथ से ,रीता के हर अंग उपांग पर चोट पहुँचाई जा रही थी ।

रीता का पति राजू एक छोटा किसान था । कोई दस पन्द्रह कच्चे बीघे की खेती में ज़िन्दगी ठीक ठाक गुज़र रही थी । सब मिला कर 6 लोगों का परिवार ।रीता और उसका पति,दो बच्चे और सास ।बहुत सुख नहीं था लेकिन गांव में कई परिवारों के मुक़ाबले ज़रूर समृध्द कहे जा सकते थे ।

कहते हैं संकट बता कर नहीं आता ।राजू की धान की नर्सरी हरापन लेने लगी थी । सूरज की गर्मी पूरे शबाब पर थी । घर का कोई न कोई सदस्य वहाँ रखवाली देने लगा था जिससे कोई जानवर आकर उसे चर न ले । कभी राजू,कभी रीता और कभी कभार उनके बच्चे हाथों में बाँस की पतली डंडी लिए मेढ़ पर इधर -उधर चलते रहते ।जब चलते तो डंडे को ज़मीन पर पीटते रहते जिसे अगर कोई साँप गोजर हो तो भाग जाए ।गर्मी के मौसम में साँप बिलबिलाकर अपने बिल से बाहर निकल आते हैं । कई बार थोड़ा सुस्ताने के लिए घास में ही छिप जाते हैं ।ऐसे में बड़ी सावधानी की ज़रूरत होती है ।

उस दिन भी उनका बड़ा लड़का जो 15 साल के आसपास होगा ।खेत के किनारे मेढ़ पर डंडा लेकर बैठा हुआ था ।इतने में गायों का एक झुंड नर्सरी को चरने लगा । पहले तो वह दूर से हट हट करता रहा लेकिन जब गायें टस से मस न हुईं तो उसने गायों को मार -मार कर भगाना शुरू कर दिया ।

गायें भाग गईं लेकिन थोड़ी देर बाद ठाकुर गाँव से कुछ लोग लाठी डंडे से लैस वहाँ पहुँचे ।

उन लोगों का अजीब तर्क़ था कि एक छोटे किसान के लड़के ने ठाकुर गाँव के गायों को कैसे हाथ लगाया ?
लड़के ने पूछा ,”तो क्या वह बियाड़ को चरने देता ।”
उस पर वे सब बोल पड़े , “ठाकुर गाँव वालों से ज़ुबान लड़ाता है ।डर के रहो नहीं तो खेत हड़प लेंगे और घर जला देंगे ।”
लड़का ज़वान था,खून गर्म था ।बोला, “खेत हड़पने वालों की ऐसी तैसी ?”
इतना काफ़ी था उन लोगों के लिए ।मार पीट शुरू हो गई ।अब चूँकि वे चार पाँच लोग थे तो यह लाज़िमी था कि एक अकेला इंसान कमज़ोर पड़ेगा ही । सब मार पीट कर चले गये ।

राजू के परिवार में बड़ा रोष था ।एक तो चोरी उस पर से सीना ज़ोरी ।पास पड़ोस के लोगों ने इस घटना की भर्त्सना की और राजू से बोले,” ठाकुर गाँव के लोगों से दूर ही रहो ।सब बड़े अजीब हैं ।अपनी मर्ज़ी करते हैं सब । बदमाश हैं ,कट्टा ,बन्दूक सब है उनके पास । इनसे डर के रहने में ही भला सबन का ।खेती किसानी वाले हम सब लोग ।कब तक लड़ते रहेंगे।”

“इस डर के साए में रहने से ठीक, एक बार हो ही जाए ।” ,राजू जोश में बोला
” न राजू भैया ! “गाँव के बड़े बुज़ुर्ग गोविंद चौधरी बोले
“काहे , चचा?
“समझै का प्रयास करौ ।अभी हम लोगन के उतनी न हिम्मत है न औकात ।”
“हमे समझ मा नहीं आवत है ?ठाकुर गाँव मे ये लोग केवल दस परिवार हैं ।और हम लोग आसपास के 10 गाँव मिला कर 400 ,500 परिवार ।फिर काहे का डर ? “,राजू ने पूछा

“अगर परिवारन से सब होत तो दसों गॉवों में प्रधानी हम लोग ही जीता जात ।लेकिन केवल एक प्रधान है वो भी ठाकुर गाँव वालों का आदमी !!”

“तब का कीन जाए ?? चाचा !”

लड़कन का पढ़ाव लिखाव ।का पता कौनो ऊँच पद पर पहुँच जाए ।डर के साए से बहुत दूर ।”

किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था।कब तक ज़िल्लत की ज़िंदगी जिया जाए आख़िर ??

उधर ठाकुर गाँव के युवक राजू के लड़के की बदतमीज़ी भूल नहीं पा रहे थे । वे अधार पुरवा का आधार छीनना चाहते थे ।आज पन्द्रह सोलह साल के एक लड़के ने सिर उठाया है।यह सिर अगर कुचला न गया तो कई सारे सिर उठेंगे जो ठाकुर गाँव की इज्ज़त के ख़िलाफ़ होगी ।
“तब क्या किया जाए ?” बंशी सिंह ने अपनी बड़ी मूछों पर ताव देते हुए आँख मारी
“ज़्यादा कुछ नहीं ।पहले मारो पीटो और फिर घर जला दो ,रजुवा का ।”कप्तान सिंह आँख मटका कर बोला

“नहीं पापा !आप लोग ऐसा कुछ मत करियेगा ।ज़माना बदल चुका है ।अब ठकुराई का ज़माना नहीं है।” ,पीछे से कप्तान सिंह को बेटी गरिमा बोली

“बेटा !जब पढ़ लिख कर कलेक्टर बन जाना तब बदलना ज़माना ।हम सब तो ऐसे ही हैं ।”

फ़ैसला हो चुका था । योजनाएं तैयार कर ली गईं थी कि किस तरह डर के साए को फैलाया जाए ।जिससे अधार पुरवा की ज़िंदगी की हवा में डर समा जाए ।थानेदार की ज़ेब गर्म की गई ।जाति के मंत्री जी को फोन पर बता दिया गया ।सब कुछ सेट था ।

अगले दिन रात को अधार पुरवा में जब सब लोग सो चुके थे । तो डर के कुछ काले साए मिट्टी के तेल का कनस्तर हाथ मे लिए राजू के घर की प्ररिक्रमा कर रहे थे ।राजू के घर का कुत्ता भूरा भौंका और फिर चुप हो गया ।पूरा घर धू धू करके जल उठा ।रीता और उसके दोनों बच्चे आँगन में सोए थे तो राजू और उसकी माँ घर के बाहर के बरामदे में ।
राजू की माँ की नींद खुल गई थी ।तुरंत सबको जगाया और भाग भाग कर जान बचाई ।

राजू समझ गया था कि यह सब ठाकुर गाँव वालों की कारस्तानी है ।वह बिना देर किए हुए ठाकुर गांव पहुँचा और जाकर ख़लिहान में एक तीली जला कर डाल आया।गर्मी का महीना था ।खलिहान धू धू करके जल उठा ।

ठाकुर गाँव वालों को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि अधार पुरवा वालों की इतनी हिम्मत हो जायेगी । जो लोग हम लोगों के साथ बैठने की हिम्मत नहीं कर पाते थे ,उनकी इतनी हिम्मत बढ़ गई । आनन -फानन में तय हुआ कि इन्हें तगड़ा सबक सिखाया जाएगा ।

अगली सुबह ठाकुर गाँव के बीस पच्चीस लोग लाठी,डंडा, कट्टा और बंदूक से लैस होकर अधारपुरवा पहुंचे ।जो सामने आया उसकी खोपड़ी पर सीधे लाठी पड़ती जो दूर होता ,उस पर गोली चलती । राजू के पड़ोसी की बेटी मुन्नी को पकड़कर उसके साथ ज़बरदस्ती भी की गई ।राजू के बेटे ने 100 नंबर पर काल किया ।पुलिस आई लेकिन दूर खड़ी रही ।

हर ओर तबाही का मंजर था ।जले हुए घर,चोट खाए लोग और अपमानित महिलाएँ ।
“अब तो हद हो गई । सबसे बदला लेब ,कोई का न छोड़ब ।”राजू ज़ोर ज़ोर से बोल रहा था
जब पूरा कांड हो गया तो पुलिस ने हवाई फायर शुरू किया ।सब इधर उधर भागने लगे ।सबको डर लग रहा था कि कहीं पुलिस उल्टा उन्हें ही न पकड़ ले जाए।सब जानते थे कि ठाकुर गांव वालो का पुलिस कुछ नहीं करेगी ।
ठाकुर गाँव वालों ने राजू और उसके परिवार पर एफ आई आर दर्ज़ करवा दिया । पुलिस ने आगजनी ,हिंसा और गायों को नुकसान करने की धारा लगाई । राजू को पुलिस ढूढ़ने लगी ।लेकिन राजू भाग निकला ।
बिना जाँच के ही राजू को दोषी मान लिया गया । यह भी लिखा गया कि उसने ख़ुद को निर्दोष साबित करने के लिए ख़ुद के घर में भी आग लगाई।

पुलिस ने ख़ूब तांडव मचाया । बस पुलिस को राजू चाहिए था ।गाँव भर की तलाशी ली गयी ।राजू नहीं मिला।
लेकिन रीता पुलिस के हत्थे चढ़ गई और पुलिस उसको उठा लाई ।

“बता ,तेरा मर्द कहाँ छिपा है ?”
“हमको नहीं पता साहेब !!!”
फिर से ज़ोर का डंडा पड़ा।
“कुछ भी कर लो ,दरोगा साहब ? हमें तुम्हारे डंडे का कोई ख़ौफ़ नहीं ।अगर हिम्मत है तो उनका पकड़ो जो गाँव, घर जलाएं हैं ,औरतन संगे बदतमीज़ी किए हैं ।”
दरोगा गुस्से से बौखला गया ।हवलदार की लाठी ली और रीता के ऊपर बरसाने लगा ।
रीता की चीख़ें आसमान छू रही थी ।

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