बेड़ियाँ

 बेड़ियाँ

सीमा पटेल

दरवाज़े खोलते ही सामने यामिनी को देख कर सुमन अचंभित रह गयी । उसने बहुत जोर से यामिनी को गले से लगा लिया । काफी अंतराल के बाद मिलने पर दोनो की आँखें छलछला आयीं।
यामिनी को इस हाल में देख कर सुमन के ज़ेहन में अनगिनत सवाल बादल बन उमड़ने लगे । उसको अपनी आँखों पर विश्वास नही हो पा रहा था कि, जो शादी के बाद सिर से पाँव तक सजी-सँवरी मुग्धा नायिका वो आज इस सादगी की चादर में लिपटी बेजान मूरत सी क्यों नज़र आ रही है । यही तो हमारे कॉलेज के समय की श्रंगार रहित सुंदरी थी , जिसको एक नज़र देखते ही सब उसकी सादगीपूर्ण सुंदरता के दिवाने हो जाते थे और सच बताऊँ तो, कभी-कभी मुझे उसकी इस लावन्यता पर ईर्ष्या सी होने लगती थी ।

लेकिन आज उसको इस हाल में देखकर सुमन पूछने की हिम्मत नही जुटा पा रही थी कि ….

” यामिनी तुम ऐसे इस रूप में कैसे..??

बेरौनक चेहरे पर खिंची तमाम लकीरें मानो ये कह रही हो कि … ;;

“सुन ऐ दर्द अब अपने आप में तुझको छुपाऊँ कैसे ।
खामोश चेहरे पर खिंची लकीरों की दास्तां सुनाऊं कैसे” ।।

आज यामिनी से सात साल बाद सुमन मिल रही थी । गहरी प्रगाढ़ता से गले मिलने के बाद सुमन ने यामिनी का हाथ थाम कर सोफे पर बैठाया ।

कैसी है तू .??
जीजू कैसे है ..??

यामिनी ने सुमन का हाथ अपने दोनों हाथों में प्यार से जकड़ते हुए पूछा

मैं तो तेरे सामने हूँ देख ले..

कैसी बीन बैग जैसी होती जा रही हूँ।
तेरे जीजू भी एकदम मस्त है। वैसे ही छैल-छबीले बाँके से । साक्षात देख लेना जब घर आ जाये ….

मीठी मुस्कान बिखेरते हुए सुमन बोली ।

अरे यम्मू तू क्या ये उजड़ा चमन सी बनी हुई है तू तो हमारे कॉलेज की चहकती – फुदकती चूँ-चूँ चिड़िया थी । अब क्या ये मरी सी शक़्ल बना रखी है । कहाँ गया वो तेरा शादी के बाद का बनाव-श्रंगार ।

सुमन के मज़ाक में कहे हुए चुटीले शब्द यामिनी के ह्रदय को छील गये । क्षण भर को तो यामिनी की ज़ुवां सूख के तालु में चिपक सी गयी । कि क्या ही बोले अब उस से , जो दर्द सहता वही जानता है ….. ।
हाँ , बस अब ये समझ ले कि, मेरा दिल ही नहीं करता सजने-सँवारने का ।

क्यों क्या हुआ .. तेरा बुढापा आ गया इतनी भरी ज़वानी में अभी तो 27 सावन ही गुज़रे है , लगता है तेरे पर बुढ़ऊ जीजू का असर आता जा रहा है । तब कहा था न कि मेरी भाभी बन जा मेरा भाई संदीप तुझे बहुत पसंद करता था । लेकिन तुझ पर तो रवि कुमार जी की आशिक़ी का भूत चढ़ा हुआ था ।
देख ले संगत का असर साफ-साफ चेहरे पर झलक रहा है ।
“बहार आने से पहले ही फ़िज़ा चली गयी तेरी तो…. मज़ाक करते हुए ” बड़ी जोर से हँस पड़ी सुमन ये कहते हुए ।

“अरे नहीं यार …बस्स”
यामिनी का गला रुंध सा गया आँसू बहने को आतुर हो पड़े, बहुत मुश्किल से दुःख के उमड़ते सैलाब को रोकते हुए घुटी सी आवाज में बोली….. “कुछ नही यार… सब बढिया चल रहा है “
हाँ …हाँ वो तो सब दिख रहा है तेरे ऐसे छुहारे जैसे मरे मराये चेहरे से, अरे यार अब बता भी दे – पूरा हक़ जमाते हुए आँखों मे आँखे डाल कर सुमन , यामिनी से बोली ।

इतनी देर में संतोषी चाय – नाश्ता ले आयी। थोड़ा सा माहौल बदला चाय आने से… तभी मौका देख कर यामिनी ने बातों का रुख़ बदलना चाहा, लेकिन सुमन भी कहाँ आराम से पीछा छोड़ने वाली थी उसकी लँगोटिया यार जो ठहरी ।

आख़िर यामिनी से भी ज्यादा देर तक़ छुपाया न गया । एक गहरी साँस भरते हुए बोल पड़ी …

देख सुमन तुझे तो पता है कि, रवि को मैं अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती थी…..दुनियाँ से लड़-झगड़ कर सारे रिश्तों को दरकिनार कर के ही तो रवि को मैंने अपनाया था और अब….
क्षण भर को कमरे में भी सन्नाटा सा पसर गया। सुमन बहुत घबराई बेचैन नज़रो से यामिनी के चेहरे को पढ़ने लगी।
यामिनी थोड़ा सा थम जाती है बोलते-बोलते उसका दिल बहुत तेज़ी से धड़कने लगता है । वो नहीं चाहती थी कि समय की परतों के नीचे दबे गहरे ज़ख्मों को कोई फिर से कुरेदे । लेकिन , सच्चे मित्र से सच्चाई छुपानी बहुत मुश्किल हो जाती है

हाँ,,,, हाँ आगे बोल यामिनी…. क्या हुआ जीजू को,,, सब ठीक तो है न ..

हाँ , सुन … !!

रवि और मेरी उम्र में बहुत ज्यादा फ़र्क़ होने की वजह से रिश्तेदार, दोस्त-यार सभी इस शादी के बिल्कुल खिलाफ थे तुझे भी तो ये सब पता था पहले ही से । तूने भी मना किया था रवि से शादी करने के लिए । लेकिन तब मैं ये समझती थी कि तू अपने भाई से मेरी शादी करवाने की वजह से मुझे रवि से शादी करने के लिए मना कर रही है , सच मैं उस वक़्त रवि के प्यार में अंधी थी । नही समझ पाई उसको ..

शादी से पहले तो मुझे बनाव श्रंगार बिल्कुल भी पसंद नही था, यही सोचती थी कि आखिर शादी के बाद ….
” स्त्रियों को ही क्यों सुहाग की बेड़ियों में बांधा जाता है , पुरुष को क्यों नही , स्त्री ही क्यों शादीशुदा होने का लबादा ओढ़ कर घूमे पुरूष क्यों नहीं । लेकिन,रवि के प्रेम में पड़कर मैंने सजना-सँवरना शुरू कर दिया और हमेशा करवा चौथ के लिए रवि अपनी पसंद की चूड़ी बिंदी पायल बिछिया साड़ी सुहाग का ढेर सारा सामान लाकर देते थे । तब मैं सज-सँवर कर चाँद को अर्क दिया करती थी। रवि बहुत प्रेम से मुझे निहारते थे । इस तरह से उनका प्यार से निहारना…..मानों ऐसा लगता था कि दुनियां जहान का प्यार मुझ मे ही सिमट आया हो, और सच में सुमन …..उनको पाकर ही तो मेरे सूने जीवन में बहार आयी थी मेरा जीवन पूर्ण हुआ था।
जब इतना सारा प्यार मेरे जीजू जी तेरे से करते है तो फिर क्या दिक्कत … ??
दिक्कत….. ही दिक्कत बढ़ती गयी यार …सोचा न था सुमन, तू अगर सब सुनना चाहती है तो सुन …..

एक बार मैं रात 11 बजे तक रवि का इंतज़ार करती रही, न उनका फोन आया और न ही उनके आने की कोई ख़बर मिली । तब उस करवा चौथ की रात को मैंने बे-मन से चाँद को अर्क देकर सारी रात अपने चाँद का इंतज़ार करती रही
लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस चाँद का मैं बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी वो किसी और की रातों को भी जगमगाने वाला चाँद था। कहते – कहते यामनी के आँसू ढलक गए ।

अरे यामिनी ये क्या… ?
और किसके लिए…. ?
और क्यों ….?
मन दुःखी मत कर मेरी प्यारी यम्मु हिम्मत रख , मैं हूँ न तेरे साथ । आगे बता तो सही …

यामिनी बहुत मुश्किल से अपने आसुंओ को रोक पा रही थी । उसकी आवाज़ गले में रुंध रही थी , लेकिन सुमन का प्यार उसको अपने दिल में दबी तहों को खोलने के लिए मजबूर कर रहा था ।
आँसुओ को जबरजस्ती से रोक कर वो फिर बेबाक़ी से बताने लगी

वो पहले से ही शादी-शुदा था ।
उसकी एक बेटी भी थी ।
उसने मुझे धोखा दिया था।

उसने ये सब कभी भी ज़ाहिर नही होने दिया । या शायद मैं ही न समझ सकी। अगर मुझे पता होता तो मैं उस से शादी कभी भी नही करती न ही उसकी पत्नी के जीवन में मैं ज़हर घोलती — कहते -कहते यामिनी फ़फ़क़ कर रो पड़ी …..

यामिनी….!
“ये तेरे को कैसे पता चला…. कि रवि पहले से ही शादी शुदा है ” ।

वो अक्सर ही घर नहीं आते थे । जब भी मैं पूछती तो वो कहते थे कि, मेरी माँ बीमार है उनके पास हूँ और तब मैं विश्वास कर लेती थी उनकी हर बात पर।
लेकिन, शादी के दूसरे करवाचौथ पर भी जब वो घर नही आये तब मैंने उसके मित्र को फोन किया तब उन्होंने बताया कि रवि की शादी तो 12 साल पहले हो चुकी थी उसकी एक 9 साल की बेटी भी है । परन्तु मुझे उस की इस बात पर बिल्कुल भी विश्वास नही हुआ कि मेरा पति किसी और की उतरन भी हो सकता है ।
मैंने मज़ाक समझा और मैं सब मालूम होने के बबजूद भी कई दिनों तक जान बूझकर अनजान सी बनी रही । क्योकि दिल ये कडुवा सच स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं था, कि वो मेरे साथ इतना बड़ा धोखा कर सकते है ।
मेरा भ्रम तो तब टूटा जब मैं प्रसव पीड़ा से हॉस्पिटल में उनके ही अंश को इस दुनिया मे लाने के लिए अकेली दर्द से छटपटा रही थी कोई भी मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरने वाला नही था । हॉस्पिटल में सब लोग बार बार पूछ रहे थे कि आपके साथ कौन आया है तब मैं सबको यही जवाब देती की मेरे पति रवि आएंगे अभी ।

रवि को मैंने कई बार फोन किया लेकिन वो नही आये, हर बार कुछ नया बहाना बना कर आने को टाल देते । इधर मेरे घर वालों ने भी, मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी करने की वजह से मुझसे संबंध रखना छोड़ दिया था। और उनके घर वालों ने तो मुझे कभी अपनाया ही नहीं था । मैंने अकेले ही वो समय झेला। 4 दिन बाद मैं अकेले ही अपनी नन्ही बेटी को लेकर हॉस्पिटल से घर आई। तब मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी पागल उनके झूठे प्यार की बेड़ियों में बंध कर अपने आपको धन्य मानती रही । खुश होती रही कि मेरा पति मेरा कितना ख़याल रखता है पर बहुत देर बाद मुझ पगली को ये समझ में आया कि वो सुहाग मेरा प्यार नही ….जिसके लिए मैं भूखी प्यासी रहकर करवा चौथ का व्रत रखती थी…. ईश्वर से उसकी लंबी उम्र माँगती थी ……जन्म जन्म का साथ माँगती थी ….. मुझे नही पता था कि वो तो सिर्फ़ छलावा था , उसके दिए जेवर तो कटीले तार की बेड़ी की तरह बन चुके थे जो कि बदन में टीस पैदा करने लगे थे । मैंने उसके बाद से ही उसकी बाँधी हुई झूठे प्यार की बेड़िया उतार फेंकीं रवि के मायाभी बन्धन सेमुक्त हो गयी ।
उसके बाद उन से अलग रहकर मैंने अपनी बच्ची को पाला । साथ साथ पढ़ाई भी जारी रखी पेपर्स देती रही नौकरी के लिए।

अब मैंने अपनी बेटी यति के साथ जीना सीख लिया अब जैसी भी हूँ जिस हाल में हूँ खुश हूं अब यति ही मेरी सब कुछ है उसकी ही मैं अच्छे से परवरिश करूँगी। उसको इतना क़ाबिल बनाउंगी की कोई भी रवि उसका बड़े होने पर मानसिक और शारीरिक शोषण न कर पाए । जिस तरह मेरा हुआ है ।

यामिनी आँसु पोछते हुए बोली…

हाँ सुमन एक बहुत बड़ी ख़ुशख़बरी भी है जिसके कारण मैं यहाँ तेरे पास आयी थी …..

सुमन भी आँसू पोछते हुए बड़ी उत्सुकता से बोली …क्या…??

तुम्हारे ही शहर में मेरी बैंक में नौकरी लग गयी है । प्रोबेशनरी ऑफिसर के पद पर । तेरी ही जान खाऊँगी तेरे ही घर के पास रह कर , अब मेरे हर काम के लिए ….तैयार हो जा ।

ठीक है यार तू जान भी माँगेंगी तो जान भी हाज़िर है। अब तो तू आर्थिक रूप से मज़बूत हो गयी है अब किसी की मोहताज़ नही रही। अब भूल जा अपना अतीत और नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू कर । ये तो जिंदगी है उतार चढ़ाव तो आते ही रहते है । ज़िंदगी ज़िंदादिली से जीना चाहिए । तूने बहुत हिम्मत दिखाई , मान गयी यार तेरे को , सलाम तेरी हिम्मत को …. पर तूने पहले क्यों नहीं बताया ये सब …..सारे दुःख अकेले झेलती रही एक बार तो बताया होता ।

क्या बताती मैं तुझे भी सुमन !! तू और भी दुःखी होती सुनकर । क्योकि तू भी तो रवि को बहुत शरीफ़ और सीधा सच्चा इंसान समझती थी ।

हाँ शक़्ल से तो सीधा सादा ही लगता था
” लॉली पॉप सा “
एक बात बताऊँ…
जब तूने शादी से पहले उसकी फोटो दिखाई थी न तो उस पर तो दिल आ गया था । पर वो भोली सूरत दिल का खोटा निकला । कोई नही सब भूल जा बुरा सपना समझ कर गिद्ध था उड़ गया माँस नोंच कर ….

इतने में कॉलवेल बजी सुमन ने दरवाज़ा खोला हाथ मे बुके लिए सामने रवि को देखकर हैरान रह गयी । कि इसको अंदर बुलाऊँ तो बुलाऊँ कैसे

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