डॉ अनुराधा ‘ओस ‘ द्वारा कविता संग्रह ‘अपने-अपने एवरेस्ट ‘ की समीक्षा

 डॉ अनुराधा ‘ओस ‘ द्वारा कविता संग्रह ‘अपने-अपने एवरेस्ट ‘ की समीक्षा


काव्य कृति- अपने-अपने एवरेस्ट
रचयिता- तेज प्रताप नारायण
प्रकाशन- साहित्य संचय प्रकाशन
मूल्य- ₹300

यह एवरेस्ट साहित्यकार-कवि तेज प्रताप नारायण के शब्दों ने गढ़ा है. कलम से निकलने वाली स्याही ने सदियों से चली आ रही सड़ी-गली परम्पराओं को हिलाने का प्रयास किया है, कवि तेज प्रताप  साफ-सुथरे बिना भेद-भाव युक्त समाज की कल्पना करतें हैं. उनकी यह कविता इस भाव की पुष्टि करती है.
' तेरी तस्वीर मेरे ख्वाबों में जब उभरी है।
उस तस्वीर को तकदीर बना डाला'॥पृ(22)
कल्पना की तस्वीर को तकदीर वहीं बना सकता है जिसके अंदर संघर्ष करने की जिजीविषा वर्षों से हो,तकदीर बदलने के लिए कड़ी इच्छाशक्ति  उस माउंटेनमैन मांझी की तरह जिसने पहाड़ का सीना चीर कर रास्ता बना लिया.                
 'जब कविता अखबार बन जाती है..
सामाजिक न्याय का हथियार बन जाती है ।पृ(41)
 जब हाथ में हथियार न हो तब कलम को अपना हथियार बना लेना चाहिये ,कलम से निकली आवाज़ें सदियों तक गूँजती हैं, हमारी कई पीढियां उसको महसूस करती हैं और जीवन मे ढालतीं हैं.
   'पवित्र नारी ही क्यों हो
   पुरूष की पवित्रता का क्या मोल नही?
    पतिव्रता नारी ही क्यों
    पुरुष के पतिव्रत का कोई तौल नही?'   पृ(60)
 कवि ने नारी हृदय की कोमलता को गहराई से महसूस किया है. क्या सीता ही अग्नि परीक्षा देगी ,क्या अहिल्या ही पत्थर बनाई जाएगी ,यह जुल्म कब सहेगी स्त्री? ये प्रश्न विचारणीय है.

कवि तेज प्रताप ने समाज मे फैली छुआ-छूत की परम्परा से गहरे से आहत हैं. समाज का उच्च वर्ग निर्बलों को दबाने का प्रयत्न हमेशा से करता रहता है.
‘वह उसकी औरतों से प्यार कर सकता है,
स्पर्श, चुम्बन,सम्बन्ध बना सकता है,
पर उसका छुआ नही खा सकता ! पृ (68)
निचले तबके की औरतें शोषण का शिकार होती हैं. उच्च वर्ग का व्यक्ति उनसे सम्बन्ध बना सकता है मगर उनका छुआ नही खा सकता. ये सामाजिक विकलांगता का परिचायक है. ये समाज को विघटित करने का कार्य करतीं हैं. इस खाई को पाटना भी है. कलम से निकले शब्द क्रांति करवाते हैं. यही कलम हालात बदल सकतें हैं .इस कथन से सम्बंधित ‘दुष्यंत कुमार’ की ये पंक्तियां देखिये…..
‘घण्टियों की गूंज कानो तक पहुँचती है।
एक नदी जैसे दहानों तक पहुँचती है।”
तेज प्रताप की पंक्तियाँ….
‘अंधेरों से कहता हूँ न कहता तो क्या करता।
उजालों में दम कहाँ था जो दर्दे दिल बयाँ करता॥ पृ(104)

 उजाले कभी -कभी बहुत चुभतें हैं. कभी कभी अंधेरे ही साथ देतें हैं अपनी बात के लिए,ल. कवि को अपनी बात कहने के लिए अंधेरा बहुत अच्छा लगता है.
 आजकल लोग स्वयं की बड़ाई करने के लिए न जाने क्या-क्या जतन करतें रहते हैं. अपने बनाये नियमों में स्वयं को फिट मानकर मन ही मन स्वयं श्रेष्ठता का बोध करतें हैं. कवि का कहना देखिये...
'मैं कितना आत्ममुग्ध हूँ
अपने से सन्तुष्ट हूँ
 अपने बनाये प्रतिमानों से
 बहुत खुश हूँ'' ।पृ(35)
 कवि समाज मे बढ़ती नैतिकता की हत्या के प्रति संवेदनशील है. उनको समाज में घटने वाली प्रत्येक घटना अंदर से स्पर्श करती है. उन्हें पेशावर में स्कूली बच्चों की हत्या गहरे से प्रभावित करती है,
   'कुछ बच्चों की कलमें
    छीन ली गईं
   बंदूक की गोली से'। पृ (15)

एक साहित्यकार का दायित्व है कि वह समाज में घटने वाली प्रत्येक घटना के प्रति संवेदनशील रहकर उन्हें अभिव्यक्ति प्रदान कर समाज में मशाल जलाए रखे . ‘अपने -अपने एवरेस्ट ‘ इस कार्य में कितना सफल हुआ ये समय बताएगा .इस पुस्तक में लिखित कविताओं में विभिन समाजिक विषयों को कवि ने उठाया है .कुछ कविताएँ भाव से असम्बद्ध लगती हैं .अपने-अपने एवरेस्ट कविता संग्रह का भविष्य उज्ज्वल हो ऐसी उम्मीद के साथ।

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