मनीष मनचंदा की कविताएँ

 मनीष मनचंदा की कविताएँ

राजकीय विद्यालय ,पलवल,हरियाणा में रसायन शास्त्र के प्रवक्ता मनीष मनचंदा को कविता के तत्वों और योगिकों की भी खासी पहचान है।

【पिता】

अब जब भी तुम्हारी तस्वीर को देखता हूं..
याद कर बैठता हूं वो तुम्हारी सीख..
की मेरी कीमत मेरे जाने के बाद जानोगे तुम..

सच था जिंदगी के मायने…
तुम्हारे जाने के बाद ही जाने..

तुम्हारे होने का सुख ऐसा था..
जैसे खुद का घर होना..
ना होने का दुख ऐसा है..
जैसे घर से बेघर होना..

तुम्हारे हाथ की पकड़ी अंगुली का स्नेह,
मेरे जहन में आज भी है..
हर दशहरे के मेले वो अंगुली तलाशता हूं मैं..

पिता होने के मायने भी तुमसे ही जाने हैं ‘पिता’..
सीखा है तुमसे ही पिता का मतलब ‘छांव’
तुमसे ही सीखा है पिता का मतलब..
कांधे पर रक्खा एक मजबूत हाथ..
जो निरन्तर विश्वास दिलाए कि इस कालजयी विपरीत समय में भी ईश्वर जिंदा है..
सच में तुमसे ही जाना ‘पिता’..
पिता का मतलब सर पर छत होना..

चाहता हूं इतना ही..
कभी मैं भी तुमसा ‘पिता’ हो पाऊं..
पूरा ना सही तो कुछ हो जाऊं….

【ऐ दोस्त】

मैं जब कि गुजर रहा था इक बुरे दौर से..
कुछ लोग उसे और बुरा बना देना चाहते थे..
मेरे हर रास्ते को सुरंग कर देना चाहते थे..
मेरे हर कदम को ठोकर बना देना चाहते थे..

पर शिकायत नही है उनसे मुझे..
शिकायते हैं दोस्त तुमसे मुझे..

जब सारी दुनिया मेरे खिलाफ हो गई थी..
मुझे दूर उस भीड़ में तुम भी नजर आते थे..दोस्त,
तुम्हारी मजबूरियां कुछ भी रही हों..
पर मेरे लिए एक बड़ा सबक हैं..
उन दिनों में तुम्हारा चुप्पी साध लेना..
मेरी मृत्यु पर तुम्हारा विचलित ना होने जैसा था..

यूं तो निर्लज फिर हाथ मिलालोगे तुम..
पर नजर मिलाने लायक नही हो..
दुख होता है ये कहते मुझको..
बेशक हंस लेंगे फिर से साथ बैठक हम..
पर कैसे भुलाउंगा मेरे अकेले दिनों का रुदन..
बेशक शामिल हो जाओगे मेरी खुशियों में तुम..
पर भुला नही पाउंगा,मेरे बुरे दिनों में बेरुखी तुम्हारी..~

[बस यूं ही बैठे हुए:ऐ दोस्त]

【अधूरी कविताएं】

बस कुछ दिन को आ जाओ..
कुछ कविताएं मेरी अधूरी पड़ी हैं..

इनसे गायब है वो महक..
जो बारिश की बूंदों से आती थी..

इनमे नही है वो शहद..
जो घुलता था मुंह में..इन्हें पढ़ते वकत..

वो लचक नही जो कलियों में थी..
वो जिद्द नही जो बिजलियों में थी..

वो मस्त मलंग बारिश की बूंदे..
वो बच्चों वाली तुनकमिजाजी..
वो सरदी वाली धूप..

वो चांद को जाती बालकनी..
वो इठलाती हुई मनमानी..
वो चीनी की मिठास..
वो इमली की खटास..

गायब है सब..गायब है ऐसे..
लेने में सांस..होती है तकलीफ..
बिन हवा के जैसे…
हांफती है कविता भी..
जिंदगी के जैसे..

बस इक एहसान और कर दो..
कुछ दिन को आ जाओ..
इन कविताओं को मेरी पूरी कर दो..

【चाँद से इश्क】

अब तुम्हे चाँद से इश्क हुआ है, क्या करें..
इश्क अपनी जगह है,ख़ुदकुशी अपनी जगह..

बस सांसे लेना ही तो, जीना नही होता..
जिन्दगी अपनी जगह है,जीना अपनी जगह..

कुछ परिंदे पिंजरे सहित उड़ जाया करते हैं..
बंदिशे अपनी जगह हैं,होसले अपनी जगह..

गहरा है समन्दर तू जान जाएगा कितना..
इक रोज तू मेरी जगह आ,और मैं तेरी जगह .

【रिक्तिताओं में कविता】
जीवन की रिक्तताओं में भर रहा हूं कविता..
थोड़ा वक़्त ले रहा हूं..पर खेद है इसका..

थोड़ा वक्त ले रहा हूँ..बड़ी संजीदगी से भर रहा हूं इन्हें..
थोड़ा वक्त ले रहा हूं..क्यूंकि संगीत कर रहा हूं इन्हें..
थोड़ा वक्त ले रहा हूं क्यूंकि गहरी है दरार..
कुछ वक्त ले रहा हूं..अकेला पड़ रहा हूं मैं..

दोपहर की दुपहरी घोलता हूं..शाम के ठहराव में..
कुछ आंसू घोल लेता हूं..बारिश के बहाव में..
घोल देता हूं सारा आकाश,धरती,दरिया और पीड़ा…प्रेम में..

ना जाने कब ये घोल कविता हो जाता है..
खाली खाली सा जो था..सब भर जाता है..
जीवन का बिखराव कब कविता हो जाता है..
भारीमन सा भारीपन हल्का हो जाता है।

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