पिजिन भाषाएँ (Pidgin Languages)

 पिजिन भाषाएँ (Pidgin Languages)

डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह, अंतर्राष्ट्रीय भाषा वैज्ञानिक

पिजिन भाषाओं का विकास ऐसे दो या दो से अधिक समुदायों के बीच में होता है, जिनकी भाषाएँ एक – दूसरे के लिए अबूझ होती हैं, किंतु आपसी संवाद कायम करना जरूरी हो जाता है। ऐसा व्यापार, शासन, धर्म प्रचार या अन्य किसी कारण से होता है।

बतौर उदाहरण व्यापार को लीजिए। व्यापार के उद्देश्य से चीन में पिजिन इंग्लिश का जन्म हुआ, जिसमें शब्द तो अंग्रेजी के हैं, मगर ध्वनि – प्रक्रिया और व्याकरण चीनी का है। व्यापारिक दृष्टिकोण से ही भूमध्य – सागर के बंदरगाहों पर बतौर पिजिन भाषा सबीर का जन्म हुआ, जिसमें अरबी और यूरोपीय भाषाओं का मिश्रण है।

पिजिन भाषाओं का जन्म धर्म या प्रशासनिक कारणों से भी होता है। 13 वीं सदी में जब उत्तर भारत में तुर्क साम्राज्य स्थापित हुआ, तब बतौर पिजिन भाषा उर्दू की नींव पड़ी और 6 ठी सदी ईसा पूर्व में जब पश्चिमोत्तर भारत में ईरानी साम्राज्य स्थापित हुआ, तब बतौर पिजिन भाषा संस्कृत की नींव पड़ी।

जब किसी पिजिन भाषा की नींव पड़ती है, तब वह कामचलाऊ होती है। वह सिर्फ स्थूल भावों का संप्रेषण करती है। उसमें गंभीर दर्शन, विज्ञान या साहित्य की रचना संभव नहीं होती है। पिजिन भाषाओं को भाषा बनने में सैकड़ों साल लगते हैं। इसीलिए संस्कृत और उर्दू के क्लासिकल साहित्य को आने में कोई 500 साल लग गए।

जैसा कि मैंने कहा कि संस्कृत एक पिजिन भाषा है, जो गांधार और पंजाब में ईरानी भाषा और उस क्षेत्र की प्राकृत भाषाओं से घुल-मिल कर तैयार हो रही थी। गांधार में पेशावर के आसपास का क्षेत्र निया प्रदेश है। निया प्राकृत में श, ष, स तीनों है। र का संयुक्ताक्षर निया प्राकृत में बड़े पैमाने पर मिलते हैं जैसे क्र, ग्र, त्र, द्र, प्र, भ्र, म्र आदि। ईरानी भाषा निया प्राकृत की इस ध्वनि – व्यवस्था को आत्मसात कर रही थी और धीरे – धीरे संस्कृत को जन्म दे रही थी।

जब तक बतौर पिजिन भाषा संस्कृत की उत्पत्ति नहीं मानिएगा, तब तक भारत के इतिहास को एक काल्पनिक दुनिया में भटकना होगा, जहाँ बगैर लिपि की एक ऊँची सभ्यता होगी, जहाँ बगैर जन्मी भाषा का अतिरंजित बखान होगा, बड़े – बड़े लिखेरे होंगे और मोटी – मोटी लिखी हुई किताबें होंगी।

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