नदी

तेज प्रताप नारायण

पिछली बार गाँव जाने के बाद मोहन की बड़ी इच्छा हुई थी कि गाँव से कुछ कोस दूर उन जंगलों को भी देखा जाए जिनके बीच काफ़ी वक़्त उसने बिताया था।किसी न किसी बहाने जंगल से उसका वास्ता पड़ा ही करता था ,कभी घर में कुछ खान पान की व्यवस्था होती तो सागौन के पत्तो को लेने जाता और कई बार सूखी लकड़ियों को लेने भी शौक़ शौक़ में जंगल गैंग के साथ चला जाता था और जब जंगल जाता तो जंगल के बीचोंबीच बहती उस नदी से भी मुलाक़ात ज़रूर होती ।जिसके किनारे बैठकर माँ के आँचल में बैठने का एहसास होता था ।नदी के मीठे पानी का स्वाद वह अब तक भूला नहीं । जंगल के दूसरे छोर पर जाने के लिए पार नदी को पार करना पड़ता था ।नदी बहुत गहरी तो न थी लेकिन दो तीन हाथियों का पानी तो उसमें था ।नदी को जहाँ से पार किया जाता था वहाँ नदी ने ख़ुद को थोड़ा चौड़ा कर लिया था मानो वह लोगों को रास्ता दे रही हो ।। तराई के इलाकों में ऐसी कई कई छोटी नदियाँ बहती हैं जो राप्ती, घाघरा या सरयू नदियों में मिल जाती थीं । इन छोटी -छोटी नदियों का पानी घाघरा को घाघरा और राप्ती को राप्ती बनाती था ।
मोहन के बहन की ससुराल भी जंगल पार ही थी जिस कारण भी उसका जंगल और नदी के वास्ता पड़ता रहता था ।

उस दिन जब वह जंगल की तरफ़ साइकिल से चलने को हुआ तो भाई श्याम ने बोला ,”मोहन दादा !! साइकिल से मत जाओ ।कार लेते जाओ ,,बढ़िया डामर सड़क बन गई है । सरकार ने बड़ा काम करवाया है ।
मोहन को बड़ा आश्चर्य न हुआ ।आजकल बहुत सारी सड़कें और रेल की पटरियाँ जंगलों और पहाड़ों को काट काट कर बनाई जा रहीं हैं । एक बार तो मोहन ने सोचा कि साईकिल से ही चला जाए लेकिन फिर उसने सोचा कि शहर में रहते साईकिल चलाना वह कब का भूल चुका होगा ।भाई सही ही कह रहा है ।कार की खिड़कियों को खोलकर जंगल में घूमने का मज़ा अलग ही होगा। इतने दिनों बाद जंगल घूमने जाने को बड़ा उत्सुक था । जंगल वैसा ही होगा ।जैसा वह छोड़ कर गया था या वह बदल गया होगा ,जैसे गांव पहचान में नहीं आ रहा है ।। इन्हीं आशंकाओं के साथ बचपन के दोस्त सोहन को लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ा।गांव जेवार की बातें करते करते वह जंगल तक पहुँच गए और थोड़ी देर में जंगल के पार बहन का गांव दिखने लगा ।
मोहन के ज़ेहन में वही घना जंगल बसा हुआ था और जंगल के बीच वह नदी बह रही थी ।
“सोहन !! कहीं ग़लत जगह तो नहीं आ गए ??” ,मोहन ने दोस्त से पूछा
“नहीं यार !हम लोग बिल्कुल सही जगह पहुँचे हैं ।यह सड़क भी पहले के जंगल के बीचो बीच से गुज़रती है। “
“लेकिन यह तो बिल्कुल किनारे है ।”,मोहन आश्चर्यचकित सा होकर बोला
“अब बीच ही किनारा है ।जंगल कट चुका है ।”,सोहन अफ़सोस जताते हुए बोला

“और वह नदी ?? ” ,मोहन को कुछ डूबता हुआ महसूस हुआ ।
“देख रहे हो सड़क के सामने छोटे छोटे गड्ढे ,वही नदी है ।”,
सोहन इशारा करते हुए बोला
मोहन की पुरानी स्मृतियाँ ताज़ी हो रही थी और ज़ेहन में नदी बहने लगी थी ।

कल ,कल ,छल, छल
डब डब
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