ताकि इंसानियत बची रहे

 ताकि इंसानियत बची रहे

कोरोना काल में सत्ता और समाज के विभिन्न परतों को खोलता हुआ ‘ ‘रजनीश संतोष ‘ का लेख ।
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एक युवक चुपचाप पत्तियाँ खा रहा था, इधर-उधर देखता और धीरे से नीचे पड़ी पत्तियाँ उठाता और मुँह में ठूँस लेता. मैं उस स्थिति की कल्पना कर के भी घबरा जाता हूँ जब मुझे पत्तियाँ खाने के लिए मजबूर होना पड़े. जब एक महिला ने उसे टोका कि तुम पत्तियाँ खा रहे हो क्या ? तो पहले उसने मना कर दिया. महिला ने दोबारा कहा कि मैने देखा तुम्हें खाते हुए, पत्तियाँ मत खाओ मैं खाना लेकर आती हूँ. वह अपनी रुलाई रोकते हुए चेहरा भी छिपा रहा था और लाचारी भी. वह अभी भी पत्तियाँ ही खा रहा है. वह पत्तियाँ खाता युवक अब तब तक पत्तियाँ चबाता रहेगा जब तक यह मानव सभ्यता रहेगी.

दो दिन पहले एक video देखा जिसमें हाईवे पर एक व्यक्ति मरे पड़े कुत्ते को खा रहा था. रास्ते से गुजरते एक शख़्स ने उसे टोका और उसे खाने को दिया. वह व्यक्ति अब सदियों तक मरे हुए कुत्ते को खाता जाएगा, न वह व्यक्ति अब भूख से मरेगा और न कुत्ता जीवित होगा.

एक महिला सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर रास्ते में ही बच्चे को जन्म देती है और फिर सैकड़ों किलोमीटर बच्चे को लेकर पैदल चलती है. वह महिला अब दुनिया की हर सड़क पर एक बच्चा जनेगी और अपने दुधमुँहे बच्चों को छाती से लगाए दुनिया की हर सड़क हर गली लाखों करोड़ों साल तक नापती रहेगी.

एक युवक अपनी माँ को पीठ पर लादे हुए पुणे से बिहार तक पैदल चलता है. अब यह युवक धरती को अपनी पीठ पर लादे तमाम आकाशगंगाएँ पैदल पार करेगा.

एक बारह तेरह साल क़ी बच्ची अपने बूढ़े और चोटिल बाप को सायकिल पर बैठाकर सैंकड़ों किलोमीटर चली जा रही है. उस बच्ची की सायकिल अब शायद कभी नहीं रुकेगी. उसकी सायकिल के पहिए तब तक घूमेंगे जब तक धरती घूम रही है.

मुंबई में भीख माँगकर अपना पेट पालने वाले तीन बूढ़े जिनमे एक अपाहिज है और दो अंधे, तीनों एक दूसरे का सहारा बने महीनों पैदल चलने के लिए निकल पड़ते हैं. अब वे कभी अपने घर नहीं पहुँचेंगे. उनकी लाठियों की ठक-ठक मानव सभ्यता के सीने पर उम्र भर हथौड़े की तरह बजती रहेगी.

एक परिवार बैलगाड़ी से निकलता है, रास्ते में एक बैल भूख प्यास से मर जाता है. एक बैल की जगह कभी मर्द जुत जाता है कभी औरत, ताकि वे अपने बच्चों को सलामत घर पहुँचा सकें. लेकिन वे अब कभी घर नहीं पहुँचेंगे. अब वे बैलगाड़ी में बैल की तरह जुते हुए हमारे मरे हुए ज़मीरों को रौंदते हुए अनवरत चलते जाएँगे.

रेल से कटकर मर जाने वाले मज़दूर, ट्रक पलटने से दबकर मर जाने वाले मज़दूर, छाले पड़े पैरों से लंगड़ाकर रोते हुए सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चलने वाले छोटे-छोटे बच्चे, पुलिस के डंडे खा-खा कर सैंकड़ों हज़ारों किलोमीटर का सफ़र नंगे पैर तय करने वालों का सफ़र अब कभी ख़त्म होगा क्या? अब वे अंतहीन सफ़र के लिए निकाले जा चुके हैं.

एक एक दिन में सामने से हज़ारों लाचार, बेबस, भूखे, थके, बीमार, दिमाग़ से सुन्न हो चुके लोगों का रेला गुज़रते हुए देख कर भी अनदेखा कर देने वाले और यहाँ तक कि उन्हीं लाचार बेबस मज़दूरों को गरियाने वाले अश्लील भारतीय मध्यवर्ग के बीच से कुछ अच्छी सूचनाएँ जब सामने आती हैं तो मानवता के बचे रहने की हल्की सी उम्मीद भी बची रहती है.

देश की राजधानी दिल्ली से लगे ग़ाज़ियाबाद की एक सॉसाययटी ‘आम्रपाली विलेज’ में जो घटित हुआ वह एक नज़ीर है.

8 मई की रात कोई अलग रात नहीं थी. जैसे पिछली कई रातों से दिल्ली से और दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाले मज़दूर सैंकड़ों की संख्या में ग़ाज़ियाबाद से निकल रहे थे, वैसे ही 8 मई को भी निकले. उनमें से कुछ मज़दूर देर रात एक स्थान पर थोड़ी सी जगह देख कर रुक गए, ताकि रात वहाँ सोकर सुबह फिर अपने अंतहीन सफ़र के लिए निकल सकें.

पर यहाँ कुछ अजीब घटित हुआ. जिस जगह वे सोए थे वह ग़ाज़ियाबाद की एक सॉसाययटी ‘आम्रपाली विलेज’ का मुख्य द्वार था. रात वे वहीं मेन गेट के बाहर सोते रहे. सुबह जब वहाँ पर तैनात गार्ड ने देखा तो RWA (रज़िडेंशियल वेलफ़ेयर असोसीएशन) को ख़बर की. यहाँ तक कि घटना भारत की किसी भी सॉसाययटी में ऐसी ही घटती, बस इसके बाद वहाँ जो हुआ वह अजूबा से कम नहीं था.

RWA प्रेसिडेंट Mr. दीपक और उनकी टीम ने सलाह मशविरा किया और सारे मज़दूरों को सॉसाययटी के अंदर आने को कहा. उनके लिए पानी की व्यवस्था की और कर्मचारियों के लिए बने शौचालय खुलवा दिए. उसके बाद उनके लिए नाश्ते का प्रबंध किया गया. इस बीच स्थानीय प्रशासन को भी ख़बर कर दी गयी और सारे मज़दूरों क़ी थर्मल स्कैनिंग की गयी. यानी सोसायटी में जितनी सुविधा उपलब्ध थी और जो उचित तरीक़े से सम्भव था वह सब किया गया.

इसके बाद उनके लिए खाना बनवाया गया उन्हें खाना खिलाया गया और रास्ते के लिए एक बार का खाना उन्हें बांध कर भी दिया गया. वहाँ रहने वाले लोगों से अपील की गयी कि आप लोग जो मदद करने की इच्छा रखते हों कर सकते हैं. लोगों ने अपने घर में जुटाए गए सामान में से पानी की बोतलें, बिस्किट, ब्रेड, बटर, जैम, नमकीन आदि आदि .. यानी जो भी सम्भव हुआ उन्हें देकर आगे के लिए विदा किया.

वहाँ की महिलाओं का एक अलग Whatsapp group है जिसमें कुछ महिलाओं ने आपत्ति दर्ज की, कुछ असहज करने वाले और संवेदनहीन तर्क दिए. इस बात का ज़िक्र शायद मैं न करता लेकिन करना ज़रूरी इसलिए लगा कि बेहूदे सवालों के जवाब जो RWA प्रेसिडेंट दीपक ने दिए वह जवाब सामने आना ज़रूरी है. यह बताने के लिए कि किसी छोटे या बड़े संस्थान या संगठन या व्यवस्था का मुखिया अगर संवेदनशील है, वैचारिक रूप से स्वस्थ है तो वह क्या कर सकता है.
Mr. दीपक का जवाब संक्षेप में यहाँ लिख रहा हूँ,

Mr. दीपक का जवाब था-
“हमने गरीब लाचार मज़दूरों को जिस हालत में गेट के बाहर देखा हमारा ज़मीर नहीं गवारा किया कि उन्हें उनके हाल में छोड़ दिया जाए. अगर आप लोगों को कोई तकलीफ़ हुई है मैं क्षमा माँगता हूँ, और गुज़ारिश करता हूँ कि आप लोग एक दिन अपने फ़्लैट से नीचे मत आइए. इन मज़दूरों के जाने के बाद हम पूरी सॉसाययटी को सैनिटाइज करवा देंगे.”

बहुत सम्भावना है कि उन मज़दूरों में से कुछ या कई संक्रमित भी हो सकते हैं. बहुत सम्भावना है कि सॉसायटी को खूब सैनिटाइज करने के बावजूद स्थानीय निवासियों में संक्रमण फैले. लेकिन जैसी देश की स्थिति है और सरकारों के चाल चलन हैं उसमें यह सम्भावना मज़दूरों के वहाँ आने के बग़ैर भी थी. तो अगर आम्रपाली में कोई संक्रमण पाया जाता है तो उसे उन मज़दूरों के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. नॉएडा ग़ाज़ियाबाद की तमाम सॉसायटी में संक्रमण पाया गया है जहाँ मज़दूरों को फटकने तक की इजाज़त नहीं है.

दीपक जैसे लोग बेशक इस समाज में बहुत कम होंगे लेकिन हैं. तभी यह समाज अभी तक बचा हुआ है. जैसा भी सड़ा गला बचा है वह इन्हीं दीपक जैसे लोगों की हिम्मत और संवेदनशीलता के दम पर बचा हुआ है. देश को दीपक जैसे कुछ नहीं बहुत सारे लोग चाहिए इस मुसीबत से सुरक्षित और ‘कम से कम नुक़सान’ के साथ बाहर आने के लिए.

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